मौन-पथों पर जो चला
मौन-पथों पर जो चला, पाया अपना ठौर।
भीतर जागा जब स्वयं, मिट गए सब छोर॥
हर यात्रा पैरों बिना, चलती मन के साथ।
मौन सुनाता आत्म का, सबसे सच्चा नाथ॥
बाहर जितना दौड़िए, उतना मन कमजोर—
भीतर जागा जब स्वयं, मिट गए सब छोर॥
सागर की गहराइयाँ, लहरों का विस्तार।
निस्तब्धता के गर्भ में, छिपा हुआ संसार॥
शांत हृदय ही जानता, जीवन का सिरमौर—
भीतर जागा जब स्वयं, मिट गए सब छोर॥
जीवन उत्तर माँगता, ऐसा नहीं विधान।
सिर्फ़ सहज उपस्थिति ही, देती है पहचान॥
क्षण-क्षण में जो जी सके, वही हुआ विभोर—
भीतर जागा जब स्वयं, मिट गए सब छोर॥
जब भीतर का शोर सब, थम जाए एक बार।
पक्षी, पवन, पत्तों जुड़ा, सुन पड़ता विस्तार॥
प्रकृति स्वयं तब खोलती, अपने कपाट-द्वार—
भीतर जागा जब स्वयं, मिट गए सब छोर॥
सूरज प्रतिदिन एक-सा, बदले अपनी दृष्टि।
निर्मल मन की आँख से, नव हो जाए सृष्टि॥
हर दिशा घर-सी लगे, मिटे भटकन घोर—
भीतर जागा जब स्वयं, मिट गए सब छोर॥
‘सौरभ’ मन का आश्रय ही, सबसे सच्चा धाम।
जिसने खुद को जान लिया, पा लिया विश्राम॥
मौन-पथों पर जो चला, पाया अपना ठौर।
भीतर जागा जब स्वयं, मिट गए सब छोर॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
