सामाजिक

बाप, ज़िंदगी का सबसे मज़बूत सहारा और साया

जिंदुगी की इमारत में अगर माँ वो नर्मो-नाज़ुक और पुरख़ुलूस छाँव है जो औलाद को धूप की हर तपिश से बचाती है, तो बाप वो मज़बूत सुतून है जिस पर पूरे घर की छत टिकी होती है। बाप की जात एक ऐसे दरख़्त की मानिंद है जो ख़ुद तपती धूप, सर्द हवाओं और तूफानों का मुक़ाबला करता है ताकि उसके नीचे बैठने वाले साए में सुकून की नींद सो सकें।
एक बाप की पूरी ज़िंदगी अपनी जात की नफ़ी और औलाद की खुशियों के हुसूल की तवील जद्दोजहद/संघर्ष का नाम है। वह अपने फटे हुए जूते, पुराने कपड़े और अपनी ज़ाती ख़्वाहिशात को पस-ए-पुश्त डालकर बच्चों की छोटी से छोटी ज़रूरत को पूरा करने को अपनी सबसे बड़ी क़मयाबी समझता है। उसकी थकी हुई मुस्कराहट के पीछे वो अनगिनत तक़ालीफ़ और ख़ामोश क़ुर्बानियां होती हैं जिनका ज़िक्र वह कभी ज़ुबान पर नहीं लाता।
माँ की मोहब्बत का इज़हार आँसुओं, दुआओं और गले लगाने से फ़ौरन हो जाता है, मगर बाप की मोहब्बत अक्सर सख़्त रवैये, नज़्म-ओ ज़ब्त और ख़ामोशी के पर्दे में छिपी होती है। वह बच्चों की गलतियों पर डांटता जरूर है, लेकिन उस डांट के पीछे भी औलाद का मुस्तक़बिल संवारने की फ़िक्र (कारफ़रमा/सक्रिय) होती है। बाप का ग़ुस्सा दरअस्ल एक ढाल होता है जो औलाद को दुनिया की सख़्तियों से महफूज़ रखता है।
ज़िंदगी भर जो इंसान अपने ख़ुन-पसीने से घर की बुनियादों को मज़बूत करता है, जो बच्चों के मुस्तक़बिल को संवारने में अपनी पूरी जवानी लगा देता है, अक्सर बुढ़ापे की दहलीज़ पर पहुँचकर कमज़ोर हो जाता है। वही मज़बूत सुतून जब कमज़ोर होता है, तो वह किसी शिकायत के बगैर घर के किसी कोने में ख़ामोशी से पड़ा रहता है, इस उम्मीद के साथ कि उसकी औलाद अब ख़ुद-कफ़ील हो चुकी है और वो उसे सुकून के चन्द लम्हे देख सके।
बाप का सर पर होना एक ऐसा ताज है जिसकी क़ीमत इंसान को उसके जाने के बाद मालूम होती है। जिस घर में बाप मौजूद हो, वहाँ मु मुश्क़िलात कितनी ही बड़ी क्यों न हों, उनका मुक़ाबला करने का हौसला जवान रहता है। बाप सिर्फ़ एक इंसान नहीं, बल्कि औलाद के लिए हौसले, वक़ार और तहफ़्फुज़ की अलामत है।
“बाप वो मजबूत दरख़्त है जिसके फल से सब फैज़याब होते हैं, मगर उसके अपने हिस्से में अक्सर सिर्फ़ छाँव की क़ुर्बानी आती है।”

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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