कविता

खुलकर हँसना, मुस्कुराना, मन का सुंदर श्रृंगार

पहले के युग में हँसी थी,रिश्तों का मधुर गान,
छोटी-छोटी खुशियों में बसता था सारा जहान।
आज सुविधाएँ बढ़ीं,पर मन क्यों रहता उदास,
आओ फिर मुस्कान जगाएँ,जीवन बने मधुमास।

खुलकर हँसना,मुस्कुराना,मन का सुंदर श्रृंगार,
प्रसन्नचित्त रहने से खिलता जीवन का हर द्वार।
मन की खुशी स्वयं रची,औषधि जैसी अनमोल,
जिसके उजियारे से भर जाए जीवन का हर मोल।

धन-दौलत से ही नहीं,जीवन होता समृद्ध,
संतुलित मन और स्वस्थ संबंध बनाते भविष्य सिद्ध।
परिवार में संवाद रहे,अपनापन रहे साथ,
प्रेम और विश्वास बनें जीवन की सच्ची बात।

पड़ोसी के सुख-दुःख में जब अपना भाव जगे,
समाज के हर आँगन में सौहार्द के दीप जले।
छोटी-छोटी उपलब्धियों में आनंद का रंग भरें,
मिल-जुलकर हम प्रेम,करुणा और खुशियाँ घर-घर करें।

व्यक्ति हँसे तो परिवार में खुशियों की धुन बजे,
परिवार हँसे तो समाज में सद्भाव के फूल सजें।
किशन समाज प्रसन्न हो तो राष्ट्र बने समृद्ध महान,
मुस्कान,प्रेम और प्रसन्नता,यही जीवन की पहचान।

— किशन सनमुखदास भावनानी

*किशन भावनानी

कर विशेषज्ञ एड., गोंदिया

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