तन्हाइयों से रूबरू
शांत सांझ ढली,
मन की पगडंडी पर,
यादें मुस्काईं।
सूना आँगन,
ओस भिगोती पत्ते,
मौन का गीत।
चाँद अकेला,
झील में झुककर देखे,
अपना चेहरा।
सूखी डाली,
पंछी लौट न पाए,
साँसें ठहरीं।
शीतल पवन,
तन्हाई का संदेश,
धीरे बहता।
धुंधली राहें,
आशा का दीप जले,
भोर सँवरे।
— डॉ. अशोक
