सरहदें याद आती हैं
राघव एक साधारण किसान परिवार का युवक था, जो सेना में भर्ती होकर देश की सीमा पर तैनात हो गया था। गाँव छोड़ते समय उसकी माँ ने उसके माथे पर हाथ रखकर कहा था, “बेटा, देश की रक्षा करना, लेकिन अपने गाँव को कभी मत भूलना।”
सरहद पर तैनाती के दौरान राघव ने कई कठिन रातें देखीं। बर्फीली हवाओं के बीच जब वह पहरा देता, तो उसे अपने गाँव का पीपल का पेड़, दोस्तों की हँसी और माँ के हाथों से बनी रोटी बहुत याद आती।
एक दिन डाक से उसे माँ का पत्र मिला। उसमें लिखा था, “तुम दूर हो, लेकिन तुम्हारी वजह से हमारा घर सुरक्षित है। तुम्हारी याद आती है, पर तुम्हारे साहस पर गर्व भी है।”
राघव ने पत्र को सीने से लगा लिया। उसकी आँखों में नमी थी, लेकिन चेहरे पर संतोष था। उसे समझ आ गया कि सरहद केवल दूरी नहीं बनाती, बल्कि रिश्तों और जिम्मेदारियों की गहराई भी सिखाती है।
उस रात राघव ने फिर सीमा पर पहरा दिया। दूर कहीं गाँव की यादें थीं और पास देश की रक्षा का कर्तव्य।
— डॉ. अशोक
