उपन्यास अंश

उपन्यास : दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?

प्रथम अध्याय — “जब हमारा संसार बस एक आँगन था”

सूरज की पहली किरण अभी धरती पर पूरी तरह उतरी भी नहीं थी। गाँव की पगडंडियों पर ओस की बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। कहीं मुर्गे की बाँग सुनाई दे रही थी, तो कहीं गायों की घंटियाँ सुबह का संगीत बिखेर रही थीं। मिट्टी से उठती सोंधी खुशबू पूरे वातावरण को अपने आँचल में समेटे हुए थी।

उसी मिट्टी के एक छोटे-से घर में दो नन्हीं धड़कनें अभी भी एक-दूसरे से लिपटी हुई सो रही थीं।

एक ने नींद में करवट बदली, तो दूसरे ने बिना आँख खोले उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

मानो डर हो कि कहीं भाई दूर न हो जाए।

माँ दरवाज़े पर खड़ी यह दृश्य देख रही थी।

उसकी आँखों में ममता थी, होंठों पर मुस्कान थी और मन में भगवान के प्रति कृतज्ञता।

वह धीरे से बोली—

“हे ठाकुर जी… इन्हें हमेशा ऐसे ही साथ रखना।”

उसे कहाँ पता था…

कि समय इंसान से बहुत कुछ छीन लेता है।

लेकिन उस सुबह…

समय भी उन दोनों भाइयों की नींद नहीं तोड़ पाया था।

थोड़ी देर बाद पिता की आवाज़ पूरे आँगन में गूँजी—

“अरे मेरे शेरों… सूरज निकल आया, खेत चलना है।”

बस इतना सुनते ही दोनों भाई एक साथ उठ बैठे।

बड़े ने छोटे का हाथ पकड़ लिया।

छोटे ने मुस्कुराकर कहा—

“भैया… आज मैं बाबूजी के साथ हल पकड़ूँगा।”

बड़ा हँस पड़ा—

“और मैं बैलों के पीछे दौड़ूँगा।”

दोनों खिलखिलाते हुए बाहर भागे।

माँ ने पीछे से आवाज़ लगाई—

“पहले दूध तो पी लो…”

दोनों एक ही गिलास पकड़कर पीने लगे।

एक घूँट बड़ा पीता,

दूसरा उसी जगह से पीता।

उन्हें कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि किसका हिस्सा कितना है।

उनकी दुनिया में हर चीज़ की शुरुआत ‘हम’ से होती थी।

कुछ ही देर में पिता खेत की ओर चल पड़े।

दोनों भाई उनके पीछे-पीछे ऐसे भाग रहे थे जैसे दो नन्हे बछड़े अपनी गाय के पीछे दौड़ते हों।

रास्ते में गीली मिट्टी मिली।

छोटे ने मिट्टी उठाकर बड़े के गाल पर लगा दी।

बड़ा भी कहाँ हार मानने वाला था।

उसने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और छोटे के सिर पर रख दी।

दोनों की हँसी खेतों में गूँज उठी।

पिता पीछे मुड़े।

दोनों को देखा।

और मुस्कुराकर बोले—

“जिस दिन तुम दोनों की यह हँसी खो जाएगी…

समझ लेना, इस घर की असली दौलत खो जाएगी।”

दोनों कुछ समझे नहीं।

वे फिर मिट्टी से खेलने लगे।

खेत पर पहुँचकर पिता हल चलाने लगे।

दोनों भाई खेत की मेड़ पर बैठकर गीली मिट्टी से छोटे-छोटे घर बनाने लगे।

बड़ा दीवार बनाता।

छोटा छत बनाता।

फिर दोनों ताली बजाकर कहते—

“यह हमारा घर है…

हम दोनों हमेशा यहीं साथ रहेंगे।”

उनकी मासूम आवाज़ सुनकर पिता की आँखें भीग गईं।

उन्होंने मन ही मन भगवान से कहा—

“हे प्रभु…

अगर कभी इनकी परीक्षा लेना…

तो धन की लेना,

लेकिन इनके प्रेम की कभी मत लेना।”

क्योंकि…

उन्हें क्या पता था कि एक दिन परीक्षा प्रेम की ही होने वाली है…उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

प्रथम अध्याय — “जब हमारा संसार बस एक आँगन था” (भाग–2)

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

खेतों की पगडंडी पर चलते हुए दोनों भाई कभी आगे निकल जाते, कभी पीछे रह जाते। कभी एक तितली के पीछे भागता, तो दूसरा उसे पकड़ने की कोशिश करता। कभी रास्ते के किनारे खिले जंगली फूल तोड़कर माँ के लिए ले आते।

पिता दूर से मुस्कुराकर उन्हें देखते।

उनके चेहरे पर वह सुकून था, जो केवल एक पिता की आँखों में दिखाई देता है—जब वह अपने बच्चों को साथ देखकर भविष्य के सपने बुनता है।

खेत पहुँचते ही दोनों भाइयों की दुनिया बदल जाती।

पिता हल चलाते रहते।

और दोनों गीली मिट्टी इकट्ठी करने लगते।

छोटा भाई बोला—

“भैया, आज बड़ा घर बनाएँगे।”

बड़े ने हँसते हुए कहा—

“हाँ… इतना बड़ा कि माँ, बाबूजी और हम सब उसमें साथ रहेंगे।”

दोनों ने मिट्टी गूँथी।

हथेलियों से दीवारें खड़ी कीं।

छोटी-सी खिड़की बनाई।

फिर मिट्टी का दरवाज़ा बनाया।

थोड़ी दूर से सूखी घास लाकर छत बनाई।

उस छोटे-से मिट्टी के घर को देखकर दोनों ऐसे खुश हुए, जैसे किसी राजा ने महल बना लिया हो।

फिर दोनों ने मिट्टी से छोटे-छोटे बैल बनाए।

एक हल बनाया।

एक किसान बनाया।

छोटे ने कहा—

“यह बाबूजी हैं।”

बड़े ने मिट्टी का एक छोटा-सा चूल्हा बनाकर कहा—

“और यह हमारी माँ।”

दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।

पिता की आँखें भर आईं।

उन्होंने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा—

“हे ईश्वर…

इनके सपनों का यह मिट्टी का घर कभी मत टूटने देना।”

दोपहर ढलने लगी।

दूर से माँ दिखाई दी।

सिर पर टोकरी।

हाथ में पानी की सुराही।

चेहरे पर वही ममता, जो धूप से भी ज़्यादा गर्म और छाँव से भी ज़्यादा ठंडी होती है।

दोनों भाई माँ को देखते ही दौड़ पड़े।

एक ने टोकरी पकड़ ली।

दूसरे ने सुराही उठा ली।

माँ बोली—

“अरे… मेरे लाल, धीरे-धीरे।”

खेत की मेड़ पर चारों बैठ गए।

माँ ने कपड़ा बिछाया।

उस पर मोटी-मोटी रोटियाँ रखीं।

हरी मिर्च, प्याज़ और थोड़ा-सा नमक।

बस इतना ही था।

लेकिन उस भोजन में प्रेम इतना था कि किसी दावत से कम नहीं लगता था।

दोनों भाई एक ही रोटी के लिए फिर झगड़ पड़े।

“पहला टुकड़ा मेरा!”

“नहीं, पहले मैं!”

माँ मुस्कुराई।

रोटी के दो बराबर टुकड़े किए।

दोनों के हाथ में रख दिए।

और बचा हुआ छोटा-सा टुकड़ा खुद खा लिया।

पिता सब देख रहे थे।

उन्होंने कहा—

“बेटा…

रोटी आधी हो सकती है…

लेकिन भाई कभी आधे मत होने देना।”

दोनों ने मासूमियत से सिर हिला दिया।

उन्हें क्या मालूम था…

कि यही वाक्य एक दिन उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान बनेगा।

शाम को लौटते समय दोनों भाइयों ने रास्ते भर मिट्टी के छोटे-छोटे हार बनाए।

जंगली फूल तोड़े।

एक-दूसरे के गले में पहनाए।

फिर हँसते हुए बोले—

“आज से हम राजा हैं।”

सूरज ढल रहा था।

आकाश लाल था।

दो छोटे भाई, मिट्टी से सने कपड़े, हाथों में हाथ डाले, घर की ओर लौट रहे थे।

उन्हें देखकर लगता था…

जैसे भगवान ने प्रेम को दो रूप देकर धरती पर भेज दिया हो।

उन्हें क्या पता था…

कि आने वाले वर्षों में दुनिया उन्हें सिखाएगी—

“यह मेरा है… और यह तेरा।”

लेकिन उस दिन तक…

उनकी दुनिया में सिर्फ़ एक ही शब्द था—

“हमारा…”उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

प्रथम अध्याय — “जब हमारा संसार बस एक आँगन था” (भाग–3)

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

गाँव की सुबहें केवल सूरज से नहीं जागती थीं।

वे जागती थीं—

माँ की पुकार से…

पिता की खाँसी से…

गायों की घंटियों से…

और उन दो नन्हे भाइयों की खिलखिलाहट से।

हर नया दिन उनके लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता था।

घर में नए कपड़े साल में शायद एक-दो बार ही आते थे।

जब माँ बाज़ार से एक नई कमीज़ लाती, तो दोनों भाइयों की आँखों में चमक आ जाती।

बड़ा कहता—

“आज मैं पहनूँगा।”

छोटा तुरंत उसका हाथ पकड़ लेता—

“नहीं भैया… पहले मैं।”

कुछ देर दोनों में खींचातानी होती।

कभी कमीज़ एक के हाथ में,
कभी दूसरे के।

माँ बीच में आती।

मुस्कुराकर कहती—

“अरे पगलों…

कपड़ा एक है…

लेकिन तुम दोनों मेरे दिल के दो टुकड़े हो।

आज बड़ा पहन लेगा…

कल छोटा पहन लेना।”

दोनों कुछ देर मुँह फुलाकर बैठ जाते।

फिर अचानक बड़ा भाई कमीज़ उठाकर छोटे के हाथ में रख देता।

“तू पहन ले…

तुझ पर ज़्यादा अच्छी लगेगी।”

छोटे की आँखों में खुशी उतर आती।

लेकिन अगले ही पल वह कमीज़ वापस बड़े भाई की ओर बढ़ा देता—

“नहीं…

भैया पहले आप पहनोगे,

तब मैं पहनूँगा।”

माँ दोनों को सीने से लगा लेती।

उसकी आँखें भर आतीं।

उसे लगता…

गरीबी ने उसके घर में चीज़ें कम दी हैं,

लेकिन प्रेम भरपूर दिया है।

सुबह दोनों एक ही बस्ता लेकर स्कूल निकलते।

बस्ता बड़ा भाई उठाता,

तो छोटा कहता—

“थोड़ी देर मैं उठाऊँगा।”

रास्ते में नहर आती।

दोनों पानी में अपने पैर डालकर बैठ जाते।

फिर देर होने पर भागते हुए स्कूल पहुँचते।

मास्टर जी डाँटते—

“फिर देर से आए?”

दोनों सिर झुका लेते।

लेकिन डाँट भी उन्हें अलग नहीं कर पाती थी।

स्कूल की छुट्टी होते ही दोनों सबसे पहले एक-दूसरे को ढूँढ़ते।

अगर बड़ा पहले बाहर निकलता,

तो फाटक पर खड़ा होकर छोटे का इंतज़ार करता।

और अगर छोटा पहले निकल जाता,

तो वह तब तक घर की ओर कदम नहीं बढ़ाता,

जब तक उसका भैया उसके साथ न आ जाए।

घर लौटते समय रास्ते में लगे बेर के पेड़ पर चढ़ जाते।

जो बेर मिलता,

उसे आधा-आधा बाँटकर खाते।

कभी एक ज़्यादा खा लेता,

तो दूसरा नाराज़ हो जाता।

“तुमने बड़ा वाला बेर खा लिया!”

दोनों में झगड़ा हो जाता।

छोटा आगे निकल जाता।

बड़ा पीछे रह जाता।

लगता जैसे अब बात कभी नहीं होगी।

लेकिन…

बस पाँच मिनट बाद…

बड़े भाई को रास्ते में एक लाल फूल दिखाई देता।

वह उसे तोड़कर छोटे के पास जाता।

बिना कुछ कहे उसके हाथ में रख देता।

छोटा मुस्कुरा देता।

झगड़ा वहीं खत्म।

न कोई माफ़ी…

न कोई शिकायत…

क्योंकि बचपन में रिश्ते शब्दों से नहीं,

दिल से चलते हैं।

शाम को घर पहुँचते ही दोनों माँ से लिपट जाते।

माँ पूछती—

“आज फिर लड़ाई हुई थी?”

दोनों एक साथ बोल पड़ते—

“थोड़ी-सी…”

और फिर खुद ही हँसने लगते।

पिता यह सब देखकर कहते—

“जिस घर में भाई लड़ते भी हैं और पाँच मिनट बाद फिर साथ बैठ जाते हैं…

समझ लेना,

उस घर की नींव बहुत मज़बूत है।”

दोनों भाइयों ने उस बात पर ध्यान नहीं दिया।

वे तो फिर से आँगन में दौड़ने लगे।

उन्हें कहाँ पता था…

कि बड़े होने पर लड़ाइयाँ पाँच मिनट की नहीं,

कभी-कभी पूरी ज़िंदगी की हो जाती हैं।

और उस समय…

उन्हें मनाने के लिए

न माँ की गोद होती है,

न बचपन की मासूमियत।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

प्रथम अध्याय — “जब हमारा संसार बस एक आँगन था” (भाग–4)

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

सावन की पहली बारिश हुई थी।

आसमान से गिरती हर बूँद जैसे धरती को नहीं, उन दो भाइयों के बचपन को सींच रही थी।

माँ ने बरामदे से आवाज़ लगाई—

“बाहर मत भागना… भीग जाओगे!”

लेकिन बचपन ने कब किसी की सुनी है?

दोनों भाई नंगे पाँव आँगन में दौड़ पड़े।

बारिश की बूँदें उनके चेहरे पर गिर रही थीं।

वे हाथ फैलाकर आसमान की ओर देखने लगे, मानो बादलों से दोस्ती कर रहे हों।

थोड़ी ही देर में आँगन की मिट्टी मुलायम हो गई।

छोटे भाई ने मिट्टी उठाकर कहा—

“भैया… चलो फिर घर बनाते हैं।”

बड़े भाई ने हँसते हुए जवाब दिया—

“आज ऐसा घर बनाएँगे जिसमें माँ, बाबूजी और हम हमेशा साथ रहेंगे।”

दोनों ने भीगी मिट्टी से दीवारें खड़ी कीं।

आँगन की एक छोटी-सी जगह में पूरा संसार बस गया।

मिट्टी का घर।

मिट्टी का चूल्हा।

मिट्टी का हल।

मिट्टी के बैल।

और मिट्टी का एक छोटा-सा पेड़।

छोटे ने मिट्टी से दो छोटे इंसान बनाए।

“ये हम हैं…”

बड़े ने तीसरी आकृति बनाई।

“ये माँ हैं…”

फिर चौथी।

“और ये बाबूजी।”

चारों मिट्टी के पुतले उस छोटे-से घर के सामने खड़े थे।

दोनों देर तक उन्हें देखते रहे।

उन्हें लगता था कि दुनिया की सबसे सुंदर चीज़ वही है।

बारिश रुक गई।

लेकिन उनके सपनों का घर अभी भी खड़ा था।

पिता खेत से लौटे।

उन्होंने मिट्टी का वह घर देखा।

कुछ देर चुप रहे।

फिर धीरे से बोले—

“घर दीवारों से नहीं बनता बेटा…

घर तब बनता है जब उसमें रहने वाले एक-दूसरे के लिए जीते हैं।”

दोनों भाइयों ने बात पूरी तरह नहीं समझी।

लेकिन पिता की आवाज़ उन्हें बहुत अच्छी लगी।

शाम को माँ ने गरम-गरम रोटियाँ बनाईं।

बरसात की ठंडी हवा चल रही थी।

चारों एक साथ बैठकर खाना खाने लगे।

बिजली चली गई।

माँ ने मिट्टी का दिया जला दिया।

उस छोटे-से दीये की लौ में पूरा घर चमक उठा।

रात गहराने लगी।

दोनों भाई एक ही चारपाई पर लेट गए।

एक ही पुरानी रजाई दोनों के ऊपर थी।

छोटे ने धीरे से पूछा—

“भैया…”

“हूँ?”

“अगर मैं कहीं खो जाऊँ तो?”

बड़े ने बिना सोचे उसका हाथ पकड़ लिया।

“तो मैं पूरी दुनिया ढूँढ़ लूँगा…”

“और अगर आप खो गए तो?”

बड़ा मुस्कुराया।

“तब तू मुझे ढूँढ़ लेना।”

छोटे ने मासूमियत से कहा—

“नहीं…

मैं आपको कभी खोने ही नहीं दूँगा।”

बाहर बारिश फिर शुरू हो गई।

अंदर माँ दोनों को सोते हुए देख रही थी।

उसने धीरे से उनके माथे पर हाथ फेरा।

और मन ही मन बोली—

“हे भगवान…

इनके बीच कभी ऐसी बारिश मत बरसाना,

जो इनके दिलों के बीच दीवार बना दे।”

उस रात…

दोनों भाई एक-दूसरे का हाथ पकड़े सो गए।

उन्हें क्या पता था…

कि आने वाले वर्षों में

जीवन उन्हें एक ऐसा प्रश्न देगा,

जिसका उत्तर केवल प्रेम ही दे सकता है।

क्या भाई का रिश्ता ज़मीन से बड़ा होता है?

उस प्रश्न का उत्तर अभी भविष्य की गोद में था…उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

प्रथम अध्याय — “जब हमारा संसार बस एक आँगन था” (भाग–5 : बचपन की आख़िरी साँझ)

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

गाँव का मेला लगता, तो दोनों भाइयों की खुशी का ठिकाना नहीं रहता।

मेले से कई दिन पहले ही दोनों पिता से पूछना शुरू कर देते—

“बाबूजी… इस बार मेले में चलेंगे ना?”

पिता हँसकर कहते—

“अगर तुम दोनों पूरे हफ़्ते माँ की बात मानोगे, तो ज़रूर चलेंगे।”

बस फिर क्या था…

दोनों सुबह उठकर आँगन बुहारते, गायों को चारा डालते, माँ के लिए कुएँ से पानी भर लाते। उन्हें काम से ज़्यादा इंतज़ार मेले का होता था।

मेले वाले दिन माँ दोनों को नहलाती।

बालों में तेल लगाती।

पुरानी ही सही, लेकिन धुली हुई साफ़ कमीज़ पहनाती।

छोटा भाई आईने में खुद को देखकर मुस्कुराता।

बड़ा उसकी कमीज़ का बटन बंद कर देता।

माँ दोनों को देखती और मन ही मन सोचती—

“भगवान, इनकी मुस्कान कभी कम मत होने देना।”

रास्ते में पिता एक बेटे को दाएँ कंधे पर और दूसरे को बाएँ हाथ से थामे चलते।

दोनों ऊपर से पूरे मेले को देखकर ताली बजाते।

रंग-बिरंगे गुब्बारे…

बाँसुरी की आवाज़…

जलेबी की मिठास…

और दोनों भाइयों की खिलखिलाहट…

उस दिन जैसे पूरा संसार मुस्कुरा रहा था।

पिता ने जेब से कुछ सिक्के निकाले।

इतने ही थे कि एक खिलौना खरीदा जा सकता था।

दुकानदार ने पूछा—

“कौन-सा दूँ?”

दोनों भाइयों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

बड़े भाई ने कहा—

“एक ही दे दीजिए…”

छोटे ने तुरंत जोड़ दिया—

“हम दोनों मिलकर खेलेंगे।”

दुकानदार मुस्कुरा दिया।

शायद उसे भी समझ आ गया था कि प्रेम की कीमत सिक्कों से नहीं चुकाई जाती।

रात को घर लौटते समय छोटा भाई थक गया।

पिता ने उसे कंधे पर बैठा लिया।

बड़ा भाई पिता का हाथ पकड़कर साथ-साथ चलता रहा।

उसने छोटे की ओर देखा और हँसकर कहा—

“आज तू राजा बन गया।”

छोटा बोला—

“कल आपको बाबूजी उठाएँगे।”

पिता हँस पड़े।

“मेरे लिए तुम दोनों हमेशा बराबर हो।”

उस रात…

माँ ने दोनों को एक ही चारपाई पर सुलाया।

दीये की लौ धीमी हो रही थी।

बाहर झींगुरों की आवाज़ थी।

माँ ने लोरी गाना शुरू किया।

दोनों भाई धीरे-धीरे नींद में खो गए।

नींद में भी छोटे का हाथ बड़े की उँगली पकड़े हुए था।

बड़ा भी जैसे बिना छोड़े सो गया।

माँ ने वह दृश्य देखा।

उसकी आँखें भर आईं।

उसने भगवान से केवल एक प्रार्थना की—

“हे प्रभु…

अगर मेरे हिस्से का सुख भी लेना पड़े, ले लेना।

लेकिन मेरे बेटों का साथ कभी मत छीनना।

इनके बीच ऐसा कोई दिन मत लाना,

जब इन्हें एक-दूसरे से मिलने के लिए दरवाज़ा खटखटाना पड़े।”

समय…

चुपचाप यह सब देख रहा था।

उसे पता था—

बचपन हमेशा नहीं रहता।

ज़िम्मेदारियाँ आएँगी।

दुनिया आएगी।

स्वार्थ आएगा।

और फिर एक दिन…

यही दो भाई,

जो आज एक खिलौना बाँटकर खुश हैं,

उन्हें लोग समझाएँगे—

“अपना हिस्सा अलग कर लो…”

लेकिन उस रात…

उनके लिए दुनिया बहुत छोटी थी।

एक माँ की गोद…

एक पिता का कंधा…

एक आँगन…

और एक-दूसरे का साथ।

उन्हें नहीं मालूम था कि इंसान बड़ा तो हो जाता है…

पर अगर वह अपने बचपन को खो दे,

तो सबसे बड़ा होकर भी सबसे गरीब हो जाता है।

यही बचपन आने वाले समय में उनके जीवन का सबसे अनमोल ख़ज़ाना बनने वाला था…उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

दूसरा अध्याय — “जब बचपन से ज़िम्मेदारियों की ओर कदम बढ़े”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

समय…

कभी किसी के लिए नहीं रुकता।

कल तक जो दो नन्हे हाथ मिट्टी के घर बनाते थे,
आज वही हाथ पिता के साथ खेतों की मेड़ बाँधना सीख रहे थे।

अब सुबह की शुरुआत केवल खेल से नहीं होती थी।

मुर्गे की पहली बाँग सुनते ही पिता की आवाज़ आती—

“बेटा… सूरज निकलने से पहले किसान खेत में पहुँच जाता है।”

दोनों भाई एक साथ उठते।

नींद अभी आँखों में होती,
लेकिन पिता के साथ चलने का उत्साह उससे कहीं बड़ा होता।

माँ चूल्हे पर गरम-गरम बाजरे की रोटियाँ सेंकती।

उन पर देसी घी लगाती।

एक छोटी पोटली में गुड़, प्याज़ और हरी मिर्च बाँध देती।

चलते-चलते दोनों भाइयों को प्यार से समझाती—

“धूप तेज़ हो तो एक-दूसरे का ध्यान रखना।”

दोनों एक साथ कहते—

“हाँ माँ…”

रास्ते भर दोनों बातें करते।

कभी खेत की मेड़ पर दौड़ लगाते।

कभी पेड़ों पर बैठे तोतों को उड़ाते।

कभी नहर के ठंडे पानी में पैर डालकर हँसते।

पिता पीछे मुड़कर देखते और मुस्कुरा देते।

उन्हें लगता—

“मेरी सबसे बड़ी कमाई ये खेत नहीं… मेरे दोनों बेटे हैं।”

उस दिन गेहूँ की कटाई थी।

पिता दरांती चलाते।

बड़ा भाई पूले बाँधता।

छोटा उन्हें एक जगह इकट्ठा करता।

दोपहर तक तीनों पसीने से भीग चुके थे।

माँ खेत पर पहुँची।

आज भी वही पुरानी टोकरी।

वही रोटियाँ।

वही स्नेह।

चारों एक नीम के पेड़ के नीचे बैठ गए।

माँ ने पहले दोनों बेटों को रोटी दी।

फिर पिता को।

सबसे अंत में खुद खाई।

छोटे भाई ने यह देख लिया।

उसने अपनी आधी रोटी माँ की थाली में रख दी।

“माँ… आप भी खाओ।”

बड़े भाई ने भी अपनी रोटी का टुकड़ा माँ की ओर बढ़ा दिया।

माँ की आँखें भर आईं।

वह बोली—

“जिस घर के बेटे अपनी रोटी माँ के साथ बाँटते हैं…

उस घर में कभी अभाव नहीं रहता।”

शाम को लौटते समय पिता ने दोनों भाइयों से कहा—

“सुनो बेटा…

खेत की मेड़ टूट जाए तो उसे फिर बाँधा जा सकता है।

लेकिन रिश्तों की मेड़ टूट जाए…

तो उसे जोड़ने में पूरी ज़िंदगी लग जाती है।

इसलिए…

अगर कभी तुम दोनों में झगड़ा हो,

तो सोने से पहले एक-दूसरे से बात ज़रूर कर लेना।”

दोनों भाइयों ने बिना कुछ कहे पिता का हाथ पकड़ लिया।

उन्हें क्या पता था…

कि यही सीख एक दिन उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सहारा बनेगी।

उस शाम सूर्य धीरे-धीरे डूब रहा था।

दोनों भाई पिता के साथ घर लौट रहे थे।

एक के कंधे पर हल था।

दूसरे के हाथ में दरांती।

बीच में पिता थे।

दूर से उन्हें देखकर लगता था—

जैसे तीन नहीं,

एक ही परिवार चल रहा हो।

और उस रास्ते की धूल…

आज भी शायद उन तीनों के पैरों के निशान सँभाले बैठी होगी।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

तीसरा अध्याय — “एक थाली, एक बस्ता और एक सपना”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।

अब दोनों भाई किशोर हो चुके थे।

लेकिन गाँव में आज भी लोग उन्हें अलग-अलग नाम से कम, “दोनों भाई” कहकर ज़्यादा बुलाते थे।

अगर किसी से पूछा जाता—

“बड़ा कहाँ है?”

तो उत्तर मिलता—

“छोटा भी वहीं होगा।”

और अगर कोई पूछता—

“छोटा दिखाई नहीं दे रहा?”

तो लोग हँसकर कहते—

“बड़ा मिल जाएगा, तो छोटा भी मिल जाएगा।”

जैसे दोनों नहीं…

एक ही आत्मा के दो रूप हों।

हर सुबह माँ चूल्हे पर रोटियाँ सेंकती।

घी की खुशबू पूरे घर में फैल जाती।

दोनों भाई रसोई के दरवाज़े पर बैठ जाते।

एक रोटी तवे से उतरती नहीं थी कि दोनों हाथ बढ़ा देते।

माँ मुस्कुराकर कहती—

“धीरे… अभी सबको मिलेगी।”

पिता हँसते हुए कहते—

“अरे, रोटी पर नहीं… प्यार पर लड़ो।”

चारों एक ही थाली में खाना खाते।

छोटा भाई कभी अपनी पसंद की सब्ज़ी बड़े की थाली में रख देता।

बड़ा चुपचाप अपना गुड़ छोटे की ओर सरका देता।

उनके बीच हिसाब नहीं था।

सिर्फ़ अपनापन था।

स्कूल जाने का समय होता।

दोनों एक ही बस्ता उठाते।

रास्ते भर बातें करते।

कभी भविष्य की…

कभी खेतों की…

कभी सपनों की।

छोटा कहता—

“भैया, बड़े होकर भी हम साथ रहेंगे ना?”

बड़ा बिना सोचे जवाब देता—

“अगर पेड़ की दो शाखाएँ साथ रह सकती हैं…

तो हम क्यों नहीं?”

रास्ते में एक बूढ़ा बरगद आता था।

उसकी छाँव में दोनों रोज़ पाँच मिनट बैठते।

बस्ता उतारते।

माँ की दी हुई रोटियाँ खाते।

एक लोटे से पानी पीते।

और फिर उसी उत्साह से स्कूल की ओर चल पड़ते।

एक दिन छोटा भाई बीमार पड़ गया।

उसे तेज़ बुखार था।

वह स्कूल नहीं जा सका।

बड़ा भी घर से नहीं निकला।

पिता ने पूछा—

“तू क्यों नहीं जा रहा?”

बड़े भाई ने छोटे का माथा सहलाते हुए कहा—

“जिसके साथ चलना सीखा…

उसे छोड़कर अकेला कैसे चला जाऊँ?”

पिता कुछ नहीं बोले।

उन्होंने बस बेटे के सिर पर हाथ रख दिया।

उस स्पर्श में गर्व था।

उस रात माँ ने भगवान से कहा—

“हे प्रभु…

अगर कभी मेरे बच्चों की परीक्षा लेना…

तो उनकी मेहनत की लेना…

लेकिन इनके प्रेम की परीक्षा मत लेना।”

क्योंकि…

कुछ रिश्ते परीक्षा के लिए नहीं,

प्रेरणा के लिए बने होते हैं।

लेकिन…

समय की किताब में आगे जो लिखा था,

उसे न माँ पढ़ सकी,

न पिता,

न वे दोनों भाई।

उन्हें कहाँ पता था…

कि जीवन का सबसे कठिन प्रश्न अभी उनके सामने आना बाकी था।

और उसका उत्तर…

किसी किताब में नहीं मिलेगा।

वह केवल दिल देगा।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

चौथा अध्याय — “पिता की उँगली छोड़कर, एक-दूसरे का हाथ थाम लिया”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

गाँव की सुबह अब भी वैसी ही थी।

सूरज हर रोज़ उसी खेत के ऊपर उगता था।

पक्षी उसी नीम पर बैठकर चहचहाते थे।

लेकिन अब दोनों भाई पहले जैसे छोटे नहीं रहे थे।

बचपन की चंचलता अब ज़िम्मेदारियों में बदलने लगी थी।

पिता की चाल पहले जैसी तेज़ नहीं रही।

अब हल उठाने से पहले वह एक पल के लिए रुक जाते।

तभी बड़ा भाई आगे बढ़कर हल अपने कंधे पर रख लेता।

छोटा बिना कुछ कहे बीज की बोरी उठा लेता।

पिता दूर से दोनों को देखते।

उनकी आँखों में गर्व उतर आता।

धीरे से बोले—

“अब मुझे डर नहीं लगता…

क्योंकि मेरे दोनों हाथ अब मेरे बेटों के कंधों पर हैं।”

खेत तक का रास्ता आज भी वही था।

रास्ते में वही बरगद।

वही कुआँ।

वही पगडंडी।

लेकिन अब रास्ते भर शरारतें कम और सपनों की बातें ज़्यादा होती थीं।

छोटा बोला—

“भैया…

एक दिन हम बाबूजी के लिए पक्का घर बनाएँगे।”

बड़े ने मुस्कुराकर कहा—

“और सबसे बड़ा कमरा माँ का होगा।”

“और बाबूजी?”

“उनकी चारपाई वहीं होगी जहाँ से पूरा आँगन दिखाई दे…

ताकि वे हमेशा हमें साथ देख सकें।”

दोनों हँस पड़े।

दूर चलते पिता ने उनकी हँसी सुनी।

उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

क्योंकि उनकी आँखें भर आई थीं।

उन्हें डर था…

अगर बेटे आँसू देख लेंगे,

तो पूछ बैठेंगे—

“बाबूजी, क्या हुआ?”

और एक पिता…

अपने आँसू अक्सर बच्चों से छिपा लेता है।

दोपहर की धूप तेज़ थी।

नीम की छाँव में चारों बैठे।

माँ ने कपड़े में बँधी रोटियाँ खोलीं।

आज रोटियों के साथ गुड़ भी था।

छोटा भाई गुड़ का बड़ा टुकड़ा बड़े की ओर बढ़ाने लगा।

बड़ा हँसकर बोला—

“तू खा ले।”

छोटे ने सिर हिलाया—

“मीठा अकेले नहीं खाया जाता।”

उसने गुड़ बीच से तोड़ा।

आधा बड़े को दिया।

आधा खुद खाया।

पिता मुस्कुराए।

धीरे से बोले—

“याद रखना बेटा…

जो लोग गुड़ भी बाँटकर खाते हैं,

उन्हें कभी दिल बाँटने की नौबत नहीं आनी चाहिए।”

दोनों भाइयों ने उस बात को हँसकर सुन लिया।

लेकिन समय…

समय हर बात अपने सीने में लिखता जा रहा था।

शाम को घर लौटते हुए अचानक बारिश शुरू हो गई।

चारों भीग गए।

छोटे ने अपना गमछा बड़े के सिर पर रख दिया।

बड़ा हँसते हुए बोला—

“और तू?”

“मैं भीग जाऊँगा…

तो माँ मुझे डाँटेंगी।

लेकिन आपको बुखार आ गया,

तो मुझे नींद नहीं आएगी।”

बड़े भाई ने बिना कुछ कहे छोटे को अपने सीने से लगा लिया।

उस दिन बारिश केवल खेतों पर नहीं बरसी थी…

वह पिता की आँखों में भी उतर आई थी।

उन्होंने मन ही मन भगवान से कहा—

“हे प्रभु…

अगर कभी इन दोनों के बीच दूरी आ जाए,

तो इनकी यादों में आज की यह बारिश ज़रूर बचाए रखना।

शायद यही याद एक दिन इन्हें फिर से गले मिला दे।”

उस शाम…

घर के बाहर की मिट्टी भीगी थी।

लेकिन घर के भीतर…

चार दिलों का प्रेम पहले से भी अधिक गहरा हो चुका था।

उन्हें नहीं पता था…

जीवन की सबसे कठिन ऋतु अभी आनी बाकी थी।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

पाँचवाँ अध्याय — “त्योहार तो घर में थे, पर असली खुशी भाई में थी”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

गाँव में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख़ नहीं होते थे।

वे पूरे घर की धड़कन बनकर आते थे।

दीवाली से कई दिन पहले ही दोनों भाई आँगन की सफ़ाई शुरू कर देते।

बड़ा भाई छत से पुराने दीये उतारता।

छोटा उन्हें मिट्टी और राख से चमकाता।

माँ आँगन को गोबर और मिट्टी से लीपती।

उसकी हथेलियों की लकीरों में जैसे पूरे घर का स्नेह बसता था।

पिता दरवाज़े पर खड़े होकर दोनों भाइयों को काम करते देखते और मुस्कुरा देते।

“देखो…

घर तभी सुंदर लगता है,

जब उसमें रहने वालों के मन भी साफ़ हों।”

शाम ढली।

पहला दिया माँ ने तुलसी के पास रखा।

दूसरा पिता ने चौखट पर।

तीसरा बड़ा भाई लेकर आया।

चौथा छोटा।

कुछ ही देर में पूरा आँगन रोशनी से भर गया।

लेकिन सबसे ज़्यादा चमक दोनों भाइयों की आँखों में थी।

पटाखे बहुत कम थे।

पैसे भी कम थे।

इसलिए दोनों ने तय किया—

एक फुलझड़ी बड़ा जलाएगा।

दूसरी छोटा।

एक अनार दोनों मिलकर जलाएँगे।

छोटा बोला—

“अगर सब कुछ आधा-आधा बाँट सकते हैं…

तो खुशी भी आधी क्यों नहीं?”

बड़े भाई ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“खुशी आधी नहीं होती पगले…

खुशी तो बाँटने से दोगुनी हो जाती है।”

माँ दूर खड़ी दोनों को देख रही थी।

उसके चेहरे पर ऐसा संतोष था,

जो किसी अमीर की तिजोरी में भी नहीं मिलता।

कुछ महीनों बाद होली आई।

सुबह-सुबह छोटा भाई चुपके से रंग लेकर बड़े के पीछे पहुँचा।

जैसे ही रंग लगाया,

बड़ा दौड़ पड़ा।

पूरा आँगन हँसी से भर गया।

पिता भी बच नहीं पाए।

माँ ने भी हार मान ली।

उस दिन चारों के चेहरे रंगों से रंगे थे।

लेकिन सबसे गहरा रंग था—

अपनेपन का।

शाम को माँ ने गुजिया बनाई।

बड़ा भाई अपनी थाली से सबसे बड़ी गुजिया उठाकर छोटे की थाली में रख देता।

छोटा तुरंत वापस कर देता।

दोनों फिर हँस पड़ते।

पिता बोले—

“तुम दोनों की यही लड़ाई बनी रहे…

जिसमें जीत हमेशा प्यार की हो।”

रक्षाबंधन पर बहन आई।

उसने पहले बड़े भाई की कलाई पर राखी बाँधी।

फिर छोटे की।

दोनों भाइयों ने एक साथ वचन दिया—

“जब तक हम साथ हैं,

हमारी बहन की आँख में कभी आँसू नहीं आने देंगे।”

माँ ने भगवान के सामने दीपक जलाया।

उसकी प्रार्थना आज भी वही थी—

“मेरे बच्चों का प्रेम बना रहे।”

उसे क्या पता था…

समय का सबसे बड़ा तूफ़ान

अक्सर शांत आकाश के बाद ही आता है।

उस रात दोनों भाई छत पर लेटे थे।

तारों भरे आसमान को देखते हुए छोटा बोला—

“भैया…

अगर अगले जन्म जैसा कुछ होता है…

तो फिर से आपके छोटे भाई बनना चाहता हूँ।”

बड़े भाई ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“और मैं…

हर जन्म में तेरा बड़ा भाई बनना चाहूँगा।”

ऊपर आसमान में एक टूटता तारा गुज़रा।

दोनों ने आँखें बंद करके मन ही मन एक ही इच्छा माँगी—

“हम कभी अलग न हों।”

लेकिन…

किस्मत कभी-कभी वही परीक्षा लेती है,

जिससे इंसान सबसे ज़्यादा डरता है।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

छठा अध्याय — “जब कंधों पर सपने और ज़िम्मेदारियाँ साथ-साथ थीं”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

कहते हैं…

बचपन चुपचाप चला जाता है।

वह कभी यह नहीं कहता कि अब मैं जा रहा हूँ।

एक दिन अचानक आईने में अपना चेहरा देखकर एहसास होता है कि अब कंधों पर किताबों से ज़्यादा ज़िम्मेदारियाँ हैं।

अब दोनों भाई जवान हो चुके थे।

उनकी हथेलियाँ, जो कभी मिट्टी के घर बनाती थीं, अब खेतों में फसलें उगाती थीं।

उनके पैरों में अब भी वही गाँव की मिट्टी लगी रहती थी, लेकिन कदम पहले से कहीं अधिक मज़बूत हो गए थे।

पिता की कमर अब पहले जैसी सीधी नहीं रही।

हल उठाते समय साँस थोड़ी तेज़ चलने लगी थी।

यह देखकर बड़ा भाई बिना कुछ कहे हल अपने कंधे पर रख लेता।

छोटा भाई बैलों की रस्सी पकड़ लेता।

पिता बस देखते रहते।

उनके चेहरे पर गर्व और आँखों में एक अनकहा डर साथ-साथ रहता।

एक शाम पिता आँगन में चारपाई पर बैठे थे।

दोनों भाई खेत से लौटे।

कपड़े पसीने और मिट्टी से सने थे।

माँ ने लोटे में पानी दिया।

दोनों ने पहले पिता के हाथ धुलवाए।

फिर खुद पानी पिया।

पिता ने धीमे स्वर में कहा—

“बेटा…

जिस दिन बच्चे अपने माँ-बाप से पहले खुद का सुख देखने लगते हैं,

उसी दिन घर बूढ़ा हो जाता है।

और जिस दिन भाई एक-दूसरे का दर्द समझना छोड़ देते हैं,

उसी दिन परिवार अनाथ हो जाता है।”

दोनों भाई चुप थे।

उन्होंने केवल पिता के चरण छू लिए।

उस रात बिजली नहीं थी।

पूरा परिवार आँगन में चारपाइयाँ डालकर सोया।

आसमान तारों से भरा था।

छोटा भाई बोला—

“भैया…

याद है, हम यहीं लेटकर तारों को गिना करते थे?”

बड़ा मुस्कुराया।

“और हर बार गिनती पूरी होने से पहले सो जाते थे।”

दोनों हँस पड़े।

माँ ने करवट बदलते हुए कहा—

“तुम दोनों आज भी वैसे ही हँसते हो,

जैसे बचपन में हँसते थे।”

पिता ने आसमान की ओर देखते हुए कहा—

“बस यही हँसी जीवन भर बनी रहे…”

कुछ देर बाद सब सो गए।

लेकिन पिता देर तक जागते रहे।

वह दोनों बेटों को सोते हुए देखते रहे।

फिर धीरे से भगवान से बोले—

“हे प्रभु…

मैंने ज़िंदगी भर धन नहीं माँगा।

बस इतना देना…

कि मेरे बाद भी ये दोनों एक-दूसरे का हाथ कभी न छोड़ें।”

हवा का एक हल्का झोंका आया।

आँगन के कोने में लगा वही पौधा अब छोटा-सा पेड़ बन चुका था।

उसकी दो शाखाएँ एक-दूसरे से लिपटी हुई थीं।

उन्हें देखकर पिता मुस्कुरा दिए।

उन्हें लगा—

“जब तक ये शाखाएँ साथ हैं,
पेड़ कभी नहीं टूटेगा।”

पर समय…

समय को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

उसे उन शाखाओं की नहीं,

उनकी जड़ों की परीक्षा लेनी थी…उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

सातवाँ अध्याय — “जब घर में बहुएँ आईं, पर माँ ने कहा—’यह घर पहले भी एक था, आज भी एक रहेगा'”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

समय अपनी रफ़्तार से चलता रहा।

आँगन का नीम अब घना हो चुका था।

जिस मिट्टी में कभी दो छोटे-छोटे भाई घरौंदे बनाते थे, उसी आँगन में अब उनकी युवावस्था के कदम गूँजते थे।

पिता के बाल पूरी तरह सफ़ेद हो चुके थे।

माँ की आँखों पर अब हल्का-सा चश्मा चढ़ गया था।

लेकिन एक चीज़ नहीं बदली थी—

सुबह की पहली आवाज़ आज भी वही थी—

“बेटा… चाय ठंडी हो जाएगी।”

दोनों भाई मुस्कुराते हुए एक साथ आँगन में आ जाते।

माँ आज भी पहले दोनों को चाय देती,

फिर पिता को।

और अंत में खुद बैठती।

एक दिन गाँव में रिश्ते की बात आई।

पहले बड़े भाई का विवाह हुआ।

कुछ समय बाद छोटे भाई का भी।

घर में नई बहुएँ आईं।

माँ ने दोनों का स्वागत करते हुए कहा—

“बेटियों…

यह घर ईंटों से नहीं,

रिश्तों से बना है।

इस घर की सबसे बड़ी पूँजी खेत नहीं,

इन दोनों भाइयों का प्रेम है।

इसे कभी कम मत होने देना।”

दोनों बहुओं ने आदर से सिर झुका दिया।

शुरुआत के दिन बहुत सुंदर थे।

रसोई एक थी।

चूल्हा एक था।

आँगन एक था।

हँसी एक थी।

रात को सब साथ बैठकर खाना खाते।

पिता बीच में बैठते।

माँ सबकी थाली में रोटी रखती।

बड़े भाई की थाली में सब्ज़ी कम होती तो छोटा अपनी थाली से रख देता।

छोटे की कटोरी खाली होती तो बड़ा बिना पूछे भर देता।

पिता यह सब देखकर अक्सर कहते—

“जिस घर में भाई एक-दूसरे की थाली देख लेते हैं,

उन्हें कभी एक-दूसरे का हिस्सा देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।”

लेकिन…

समय केवल खुशियाँ लेकर नहीं आता।

वह इंसान की नीयत की भी परीक्षा लेता है।

धीरे-धीरे खर्च बढ़ने लगे।

ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं।

खेत वही थे…

लेकिन ज़रूरतें पहले से बड़ी हो गई थीं।

एक शाम गाँव के दो-तीन लोग चौपाल पर बातें कर रहे थे।

उनमें से एक बोला—

“इतना बड़ा परिवार कब तक साथ रहेगा?”

दूसरा हँसकर बोला—

“आज नहीं तो कल…

हर घर में बँटवारा होता ही है।”

उसी समय दोनों भाई वहाँ से गुज़रे।

उन्होंने बात सुनी।

दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

फिर बड़ा भाई मुस्कुराया और बोला—

“लोगों का काम कहना है…

हमारा काम साथ रहना है।”

छोटे ने बिना कुछ कहे बड़े भाई का हाथ पकड़ लिया।

दोनों आगे बढ़ गए।

चौपाल की बातें पीछे रह गईं।

लेकिन…

कुछ शब्द हवा में उड़कर भी मन की किसी कोठरी में चुपचाप बैठ जाते हैं।

उन्हें बाहर आने में कभी-कभी वर्षों लग जाते हैं।

उस रात पिता देर तक जागते रहे।

उन्होंने आँगन में खड़े उसी नीम के पेड़ को देखा।

उसकी दो मोटी शाखाएँ आज भी एक-दूसरे से सटी हुई थीं।

उन्होंने मन ही मन कहा—

“हे प्रभु…

अगर आँधी आए,

तो शाखाएँ झुक जाएँ…

लेकिन टूटें नहीं।”

उन्हें नहीं पता था…

कि आने वाली आँधी हवा की नहीं होगी।

वह शब्दों की होगी।

सलाहों की होगी।

अहम की होगी।

और वही आँधी सबसे मज़बूत पेड़ों को भी परखती है।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

आठवाँ अध्याय — “दरार पहले दीवार में नहीं, मन में पड़ती है”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

गाँव का जीवन बाहर से जितना शांत दिखाई देता है, भीतर उतना ही गहरा होता है।

सुबह आज भी वैसी ही थी।

माँ ने तुलसी पर जल चढ़ाया।

पिता ने आँगन में झाड़ू लगाई।

दोनों भाई खेत की ओर निकल पड़े।

रास्ते में वही बरगद मिला।

बड़ा भाई कुछ देर उसके नीचे रुक गया।

छोटे ने पूछा—

“क्या हुआ भैया?”

बड़े ने मुस्कुराकर कहा—

“कुछ नहीं…

बस याद आ गया, यहीं बैठकर हम माँ की बाँधी रोटियाँ खाया करते थे।”

दोनों कुछ देर चुप रहे।

यादें कभी-कभी शब्दों से ज़्यादा बोलती हैं।

खेत पहुँचे।

काम शुरू हुआ।

धूप चढ़ी।

पसीना बहा।

लेकिन दोनों के हाथ पहले की तरह एक ही लय में चलते रहे।

दोपहर को माँ खाना लेकर आई।

उसने देखा—

दोनों आज भी एक ही लोटे से पानी पी रहे थे।

उसकी आँखों में संतोष उतर आया।

उसने मन ही मन भगवान का धन्यवाद किया।

उधर चौपाल पर बातें चल रही थीं।

कोई बोला—

“अब तो दोनों के बच्चे भी बड़े हो रहे हैं।”

दूसरा बोला—

“समय रहते बँटवारा कर लेना चाहिए।”

तीसरा हँसा—

“रिश्ते अपनी जगह, हिसाब अपनी जगह।”

इन शब्दों का कोई उत्तर नहीं दिया गया।

लेकिन शब्द हवा में खोते नहीं।

वे कभी-कभी मन की मिट्टी में बीज बनकर गिर जाते हैं।

शाम को दोनों भाई घर लौटे।

आँगन में उनके बच्चे साथ खेल रहे थे।

एक मिट्टी का घर बना रहा था।

दूसरा उसके ऊपर पत्तों की छत रख रहा था।

बड़े भाई की नज़र उस दृश्य पर टिक गई।

उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

धीरे से बोला—

“देख छोटू…

याद है?

हम भी ऐसे ही घर बनाया करते थे।”

छोटे ने बच्चों को देखा।

उसकी आँखें भर आईं।

“हाँ भैया…

और हम हर बार कहते थे—

‘यह हमारा घर है।'”

दोनों कुछ देर तक बच्चों को देखते रहे।

पिता चारपाई पर बैठे यह दृश्य देख रहे थे।

उन्होंने धीरे से कहा—

“बेटा…

बच्चे वही सीखते हैं जो बड़े जीते हैं।

अगर तुम साथ रहोगे,

तो ये भी साथ रहेंगे।

अगर तुम बँट जाओगे,

तो इनका बचपन भी बँट जाएगा।”

सन्नाटा छा गया।

नीम के पत्ते हवा में हिले।

जैसे प्रकृति भी पिता की बात सुन रही हो।

रात को सब सो गए।

लेकिन पिता की आँखों में नींद नहीं थी।

उन्होंने भगवान से कहा—

“हे प्रभु…

ज़मीन कम दे देना,

धन कम दे देना,

पर मेरे घर से ‘हम’ शब्द कभी मत छीनना।

क्योंकि जिस दिन ‘हम’ मर जाता है,

उसी दिन बँटवारा जन्म ले लेता है।”

और उसी रात…

दूर कहीं बादल गरजे।

बारिश नहीं हुई।

लेकिन ऐसा लगा…

मानो समय ने आने वाले तूफ़ान की पहली चेतावनी दे दी हो।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

नौवाँ अध्याय — “एक छोटी-सी बात, जो उस दिन छोटी ही रह जाती…”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

रिश्ते कभी एक ही दिन में नहीं टूटते।

वे धीरे-धीरे चुप हो जाते हैं।

बातें कम हो जाती हैं।

मुस्कानें छोटी हो जाती हैं।

और फिर एक दिन लोग कहते हैं—

“पता ही नहीं चला, इतनी दूरी कब आ गई।”

उस सुबह भी सब कुछ पहले जैसा ही था।

माँ ने रसोई में चूल्हा जलाया।

पिता ने गाय को चारा डाला।

दोनों भाई खेत की ओर निकल पड़े।

रास्ते भर फसल, बारिश और आने वाले मौसम की बातें होती रहीं।

कोई शिकायत नहीं थी।

कोई मनमुटाव नहीं था।

बस जीवन अपनी सामान्य चाल से चल रहा था।

दोपहर तक काम करते-करते बड़ा भाई बोला—

“आज खेत के उस हिस्से में भी पानी पहुँचा देना, वरना फसल कमज़ोर रह जाएगी।”

छोटे ने सिर हिलाया।

लेकिन उसी समय पड़ोस के किसान ने मदद माँग ली।

छोटा भाई कुछ देर के लिए उसकी सहायता करने चला गया।

जब तक वह लौटा, सूरज ढलने लगा था।

जिस खेत में पानी जाना था, वहाँ पानी नहीं पहुँच पाया।

शाम को बड़ा भाई वहाँ पहुँचा।

उसने सूखी मिट्टी देखी।

थोड़ी निराशा उसके चेहरे पर उतर आई।

घर लौटकर उसने बस इतना कहा—

“अगर समय पर पानी मिल जाता, तो अच्छा रहता।”

बस इतना ही।

न कोई ऊँची आवाज़।

न कोई आरोप।

न कोई कटु शब्द।

लेकिन छोटे भाई को लगा जैसे उससे बहुत बड़ी गलती हो गई हो।

उसने समझाना चाहा—

“भैया… मैं पड़ोस वाले काका की मदद करने चला गया था। उनका बैल कीचड़ में फँस गया था…”

बड़े भाई ने शांत स्वर में कहा—

“मुझे पता है।”

बस यही दो शब्द थे।

“मुझे पता है।”

लेकिन कभी-कभी कम शब्द भी मन में कई अर्थ छोड़ जाते हैं।

छोटा रात भर सोचता रहा—

“क्या भैया मुझसे नाराज़ हैं?”

उधर बड़ा भाई भी सो नहीं पाया।

वह सोच रहा था—

“मैंने तो कुछ कहा भी नहीं… फिर छोटू इतना चुप क्यों है?”

दोनों एक-दूसरे को समझते थे।

लेकिन उस रात…

दोनों ने एक-दूसरे से बात नहीं की।

सुबह माँ ने देखा—

पहली बार दोनों भाई बिना हँसी-मज़ाक के खेत की ओर निकल गए।

माँ का मन जाने क्यों घबरा उठा।

उसने पिता से कहा—

“आज घर कुछ खाली-खाली लग रहा है।”

पिता ने गहरी साँस ली।

“रिश्तों में सबसे बड़ा रोग झगड़ा नहीं होता…

सबसे बड़ा रोग है—चुप्पी।”

दिन बीत गया।

शाम को दोनों लौटे।

खाना भी साथ खाया।

काम भी साथ किया।

लेकिन जो बात पहले आँखों से समझ ली जाती थी,

आज वह मन में ही रह गई।

आँगन के कोने में लगा नीम का पेड़ हवा में झूम रहा था।

उसकी दो शाखाएँ अब भी साथ थीं।

लेकिन उनके बीच से एक सूखी टहनी टूटकर ज़मीन पर गिर पड़ी।

पिता ने उसे उठाया।

कुछ देर हाथ में देखा।

फिर बहुत धीरे से बोले—

“शाखाएँ एक दिन में नहीं सूखतीं…

पहले उनमें रस कम होता है,

फिर पत्ते झड़ते हैं,

और अंत में लोग कहते हैं—

‘पेड़ अचानक सूख गया।’

रिश्तों का भी यही सच है।”

उस रात बड़े भाई ने करवट बदली।

उसी समय छोटे भाई ने भी।

दोनों जाग रहे थे।

दोनों एक-दूसरे से बात करना चाहते थे।

लेकिन दोनों ने सोचा—

“सुबह बात कर लेंगे…”

किस्मत मुस्कुराई।

क्योंकि उसे पता था—

ज़िंदगी में कई बार “कल” कभी आता ही नहीं।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

दसवाँ अध्याय — “जब सलाह रिश्ते से बड़ी होने लगी”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

गाँव में एक बात बहुत जल्दी फैल जाती है।

खुशी भी…

और चिंता भी।

दोनों भाइयों के घर में कोई झगड़ा नहीं था, लेकिन लोगों की नज़रें अब उनके घर पर ज़्यादा टिकने लगी थीं।

किसी को उनकी एकता अच्छी लगती थी।

तो किसी को हैरानी होती थी।

एक दिन चौपाल पर बैठे कुछ बुज़ुर्ग बातें कर रहे थे।

एक ने कहा—

“आजकल कौन इतने बड़े परिवार में साथ रहता है?”

दूसरे ने धीरे से कहा—

“साथ रहना अच्छी बात है, लेकिन हिसाब भी साफ़ होना चाहिए।”

तीसरा बोला—

“बात आज नहीं तो कल की है… अलग तो होना ही पड़ेगा।”

ये बातें हवा में थीं।

किसी ने सीधे दोनों भाइयों से कुछ नहीं कहा।

लेकिन गाँव की हवा कभी-कभी शब्दों को भी घर तक पहुँचा देती है।

उधर घर में…

माँ आज भी सबके लिए एक ही चूल्हे पर रोटी बना रही थी।

पिता चारपाई पर बैठे अपने पोतों को खेलते देख रहे थे।

दोनों भाई खेत से लौटे।

थके हुए थे।

लेकिन जैसे ही आँगन में बच्चों की हँसी सुनी, सारी थकान उतर गई।

बड़ा भाई अपने भतीजे को गोद में उठा लेता।

छोटा अपने भांजे नहीं, बल्कि बड़े भाई के बेटे को अपने कंधों पर बैठाकर पूरे आँगन में घुमाता।

माँ मुस्कुराकर बोली—

“देखो…

इन बच्चों को अभी यह भी नहीं पता कि कौन किसका बेटा है।

इन्हें तो बस इतना पता है कि यह पूरा घर इनका है।”

पिता ने गहरी साँस ली।

“काश…

बड़े भी बच्चों की तरह ही सोचते रहते।”

उस रात खाना खाते समय पिता ने एक बात कही।

“बेटा…

रिश्ते खेतों की तरह होते हैं।

अगर रोज़ उनकी देखभाल न करो,

तो उनमें अपने आप खरपतवार उग आती है।

और एक दिन वही खरपतवार पूरी फसल को ढक लेती है।”

दोनों भाइयों ने सिर झुका दिया।

वे बात समझ गए थे।

लेकिन जीवन की भागदौड़ में हर सीख को हर दिन याद रखना आसान नहीं होता।

कुछ दिनों बाद…

गाँव में एक रिश्तेदार आया।

उसने इधर-उधर की बातें करते-करते सहज स्वर में कहा—

“इतनी ज़मीन है…

इतना बड़ा परिवार है…

कभी सोचा है आगे क्या होगा?”

बड़े भाई ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—

“आगे वही होगा जो माँ-बाबूजी चाहेंगे।”

रिश्तेदार हँस दिया।

“दुनिया इतनी सीधी नहीं होती बेटा…”

बात वहीं समाप्त हो गई।

लेकिन जाते-जाते वह एक वाक्य छोड़ गया—

“कभी-कभी अपने हक़ की रक्षा भी करनी पड़ती है।”

उसके जाने के बाद घर फिर पहले जैसा हो गया।

लेकिन वह एक वाक्य…

किसी अनदेखी गूँज की तरह दीवारों में रह गया।

रात गहरी थी।

नीम के पेड़ के नीचे पिता अकेले बैठे थे।

उन्होंने ऊपर आसमान की ओर देखा।

तारे वैसे ही थे।

चाँद भी वही था।

बस उनके मन में एक अनजानी बेचैनी उतर आई थी।

उन्होंने धीरे से कहा—

“हे ईश्वर…

अगर कभी मेरे बेटों के बीच कोई दीवार खड़ी हो,

तो पहले मुझे बुला लेना।

मैं अपने जीते-जी उनके बीच दूरी नहीं देख पाऊँगा।”

उसी समय दोनों भाई बाहर आए।

उन्होंने देखा—

पिता अकेले बैठे हैं।

दोनों बिना कुछ कहे उनके पास जाकर बैठ गए।

एक ने पिता का दायाँ हाथ पकड़ लिया।

दूसरे ने बायाँ।

पिता की आँखों से दो बूँद आँसू गिर पड़े।

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

“जब तक तुम दोनों मेरे दोनों हाथ बने रहोगे…

मुझे किसी सहारे की ज़रूरत नहीं।”

लेकिन…

समय के पास अपने प्रश्न थे।

और उन प्रश्नों का उत्तर अभी बाकी था…उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

दसवाँ अध्याय — “जब सलाह रिश्ते से बड़ी होने लगी”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

गाँव में एक बात बहुत जल्दी फैल जाती है।

खुशी भी…

और चिंता भी।

दोनों भाइयों के घर में कोई झगड़ा नहीं था, लेकिन लोगों की नज़रें अब उनके घर पर ज़्यादा टिकने लगी थीं।

किसी को उनकी एकता अच्छी लगती थी।

तो किसी को हैरानी होती थी।

एक दिन चौपाल पर बैठे कुछ बुज़ुर्ग बातें कर रहे थे।

एक ने कहा—

“आजकल कौन इतने बड़े परिवार में साथ रहता है?”

दूसरे ने धीरे से कहा—

“साथ रहना अच्छी बात है, लेकिन हिसाब भी साफ़ होना चाहिए।”

तीसरा बोला—

“बात आज नहीं तो कल की है… अलग तो होना ही पड़ेगा।”

ये बातें हवा में थीं।

किसी ने सीधे दोनों भाइयों से कुछ नहीं कहा।

लेकिन गाँव की हवा कभी-कभी शब्दों को भी घर तक पहुँचा देती है।

उधर घर में…

माँ आज भी सबके लिए एक ही चूल्हे पर रोटी बना रही थी।

पिता चारपाई पर बैठे अपने पोतों को खेलते देख रहे थे।

दोनों भाई खेत से लौटे।

थके हुए थे।

लेकिन जैसे ही आँगन में बच्चों की हँसी सुनी, सारी थकान उतर गई।

बड़ा भाई अपने भतीजे को गोद में उठा लेता।

छोटा अपने भांजे नहीं, बल्कि बड़े भाई के बेटे को अपने कंधों पर बैठाकर पूरे आँगन में घुमाता।

माँ मुस्कुराकर बोली—

“देखो…

इन बच्चों को अभी यह भी नहीं पता कि कौन किसका बेटा है।

इन्हें तो बस इतना पता है कि यह पूरा घर इनका है।”

पिता ने गहरी साँस ली।

“काश…

बड़े भी बच्चों की तरह ही सोचते रहते।”

उस रात खाना खाते समय पिता ने एक बात कही।

“बेटा…

रिश्ते खेतों की तरह होते हैं।

अगर रोज़ उनकी देखभाल न करो,

तो उनमें अपने आप खरपतवार उग आती है।

और एक दिन वही खरपतवार पूरी फसल को ढक लेती है।”

दोनों भाइयों ने सिर झुका दिया।

वे बात समझ गए थे।

लेकिन जीवन की भागदौड़ में हर सीख को हर दिन याद रखना आसान नहीं होता।

कुछ दिनों बाद…

गाँव में एक रिश्तेदार आया।

उसने इधर-उधर की बातें करते-करते सहज स्वर में कहा—

“इतनी ज़मीन है…

इतना बड़ा परिवार है…

कभी सोचा है आगे क्या होगा?”

बड़े भाई ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—

“आगे वही होगा जो माँ-बाबूजी चाहेंगे।”

रिश्तेदार हँस दिया।

“दुनिया इतनी सीधी नहीं होती बेटा…”

बात वहीं समाप्त हो गई।

लेकिन जाते-जाते वह एक वाक्य छोड़ गया—

“कभी-कभी अपने हक़ की रक्षा भी करनी पड़ती है।”

उसके जाने के बाद घर फिर पहले जैसा हो गया।

लेकिन वह एक वाक्य…

किसी अनदेखी गूँज की तरह दीवारों में रह गया।

रात गहरी थी।

नीम के पेड़ के नीचे पिता अकेले बैठे थे।

उन्होंने ऊपर आसमान की ओर देखा।

तारे वैसे ही थे।

चाँद भी वही था।

बस उनके मन में एक अनजानी बेचैनी उतर आई थी।

उन्होंने धीरे से कहा—

“हे ईश्वर…

अगर कभी मेरे बेटों के बीच कोई दीवार खड़ी हो,

तो पहले मुझे बुला लेना।

मैं अपने जीते-जी उनके बीच दूरी नहीं देख पाऊँगा।”

उसी समय दोनों भाई बाहर आए।

उन्होंने देखा—

पिता अकेले बैठे हैं।

दोनों बिना कुछ कहे उनके पास जाकर बैठ गए।

एक ने पिता का दायाँ हाथ पकड़ लिया।

दूसरे ने बायाँ।

पिता की आँखों से दो बूँद आँसू गिर पड़े।

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

“जब तक तुम दोनों मेरे दोनों हाथ बने रहोगे…

मुझे किसी सहारे की ज़रूरत नहीं।”

लेकिन…

समय के पास अपने प्रश्न थे।

और उन प्रश्नों का उत्तर अभी बाकी था…उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

ग्यारहवाँ अध्याय — “माँ की साँसों के सामने हर मतभेद छोटा पड़ गया”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

माँ…

यह शब्द केवल एक रिश्ता नहीं होता।

यह वह छाँव है, जिसके रहते धूप भी कम चुभती है।

लेकिन एक दिन…

उसी छाँव पर समय की नज़र पड़ गई।

सुबह का समय था।

आँगन में तुलसी के पास दीपक अभी भी जल रहा था।

माँ रोज़ की तरह जल्दी उठीं।

आँगन बुहारा।

चूल्हा जलाया।

आटा गूँथा।

सबके लिए चाय बनाई।

लेकिन जब रोटी बेलने लगीं, तो अचानक उनके हाथ काँप गए।

बेलन हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा।

आवाज़ सुनकर छोटी बहू दौड़ती हुई आई।

“अम्मा… क्या हुआ?”

माँ मुस्कुराईं।

“कुछ नहीं बेटी… बस थोड़ा चक्कर आ गया।”

इतने में बड़ा भाई भी आ गया।

उसने देखा कि माँ का चेहरा पीला पड़ गया है।

वह घबरा उठा।

“माँ, बैठ जाइए… काम बाद में हो जाएगा।”

माँ फिर वही पुरानी मुस्कान लेकर बोलीं—

“माँ अगर बैठ जाए बेटा…

तो घर भी बैठ जाता है।”

इतने में छोटा भाई भी आ गया।

उसने बिना एक पल गँवाए माँ का हाथ पकड़ लिया।

उसका स्वर काँप रहा था—

“भैया… चलो, अभी डॉक्टर के पास चलते हैं।”

पिता चारपाई से उठे।

उनके कदम लड़खड़ा रहे थे।

उन्होंने माँ की ओर देखा।

बरसों का साथ आँखों में उतर आया।

“चलो… देर मत करो।”

गाँव से कस्बे तक का रास्ता उस दिन बहुत लंबा लग रहा था।

बड़ा भाई गाड़ी चला रहा था।

छोटा पीछे बैठकर माँ का सिर अपनी गोद में संभाले हुए था।

बार-बार कहता—

“माँ… आँखें मत बंद करना।”

माँ हल्की मुस्कान के साथ बोलीं—

“अरे पगले…

मैं इतनी जल्दी कहीं नहीं जाने वाली।”

लेकिन उनकी आवाज़ में पहले जैसी ताक़त नहीं थी।

अस्पताल पहुँचे।

डॉक्टर ने जाँच की।

कुछ देर बाद बाहर आए।

उन्होंने कहा—

“घबराने की बात नहीं है, लेकिन इन्हें आराम की सख़्त ज़रूरत है।

अब ये पहले जितना काम नहीं करेंगी।”

दोनों भाइयों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

जैसे बिना बोले एक निर्णय हो गया हो।

घर लौटते ही बड़े भाई ने चूल्हा जलाया।

छोटे भाई ने आटा गूँथा।

बहुओं ने रसोई संभाली।

पिता ने पहली बार देखा—

उनकी पत्नी चारपाई पर आराम कर रही है…

और पूरा परिवार उनके चारों ओर खड़ा है।

माँ की आँखें भर आईं।

उन्होंने धीमे से कहा—

“आज पहली बार मुझे लग रहा है…

मैंने सच में बहुत बड़ा परिवार बनाया है।”

शाम को बड़ा भाई माँ के पैरों में तेल लगाने लगा।

छोटा उनके सिर में धीरे-धीरे तेल मल रहा था।

माँ ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

“जब तुम छोटे थे,

तो मैं तुम्हें सुलाती थी।

आज तुम मुझे सुला रहे हो।

भगवान हर माँ को ऐसे बेटे दे।”

पिता चुपचाप यह दृश्य देखते रहे।

उन्होंने मन ही मन सोचा—

“जिस घर में बेटे माँ के पैर दबाते हैं,

वहाँ सुख देर-सवेर लौट ही आता है।”

रात गहरी हो गई।

माँ सो चुकी थीं।

दोनों भाई आँगन में बैठे थे।

बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर छोटे ने धीरे से कहा—

“भैया…

अगर माँ को कुछ हो जाता,

तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता।”

बड़े भाई ने उसका कंधा थाम लिया।

“जब तक हम साथ हैं…

माँ और बाबूजी कभी अकेले नहीं होंगे।”

दोनों की आँखें नम थीं।

लेकिन उन आँसुओं में डर से ज़्यादा अपनापन था।

आँगन के बीचोंबीच खड़ा नीम हवा में धीरे-धीरे झूम रहा था।

उसकी पत्तियों की सरसराहट मानो कह रही थी—

**”याद रखना…

संकट हमेशा यह नहीं बताता कि कौन कितना मज़बूत है।

संकट यह बताता है कि कौन किसके साथ खड़ा है।”**

उस रात…

माँ चैन की नींद सोईं।

और दोनों भाई…

चारपाई के पास ज़मीन पर बैठे-बैठे ही सुबह होने का इंतज़ार करते रहे।

उन्हें लगता था—

अगर माँ की साँसें चलती रहें,

तो दुनिया की हर मुश्किल छोटी है।

लेकिन…

जीवन की राह में कभी-कभी सबसे कठिन मोड़ तब आता है,

जब सब कुछ ठीक होता हुआ भी दिखाई देता है…उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

बारहवाँ अध्याय — “पिता की आख़िरी सीख”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

समय…

कभी किसी के लिए नहीं रुकता।

वह हर दिन इंसान के चेहरे पर एक नई लकीर बना देता है।

माँ अब पहले से कुछ स्वस्थ थीं।

लेकिन पिता पहले जैसे नहीं रहे।

उनके कदम अब धीरे-धीरे चलते थे।

सुबह खेत जाने से पहले वे नीम के पेड़ के नीचे कुछ देर बैठते, मिट्टी की एक मुट्ठी उठाकर हथेली पर फैलाते और मुस्कुरा देते।

एक दिन बड़ा भाई उनके पास आकर बैठ गया।

“बाबूजी… क्या सोच रहे हैं?”

पिता ने मिट्टी को देखते हुए कहा—

“बेटा…

यह मिट्टी देख रहा हूँ।

जब तुम दोनों छोटे थे, इसी मिट्टी में नंगे पाँव दौड़ते थे।

आज इसी मिट्टी को जोतते हो।

कल यही मिट्टी तुम्हें याद करेगी।

लेकिन याद रखना…

मिट्टी कभी किसी की नहीं होती,

हम सब कुछ समय के मेहमान हैं।”

इतने में छोटा भाई भी आ गया।

वह पिता के पैरों के पास बैठ गया।

पिता ने दोनों बेटों के सिर पर हाथ रखा।

उनकी आँखों में वर्षों का अनुभव था।

उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

“आज मैं तुम दोनों से एक बात कहना चाहता हूँ।

शायद यह बात मैं कई बार कहना चाहता था,

पर हर बार सोचता था—

अभी समय है।

लेकिन अब समझ आया…

ज़रूरी बातें समय पर कह देनी चाहिए।”

दोनों भाई चुपचाप सुनते रहे।

नीम की पत्तियाँ हवा में हिल रही थीं।

दूर खेतों से बैलों की घंटियों की आवाज़ आ रही थी।

पिता बोले—

“जब तुम छोटे थे,

एक रोटी के लिए लड़ते थे।

फिर वही रोटी आधी-आधी बाँटकर खा लेते थे।

आज रोटियाँ बढ़ गई हैं…

पर दिल छोटे मत होने देना।

घर बड़ा हो जाए तो अच्छा है,

लेकिन मन कभी छोटा मत होने देना।”

कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा—

“लोग तुम्हें ज़मीन का हिसाब सिखाएँगे…

लेकिन कोई रिश्तों का हिसाब नहीं सिखाएगा।

याद रखना—

ज़मीन बाँटने से खेत अलग हो जाते हैं,

पर अगर मन बँट जाए…

तो पूरा परिवार उजड़ जाता है।”

दोनों भाइयों की आँखें नम हो चुकी थीं।

पिता ने बड़े भाई की ओर देखा—

“तू बड़ा है।

इसका मतलब यह नहीं कि तू हमेशा सही होगा।

बड़ा होने का मतलब है—

पहले माफ़ करना सीख।”

फिर छोटे भाई की ओर मुड़े—

“और तू छोटा है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर बात मन में रखेगा।

जिस दिन मन दुखे,

उसी दिन अपने भाई से कह देना।

चुप्पी…

सबसे बड़ा ज़हर होती है।”

आँगन में कुछ देर ऐसा सन्नाटा छा गया,

मानो हवा भी पिता की बात सुन रही हो।

माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।

उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

उन्होंने भगवान की ओर देखा और मन ही मन कहा—

“हे प्रभु…

मेरे बच्चों को यह सीख कभी मत भूलने देना।”

शाम ढल गई।

आसमान लाल हो गया।

पिता ने दोनों बेटों से कहा—

“चलो…

आज खेत नहीं चलते।

आज मेरे साथ पुराने कुएँ तक चलो।”

तीनों उसी पगडंडी से गुज़रे,

जहाँ कभी दोनों भाई पिता की उँगली पकड़कर चलते थे।

आज…

दोनों बेटों ने पिता का हाथ थाम रखा था।

पुराने कुएँ के पास पहुँचकर पिता रुक गए।

उन्होंने पानी में अपना चेहरा देखा।

फिर मुस्कुराए।

“देखो…

पानी में चेहरा तभी साफ़ दिखता है,

जब पानी शांत हो।

मन भी ऐसा ही होता है।

क्रोध की लहर उठ जाए,

तो अपना ही भाई पराया लगने लगता है।”

वापस लौटते समय सूरज डूब चुका था।

लंबी परछाइयाँ रास्ते पर साथ-साथ चल रही थीं।

पिता धीरे से बोले—

“अगर कभी ऐसा समय आए…

जब तुम्हें लगे कि साथ रहना कठिन हो गया है,

तो एक बार इस पगडंडी पर लौट आना।

याद करना—

यहीं तुम दोनों ने दौड़ना सीखा था।

यहीं गिरकर एक-दूसरे को उठाया था।

शायद यह रास्ता तुम्हें फिर से भाई बना दे।”

उस रात…

दोनों भाई देर तक सो नहीं सके।

पिता के हर शब्द उनके मन में गूँज रहे थे।

उन्हें क्या पता था…

समय बहुत जल्द इन्हीं शब्दों की परीक्षा लेने वाला है।

और परीक्षा इतनी कठिन होगी कि…

जीतेगा वही,

जो अपने अहंकार से पहले अपने भाई को चुनेगा।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

तेरहवाँ अध्याय — “वह रात, जब पिता पहली बार कमज़ोर दिखाई दिए”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

उस दिन शाम कुछ अलग थी।

सूरज रोज़ की तरह ही डूबा था,

लेकिन उसकी लालिमा में एक अनजानी उदासी घुली हुई थी।

खेतों से लौटते समय पिता पहले से ज़्यादा थके हुए लग रहे थे।

पगडंडी पर चलते-चलते वे एक पल को रुके।

अपने सीने पर हाथ रखा।

फिर मुस्कुराकर बोले—

“शायद अब उम्र सचमुच अपनी बात मनवाने लगी है।”

बड़ा भाई तुरंत उनके पास आया।

“बाबूजी, आइए… मैं सहारा देता हूँ।”

पिता हँस पड़े।

“अरे, अभी इतना भी बूढ़ा नहीं हुआ कि दो कदम चलने के लिए सहारा चाहिए।”

लेकिन उनकी आवाज़ में पहले जैसी दृढ़ता नहीं थी।

घर पहुँचे।

माँ ने देखा कि आज उन्होंने बिना कुछ कहे चारपाई पकड़ ली।

यह पहली बार था।

वह चुपचाप उनके पास बैठ गईं।

“क्या बात है?”

“कुछ नहीं…

बस थोड़ा-सा दर्द है।”

माँ उन्हें सबसे ज़्यादा जानती थीं।

उन्होंने समझ लिया—

बात “थोड़े दर्द” की नहीं है।

रात का खाना तैयार हुआ।

पहली बार पिता ने आधी रोटी ही खाई।

बड़े भाई ने पूछा—

“और लाऊँ?”

उन्होंने सिर हिलाया।

“आज भूख नहीं है बेटा।”

यह सुनकर छोटे भाई ने उनकी ओर देखा।

उसे अपना बचपन याद आ गया।

जब वह खाना नहीं खाता था,

तो यही पिता उसे कंधे पर बिठाकर पूरे आँगन में घुमाते थे और कहते—

“चलो, अब एक कौर चिड़िया का…

एक कौर मेरे शेर का।”

आज वही पिता आधी रोटी छोड़कर उठ गए थे।

रात गहरा चुकी थी।

सब सो गए।

लेकिन छोटे भाई की नींद बार-बार खुल रही थी।

वह उठकर पिता की चारपाई के पास जाता।

देखता—

वे सो रहे हैं या नहीं।

एक बार पिता ने आँखें खोल दीं।

धीरे से बोले—

“सो जा बेटा…

मैं ठीक हूँ।”

छोटे भाई ने मुस्कुराने की कोशिश की।

“जब तक आप ठीक हैं,

तभी तक मेरी नींद पूरी होती है, बाबूजी।”

पिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उस हाथ में अब पहले जैसी ताक़त नहीं थी,

लेकिन अपनापन पहले से भी गहरा था।

सुबह होने से पहले पिता की खाँसी तेज़ हो गई।

आवाज़ सुनकर पूरा घर जाग गया।

माँ घबरा गईं।

बड़ी बहू पानी लेकर आई।

छोटी बहू दवा ढूँढ़ने लगी।

बड़ा भाई डॉक्टर को बुलाने दौड़ा।

छोटा पिता के सिरहाने बैठ गया।

वह बार-बार उनका माथा सहला रहा था।

उसकी आँखों से आँसू टपक रहे थे।

पिता ने काँपते हाथ से उसके आँसू पोंछे।

“रोते क्यों हो?

मैंने तुम्हें रोना नहीं…

मुश्किलों के सामने खड़ा होना सिखाया है।”

इतने में बड़ा भाई डॉक्टर को लेकर आ गया।

जाँच हुई।

दवा दी गई।

डॉक्टर ने कहा—

“घबराइए नहीं…

लेकिन अब इनका विशेष ध्यान रखना होगा।

उम्र का असर है।

इन्हें आराम चाहिए,

और सबसे ज़्यादा चाहिए…

परिवार का साथ।”

डॉक्टर चले गए।

आँगन में सन्नाटा फैल गया।

नीम का पेड़ बिल्कुल स्थिर खड़ा था।

जैसे वह भी इस घर की चिंता में डूब गया हो।

दोपहर को पिता की तबीयत कुछ संभली।

उन्होंने दोनों बेटों को अपने पास बुलाया।

दोनों उनके चरणों के पास बैठ गए।

उन्होंने एक-एक हाथ दोनों के सिर पर रखा।

फिर बहुत धीमे स्वर में बोले—

“ज़िंदगी का भरोसा नहीं होता बेटा…

लेकिन मुझे तुम दोनों पर भरोसा है।

वादा करो…

मेरे बाद भी यह आँगन खाली नहीं होने दोगे।

इस घर की चौखट पर कभी नफ़रत कदम नहीं रखेगी।”

दोनों भाइयों ने एक साथ पिता का हाथ पकड़ लिया।

उनकी आवाज़ भर्रा गई—

“बाबूजी…

जब तक हमारी साँस चलेगी,

आपकी सीख हमारे घर की दीवार बनी रहेगी।”

पिता मुस्कुराए।

उनकी आँखों के कोनों में चमकती नमी थी।

शायद उन्हें अपने बेटों पर विश्वास था।

लेकिन…

समय अक्सर विश्वास की नहीं,

इंसान की परिस्थितियों की परीक्षा लेता है।

और वह परीक्षा…

अब बहुत दूर नहीं थी।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

चौदहवाँ अध्याय — “पिता की विरासत”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

उस सुबह सूरज तो रोज़ की तरह ही निकला था,

लेकिन घर के आँगन में एक अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई थी।

नीम के पेड़ पर बैठी चिड़ियाँ भी जैसे धीमे स्वर में बोल रही थीं।

पिता चारपाई पर बैठे थे।

चेहरे पर कमजोरी थी,

पर आँखों में वही अपनापन, वही स्नेह और वही गहराई थी जिसने इस घर को वर्षों तक एक सूत्र में बाँधकर रखा था।

उन्होंने धीरे से आवाज़ लगाई—

“दोनों बेटों को बुलाओ…”

बड़ा भाई आया।

छोटा भाई भी पास बैठ गया।

दोनों ने पिता के चरण छुए।

पिता ने उन्हें अपने पास बैठा लिया।

कुछ पल तक वे दोनों को देखते रहे।

जैसे बरसों की यादें उनकी आँखों के सामने चल रही हों—

दो नन्हे बच्चे…

एक थाली…

एक बस्ता…

एक पगडंडी…

एक माँ की गोद…

एक पिता का कंधा…

फिर उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

“बेटा…

मैंने तुम्हारे लिए महल नहीं बनाए।

बहुत धन भी नहीं जोड़ पाया।

लेकिन जो कुछ दिया…

वह किसी दौलत से कम नहीं है।”

दोनों भाई चुपचाप सुनते रहे।

“मैंने तुम्हें एक-दूसरे का साथ दिया।

याद रखना…

दुनिया का सबसे अमीर आदमी वह नहीं,

जिसके पास सबसे ज़्यादा ज़मीन हो।

सबसे अमीर वह है,

जिसके दुख में उसका अपना भाई उसके कंधे पर हाथ रख दे।”

बड़े भाई की आँखों से आँसू टपक पड़े।

छोटे ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया।

पिता मुस्कुराए।

“बस…

यही हाथ कभी मत छोड़ना।”

कुछ देर बाद उन्होंने माँ की ओर देखा।

माँ चुप थीं।

उनके आँसू बोल रहे थे।

पिता ने कहा—

“बच्चों…

तुम्हारी माँ ने इस घर को अपने हाथों से नहीं,

अपने त्याग से बनाया है।

जिस दिन तुम उनकी आँखों में अकेलापन देखोगे,

समझ लेना कि तुम मुझसे किया वादा भूल गए।”

आँगन में सन्नाटा छा गया।

दूर मंदिर की घंटी सुनाई दी।

हवा का एक हल्का झोंका आया।

नीम के कुछ पत्ते आँगन में गिर पड़े।

पिता ने उन्हें देखते हुए कहा—

“पेड़ के पत्ते गिरते रहते हैं…

लेकिन जड़ें साथ रहती हैं।

तुम भी ऐसे ही रहना।

समय चाहे जितना बदल जाए,

तुम्हारी जड़ें कभी अलग नहीं होनी चाहिए।”

उन्होंने दोनों भाइयों के हाथ अपने हाथों में रख दिए।

उनकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी—

“अगर कभी किसी बात पर मतभेद हो…

तो फैसला करने से पहले

अपने बचपन को याद कर लेना।

याद करना…

जब एक रोटी के दो टुकड़े करके खाते थे।

याद करना…

जब बारिश में एक-दूसरे को भीगने से बचाते थे।

याद करना…

जब तुम दोनों ने कहा था—

‘हम कभी अलग नहीं होंगे।’

हो सकता है…

तुम्हारा गुस्सा हार जाए,

और तुम्हारा भाई जीत जाए।”

इतना कहकर पिता ने आँखें बंद कर लीं।

कमरे में कोई शब्द नहीं था।

सिर्फ़ साँसों की धीमी आवाज़ थी।

दोनों भाई पिता के चरणों के पास बैठे रहे।

माँ भगवान की मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर खड़ी थीं।

उस दिन किसी ने भोजन की बात नहीं की।

किसी ने खेतों की बात नहीं की।

पूरा घर केवल एक ही प्रार्थना कर रहा था—

“हे प्रभु, हमारे पिता का साया हमारे सिर पर बना रहे।”

और उस शाम…

डूबते सूरज की किरणें आँगन में ऐसे बिखरीं,

मानो समय खुद इस घर की चौखट पर ठहर गया हो।

लेकिन…

हर ठहराव के बाद एक नया सफ़र शुरू होता है।

अब इस परिवार का सबसे कठिन सफ़र शुरू होने वाला था।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

पंद्रहवाँ अध्याय — “जब पिता की चारपाई खाली रह गई”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

घर…

वही था।

वही मिट्टी का आँगन।

वही तुलसी का चौरा।

वही नीम का पेड़।

वही दीवारें।

लेकिन फिर भी…

सब कुछ बदल चुका था।

क्योंकि उस आँगन के एक कोने में पड़ी वह पुरानी चारपाई अब खाली थी।

वही चारपाई…

जिस पर बैठकर पिता शाम को खेतों की बातें किया करते थे।

वही चारपाई…

जहाँ बैठकर वे अपने पोतों को कहानियाँ सुनाते थे।

आज उस पर केवल एक तह किया हुआ कंबल रखा था।

ऐसा लगता था मानो वह भी अपने मालिक की राह देख रहा हो।

माँ हर सुबह आदत से मजबूर होकर उसी चारपाई की ओर देखतीं।

फिर अचानक याद आता…

अब वहाँ कोई नहीं बैठेगा।

उनकी आँखें भर आतीं।

लेकिन वे आँसू पोंछ लेतीं।

क्योंकि उन्हें पता था…

अगर वे टूट गईं,

तो पूरा घर बिखर जाएगा।

बड़ा भाई अब पहले से भी ज़्यादा चुप रहने लगा था।

वह सुबह सबसे पहले उठता।

आँगन बुहारता।

गाय को चारा डालता।

फिर बिना कुछ कहे खेत चला जाता।

उधर छोटा भाई हर शाम लौटते समय उसी पगडंडी पर कुछ पल रुक जाता,

जहाँ पिता बैठकर मिट्टी की मुट्ठी उठाया करते थे।

वह झुककर मिट्टी को हाथ में लेता।

फिर धीरे से अपनी आँखों से लगा लेता।

मानो उसमें अभी भी पिता के हाथों की गर्माहट बची हो।

एक दिन छोटा भाई घर लौटा,

तो उसने देखा—

माँ पिता की पुरानी लाठी को कपड़े से साफ़ कर रही थीं।

उसने पूछा—

“माँ…

इसे क्यों सँभाल रही हो?”

माँ मुस्कुराईं,

लेकिन वह मुस्कान बहुत थकी हुई थी।

उन्होंने कहा—

“बेटा…

यह लाठी नहीं…

तुम्हारे बाबूजी का सहारा है।

जब इसे देखती हूँ,

तो लगता है जैसे वे अभी दरवाज़े से अंदर आ जाएँगे और कहेंगे—

‘अरी, ज़रा पानी तो देना।'”

इतना कहते-कहते उनकी आवाज़ भर्रा गई।

छोटा भाई माँ के पास बैठ गया।

उसने माँ का हाथ अपने हाथों में ले लिया।

उसी समय बड़ा भाई भी आ गया।

उसने बिना कुछ कहे माँ के चरण छू लिए।

माँ ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

“तुम दोनों को देखकर ही अब जी लेती हूँ।”

उस दिन शाम को दोनों भाई पिता की चारपाई के पास बैठ गए।

बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर बड़ा भाई धीमे से बोला—

“याद है…

बाबूजी कहते थे—

‘घर की सबसे मज़बूत दीवार ईंटों की नहीं, भाइयों की होती है।'”

छोटे भाई की आँखें भर आईं।

उसने कहा—

“भैया…

हम वह दीवार कभी टूटने नहीं देंगे।”

दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया।

आँगन में बैठी माँ यह दृश्य देख रही थीं।

उनके होंठों पर वर्षों बाद सच्ची मुस्कान आई।

उन्होंने मन ही मन भगवान से कहा—

“हे प्रभु…

अब मुझे किसी धन की इच्छा नहीं।

बस मेरे बेटों का यह हाथ कभी न छूटे।”

रात गहरी हो चुकी थी।

नीम के पत्ते हवा में धीरे-धीरे हिल रहे थे।

ऐसा लगता था जैसे पिता की आवाज़ अब भी वहीं कहीं गूँज रही हो—

“साथ रहना बेटा…
साथ रहना…”

लेकिन…

समय की चाल बहुत धीमी होती है।

वह पहले इंसान के जीवन में ज़िम्मेदारियाँ बढ़ाता है।

फिर थकान।

फिर अपेक्षाएँ।

और अगर सावधानी न बरती जाए…

तो उन्हीं अपेक्षाओं के बीच रिश्तों की आवाज़ धीमी पड़ने लगती है।

दोनों भाइयों को अभी इसका आभास नहीं था।

वे आज भी एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे थे।

पर आने वाले दिनों में…

जीवन उनसे एक ऐसा निर्णय करवाने वाला था,

जो केवल ज़मीन का नहीं,

दिलों का इम्तिहान बनने वाला था।

और शायद तभी…

इस उपन्यास का सबसे बड़ा प्रश्न जन्म लेगा—

“जब पिता की सबसे बड़ी विरासत भाईचारा था…
तो फिर बँटवारा क्यों हुआ?”उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

सोलहवाँ अध्याय — “दूरी कभी कदमों से नहीं, ज़िम्मेदारियों से शुरू होती है”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

पिता के जाने के बाद…

घर का दरवाज़ा तो वही था,

लेकिन उसे खोलने वाली आवाज़ बदल गई थी।

अब कोई सुबह यह नहीं कहता था—

“चलो बेटा, खेत चलते हैं…”

अब दोनों भाई खुद ही समय देखकर उठ जाते।

माँ की आँखें अब पहले से कमज़ोर हो चली थीं।

फिर भी वह रोज़ सबसे पहले जागतीं।

तुलसी पर जल चढ़ातीं।

आँगन में दीप जलातीं।

और भगवान से बस एक ही प्रार्थना करतीं—

“मेरे बच्चों के मन में कभी दूरी मत आने देना।”

समय बीतता गया।

बच्चे बड़े होने लगे।

उनकी पढ़ाई का खर्च बढ़ा।

खेतों में मेहनत भी पहले से ज़्यादा करनी पड़ती।

बारिश कभी समय पर होती,

कभी बिल्कुल नहीं।

फसल अच्छी होती तो घर में मुस्कान लौट आती।

फसल कम होती तो सब अपने-अपने खर्च कम कर देते।

एक दिन छोटा भाई अपने बेटे की किताबों की सूची लेकर बैठा था।

किताबें ज़रूरी थीं।

उधर बड़ा भाई बीज और खाद का हिसाब देख रहा था।

दोनों की ज़रूरतें सही थीं।

दोनों की चिंताएँ भी सही थीं।

लेकिन जीवन का सबसे कठिन सच यही है—

कई बार दो सही बातें भी एक साथ पूरी नहीं हो पातीं।

बड़े भाई ने कहा—

“पहले बीज ले लेते हैं।

फसल अच्छी होगी तो बाकी सब भी हो जाएगा।”

छोटे भाई ने शांत स्वर में कहा—

“हाँ भैया…

लेकिन बच्चों की पढ़ाई भी नहीं रुकनी चाहिए।”

कुछ पल के लिए दोनों चुप हो गए।

यह झगड़ा नहीं था।

यह दो ज़िम्मेदारियों का सामना था।

माँ दूर बैठी यह सब देख रही थीं।

उन्होंने धीरे से अपनी पुरानी संदूकची खोली।

उसमें एक कपड़े की छोटी-सी पोटली रखी थी।

उस पोटली में उनकी बरसों पुरानी चाँदी की पायल थी।

वह दोनों बेटों के पास आईं।

“इसे बेच दो।”

दोनों भाई एक साथ बोल पड़े—

“नहीं माँ!”

माँ मुस्कुराईं।

“जब तुम छोटे थे,

तब तुम्हारी एक मुस्कान के लिए मैंने अपने कितने सपने छोड़ दिए थे।

आज अगर मेरे गहने तुम्हारे काम आ जाएँ,

तो समझूँगी कि वे सचमुच गहने थे।”

बड़े भाई की आँखें भर आईं।

उसने पायल वापस माँ के हाथों में रख दी।

“जब तक हमारे हाथ काम कर रहे हैं,

आपका कोई गहना नहीं बिकेगा।”

छोटे भाई ने बड़े भाई का हाथ थाम लिया।

“भैया…

हम रात को भी मेहनत करेंगे।

लेकिन माँ की निशानी नहीं बेचेंगे।”

उस रात दोनों भाई देर तक खेत में काम करते रहे।

चाँदनी खेतों पर बिखरी हुई थी।

दूर कहीं सियार की आवाज़ आ रही थी।

थके हुए हाथों से भी वे काम करते रहे।

क्योंकि उन्हें पता था—

परिवार केवल प्रेम से नहीं चलता,

उसके लिए परिश्रम भी उतना ही ज़रूरी है।

घर लौटे तो माँ दरवाज़े पर बैठी थीं।

उन्होंने दोनों के माथे का पसीना अपने आँचल से पोंछा।

धीरे से बोलीं—

“तुम दोनों को देखकर लगता है…

तुम्हारे बाबूजी कहीं गए नहीं।

बस दो रूपों में मेरे सामने खड़े हैं।”

दोनों भाई माँ की गोद में सिर रखकर बैठ गए।

कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

उस मौन में भी अपनापन था।

लेकिन…

उसी गाँव में कुछ लोग अब भी बातें कर रहे थे।

“इतना बड़ा परिवार…

देखना, कब तक साथ रहता है।”

उन्हें क्या पता था—

घर बाहर वालों की बातों से नहीं,

अंदर वालों की चुप्पियों से टूटते हैं।

और समय…

धीरे-धीरे उन्हीं चुप्पियों की ओर बढ़ रहा था।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

सत्रहवाँ अध्याय — “जब ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं, लेकिन दिल अभी भी एक था”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

समय का पहिया बिना आवाज़ किए घूमता रहा।

कभी जिन नन्हे कदमों की आहट इस आँगन में गूँजती थी,

आज वही बच्चे स्कूल से लौटकर अपने-अपने बस्ते एक कोने में रख देते थे।

घर में अब चहल-पहल पहले से ज़्यादा थी।

खर्च भी।

एक शाम दोनों भाई पुराने नीम के नीचे बैठकर हिसाब देख रहे थे।

एक कॉपी खुली थी।

उसमें बीज का खर्च लिखा था।

खाद का।

बिजली का।

बच्चों की फीस का।

दवा का।

और आख़िर में…

एक लंबी खाली जगह।

बड़े भाई ने मुस्कुराकर कहा—

“लगता है, खर्च लिखते-लिखते कॉपी छोटी पड़ गई।”

छोटा भाई भी हँस पड़ा।

“भैया, कॉपी छोटी नहीं पड़ी…

हमारे सपने बड़े हो गए हैं।”

दोनों हँसे।

लेकिन उस हँसी के पीछे चिंता साफ़ दिखाई देती थी।

उसी समय माँ चाय लेकर आईं।

उन्होंने कॉपी पर नज़र डाली।

फिर दोनों बेटों को देखा।

धीरे से बोलीं—

“बेटा…

हिसाब रखना अच्छी बात है।

लेकिन कभी यह मत होने देना कि हिसाब रिश्तों से बड़ा हो जाए।”

दोनों भाइयों ने सिर झुका दिया।

यह वही माँ थीं,

जो बिना हिसाब के अपना पूरा जीवन परिवार पर लुटा चुकी थीं।

अगले सप्ताह खेत में अच्छी बारिश हुई।

फसल लहलहा उठी।

पूरा परिवार खुश था।

बच्चे खेत में दौड़ रहे थे।

बड़े भाई ने हँसते हुए कहा—

“देख छोटू…

इन्हें देखकर अपना बचपन याद आ गया।”

छोटे भाई ने मुस्कुराकर जवाब दिया—

“बस फ़र्क इतना है…

तब बाबूजी हमें देखते थे,

आज शायद ऊपर से देख रहे होंगे।”

दोनों कुछ पल के लिए आसमान की ओर देखने लगे।

हवा चली।

गेहूँ की बालियाँ एक साथ झूम उठीं।

ऐसा लगा,

जैसे खेत भी कह रहे हों—

“साथ रहो…”

लेकिन गाँव की चौपाल पर फिर वही चर्चाएँ शुरू थीं।

“अब बच्चों की पढ़ाई अलग होगी।”

“कल को शादियाँ होंगी।”

“इतने बड़े परिवार में कब तक निभेगा?”

एक बुज़ुर्ग ने धीरे से कहा—

“रिश्ते निभाने से निभते हैं…

बँटवारे से नहीं।”

लेकिन उसकी बात पर कम लोगों ने ध्यान दिया।

शाम को छोटा भाई बाज़ार से लौटा।

उसके हाथ में बच्चों के लिए दो एक जैसी कॉपियाँ थीं।

बड़े भाई ने पूछा—

“दोनों एक जैसी क्यों?”

छोटा मुस्कुराया।

“ताकि कोई बच्चा यह न सोचे कि दादा का प्यार कम-ज्यादा था।”

बड़े भाई की आँखें भर आईं।

उसे अपना बचपन याद आया।

एक बस्ता।

एक स्लेट।

एक सपना।

उसने छोटे के कंधे पर हाथ रखा।

“तू आज भी वैसा ही है…”

छोटा हँसा।

“और आप आज भी वैसे ही हैं…

पहले अपनी खुशी छोड़कर मेरी सोचते हैं।”

रात को माँ ने भगवान के सामने दीपक जलाया।

उन्होंने आँखें बंद करके प्रार्थना की—

“हे प्रभु…

अगर मेरे घर पर कोई परीक्षा आए,

तो पहले मेरे बच्चों के दिल मज़बूत करना।

क्योंकि टूटा हुआ मन…

किसी भी टूटे हुए घर से ज़्यादा दर्द देता है।”

उस रात…

आँगन में चाँदनी फैली थी।

दोनों भाई चारपाई पर बैठे देर तक बातें करते रहे।

बचपन।

पिता।

माँ।

खेत।

बारिश।

सब याद करते रहे।

उन्हें क्या पता था—

जीवन की सबसे कठिन परीक्षा अक्सर उसी समय आती है,

जब इंसान को लगता है कि अब सब ठीक है।

और दूर कहीं…

एक नया सवेरा उनके जीवन का सबसे कठिन सवाल लेकर आने वाला था।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

अठारहवाँ अध्याय — “सूखे खेत और भीगे हुए मन”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता।

जिस खेत में कभी हरियाली लहराती थी,

उसी खेत की मिट्टी कभी-कभी प्यास से फट भी जाती है।

उस वर्ष भी कुछ ऐसा ही हुआ।

सावन आया…

पर बादल केवल आसमान में घूमते रहे।

धरती की प्यास वैसी ही रही।

हर सुबह दोनों भाई आसमान की ओर देखते।

दोपहर तक उम्मीद करते।

शाम होते-होते बिना कुछ कहे घर लौट आते।

खेत की मेड़ों पर दरारें पड़ने लगी थीं।

ऐसा लगता था,

मानो धरती भी किसी इंतज़ार में थक गई हो।

एक शाम बड़ा भाई मिट्टी की मुट्ठी उठाकर बोला—

“देख छोटू…

इस मिट्टी को पानी की उतनी ही ज़रूरत है,

जितनी रिश्तों को विश्वास की।”

छोटे भाई ने धीरे से उत्तर दिया—

“और अगर दोनों ही कम पड़ जाएँ…

तो फसल भी सूख जाती है,

और अपनापन भी।”

दोनों कुछ देर तक मौन रहे।

दूर क्षितिज पर बादल थे,

लेकिन उनके गाँव तक आने का नाम नहीं ले रहे थे।

घर लौटने पर माँ ने दोनों के चेहरे पढ़ लिए।

उन्होंने बिना पूछे ही पानी का लोटा आगे कर दिया।

“आज भी बारिश नहीं हुई?”

दोनों ने चुपचाप सिर हिला दिया।

माँ ने आसमान की ओर देखा।

“ईश्वर देर करता है,

अँधेर नहीं।”

लेकिन उस दिन उनकी अपनी आवाज़ में भी पहले जैसा भरोसा नहीं था।

रात को दोनों भाई खर्च का हिसाब देखने बैठे।

बीज उधार के थे।

खाद उधार की थी।

सिंचाई का खर्च अलग।

उधर बच्चों की स्कूल फीस की तारीख़ भी पास थी।

कॉपी के आख़िरी पन्ने पर बड़ा भाई देर तक उँगली फेरता रहा।

फिर बोला—

“अगर इस बार फसल नहीं हुई…

तो शायद कुछ समय के लिए खर्च रोकने पड़ेंगे।”

छोटे भाई ने पूछा—

“कौन-सा खर्च, भैया?”

बड़ा भाई कुछ पल चुप रहा।

उसकी नज़र बच्चों की किताबों पर पड़ी।

फिर माँ की दवाइयों पर।

फिर खेत के औज़ारों पर।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि किसे ज़रूरी कहे और किसे टाल दे।

छोटे भाई ने उसकी दुविधा समझ ली।

उसने कॉपी बंद कर दी।

“आज हिसाब नहीं करते।

आज बस साथ बैठते हैं।”

दोनों नीम के पेड़ के नीचे आकर बैठ गए।

हवा गर्म थी।

पत्ते भी थके हुए लग रहे थे।

छोटा भाई बोला—

“भैया…

याद है बचपन में जब बारिश नहीं होती थी,

तो बाबूजी हमें लेकर मंदिर जाते थे।

वह कहते थे—

‘बारिश माँगने से पहले हिम्मत माँगो।'”

बड़े भाई की आँखें भर आईं।

“हाँ…

और लौटते समय वे कहते थे—

‘फसल सूख जाए तो फिर उग जाएगी,

लेकिन भाई का भरोसा सूख गया,

तो उसे कोई मौसम हरा नहीं कर सकता।'”

दोनों ने एक साथ आसमान की ओर देखा।

उसी समय हवा का एक तेज़ झोंका आया।

कुछ सूखे पत्ते नीम से टूटकर नीचे गिरे।

बड़ा भाई उन्हें उठाने लगा।

छोटा मुस्कुराया—

“गिरे हुए पत्ते वापस शाख पर नहीं लगते,

लेकिन पेड़ उन्हें कभी अपना मानना नहीं छोड़ता।”

बड़े भाई ने उसकी ओर देखा।

उसकी आँखों में गर्व था।

“तू हर बात में बाबूजी की सीख ढूँढ़ ही लेता है।”

छोटा हँस पड़ा।

“क्योंकि बाबूजी चले गए…

लेकिन उनकी बातें अभी भी यहीं हैं।”

उस रात बारिश नहीं हुई।

लेकिन दोनों भाइयों ने खेत की रखवाली की।

एक ही चारपाई पर बैठे-बैठे सुबह हो गई।

सुबह की पहली किरण के साथ माँ उनके लिए चाय लेकर आईं।

दोनों को साथ बैठा देखकर उनके चेहरे पर संतोष उतर आया।

उन्होंने मन ही मन कहा—

“हे प्रभु…
फसल चाहे आधी देना,
पर मेरे बेटों का साथ पूरा रखना।”

लेकिन…

समय की किताब में अगला पन्ना खुलने वाला था।

और उस पन्ने पर लिखा था—

“कभी-कभी इंसान को सबसे कठिन निर्णय तब लेने पड़ते हैं,
जब उसके पास कोई आसान रास्ता बचा ही नहीं होता।”उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

उन्नीसवाँ अध्याय — “जब चौपाल की एक बात मन तक पहुँच गई”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

गाँव की चौपाल…

सिर्फ़ चारपाइयों का मेल नहीं होती।

वहाँ किस्से भी जन्म लेते हैं,

सलाहें भी,

और कभी-कभी ऐसी बातें भी,

जो वर्षों तक किसी के मन में गूँजती रहती हैं।

उस दिन शाम ढल रही थी।

सूरज गेहूँ के खाली खेतों के पीछे उतर रहा था।

दोनों भाई खेत से लौटते समय चौपाल पर कुछ देर बैठ गए।

वहाँ गाँव के कई बुज़ुर्ग बैठे थे।

उनमें से एक थे रामदास काका।

सफ़ेद दाढ़ी,

झुकी हुई कमर,

लेकिन जीवन का लंबा अनुभव उनकी आँखों में साफ़ दिखाई देता था।

उन्होंने दोनों भाइयों को पास बुलाया।

“आओ बेटा…

बैठो।”

दोनों आदर से उनके चरण छूकर बैठ गए।

कुछ देर तक खेती, मौसम और गाँव की बातें होती रहीं।

फिर रामदास काका ने बड़े भाई की ओर देखकर पूछा—

“थक जाते हो न?”

बड़े भाई ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“थोड़ा बहुत तो हर किसान थकता है, काका।”

काका ने छोटे भाई की ओर देखा।

“और तू?”

“जब तक भैया साथ हैं,

थकान भी आधी लगती है।”

काका मुस्कुराए।

“यही बात कभी मत भूलना।”

इतने में चौपाल पर बैठे एक दूसरे आदमी ने बात छेड़ दी।

“रामदास जी,

आप भी इन्हें समझाइए।

इतना बड़ा परिवार है।

आज नहीं तो कल अलग होना ही पड़ेगा।”

चौपाल पर कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

रामदास काका ने उसकी ओर देखा।

फिर बहुत शांत स्वर में बोले—

“अलग चूल्हा होना और अलग दिल होना…

दोनों एक बात नहीं हैं।”

सब लोग उनकी ओर देखने लगे।

उन्होंने आगे कहा—

“मैंने ऐसे घर भी देखे हैं,

जहाँ दो भाई अलग-अलग घरों में रहते हैं,

फिर भी एक-दूसरे के बिना खाना नहीं खाते।

और ऐसे भी देखे हैं,

जो एक ही छत के नीचे रहते हैं,

लेकिन बरसों बात नहीं करते।”

बड़े भाई ने गहरी साँस ली।

छोटे भाई ने सिर झुका लिया।

रामदास काका ने दोनों के कंधों पर हाथ रखा।

“याद रखना…

अगर कभी ज़िम्मेदारियाँ बाँटनी पड़ें,

तो उन्हें बाँटना।

लेकिन माँ का सम्मान,

पिता की सीख,

और भाई का हाथ…

कभी मत बाँटना।”

ये शब्द दोनों भाइयों के मन में उतर गए।

घर लौटते समय रास्ता शांत था।

नीम के पत्तों से हवा सरसराती हुई गुज़र रही थी।

काफ़ी देर तक दोनों चुप रहे।

फिर छोटे भाई ने धीरे से पूछा—

“भैया…

अगर कभी हालात ऐसे हो जाएँ कि कोई कठिन फैसला लेना पड़े…

तो क्या करेंगे?”

बड़े भाई ने बिना देर किए उत्तर दिया—

“सबसे पहले तुमसे बात करूँगा।

क्योंकि जो फैसला भाई से छिपाकर लिया जाए,

वह फैसला नहीं,

रिश्ते पर बोझ बन जाता है।”

छोटे भाई की आँखें भर आईं।

उसने चलते-चलते बड़े भाई का हाथ पकड़ लिया।

“मुझसे वादा कीजिए…

हमारे बीच कभी चुप्पी नहीं आएगी।”

बड़े भाई ने उसका हाथ कसकर थाम लिया।

“वादा।”

उसी समय दूर मंदिर की घंटी बजने लगी।

जैसे उस वादे की साक्षी स्वयं समय बन गया हो।

घर पहुँचे तो माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।

उन्होंने दोनों को साथ आते देखा।

चेहरे पर हल्की मुस्कान फैल गई।

“आज बाबूजी होते…

तो तुम दोनों को देखकर कितना खुश होते।”

दोनों भाई एक साथ पिता की खाली चारपाई के पास गए।

कुछ पल मौन खड़े रहे।

फिर बड़े भाई ने धीमे स्वर में कहा—

“बाबूजी…

हमने आज भी आपका वादा निभाया है।”

लेकिन…

जीवन की कठिनाइयाँ केवल वादों से नहीं टलतीं।

उनके लिए धैर्य,

त्याग,

और निरंतर संवाद चाहिए।

और समय…

अब इन्हीं तीनों की परीक्षा लेने वाला था।

नीम के पेड़ से एक सूखा पत्ता टूटा।

हवा उसे दूर तक उड़ाकर ले गई।

पेड़ वहीं खड़ा रहा।

मज़बूत।

अडिग।

मानो कह रहा हो—

“शाखाएँ दूर दिखाई दें तो भी,
जड़ों का साथ मत छोड़ना।”उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

बीसवाँ अध्याय — “फ़ैसला ज़मीन का नहीं, ज़िम्मेदारियों का था”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

सर्दियों की एक धुँधली सुबह थी।

सूरज बादलों की ओट से झाँकने की कोशिश कर रहा था, लेकिन धुँध इतनी घनी थी कि सामने खड़ा नीम का पेड़ भी धुंधला दिखाई दे रहा था।

बड़ा भाई आँगन में बैठा पुरानी हिसाब-किताब की कॉपी पलट रहा था।

हर पन्ने पर एक कहानी लिखी थी—

कहीं बीज का उधार,

कहीं खाद का खर्च,

कहीं माँ की दवा,

कहीं बच्चों की स्कूल की फीस।

कॉपी के आख़िरी पन्ने पर पिता की लिखावट थी—

“मेहनत कभी उधार नहीं रहती।”

उस एक पंक्ति पर बड़े भाई की उँगलियाँ ठहर गईं।

उसकी आँखें भीग गईं।

उसी समय छोटा भाई चाय लेकर आया।

उसने देखा कि बड़े भाई की नज़र उसी पन्ने पर टिकी हुई है।

वह बिना कुछ बोले उनके पास बैठ गया।

कुछ देर दोनों चुप रहे।

फिर छोटा बोला—

“भैया…

अगर बाबूजी होते तो क्या करते?”

बड़े भाई ने कॉपी बंद कर दी।

धीरे से कहा—

“वो शायद पहले हम दोनों को साथ बैठाते…

फिर कोई रास्ता निकालते।”

इसी बीच गाँव के सहकारी बैंक से संदेश आया।

पुराना कृषि ऋण चुकाने की तारीख़ नज़दीक थी।

अगर समय पर भुगतान न हुआ, तो अगली फसल के लिए नया ऋण मिलना कठिन हो सकता था।

दोनों भाई देर तक बैठकर सोचते रहे।

घर में किसी ने ऊँची आवाज़ में बात नहीं की।

कोई आरोप नहीं था।

कोई शिकायत नहीं थी।

बस एक प्रश्न था—

“सबकी ज़रूरतें कैसे पूरी हों?”

शाम को माँ ने दोनों को अपने पास बुलाया।

उन्होंने पिता की पुरानी पगड़ी संदूक से निकाली।

उसे दोनों के बीच रखकर बोलीं—

“यह पगड़ी केवल तुम्हारे बाबूजी की नहीं थी…

यह इस घर की इज़्ज़त थी।

जब भी कोई निर्णय लेना,

पहले इसे देख लेना।

सोचना—

क्या यह फैसला इस पगड़ी का सम्मान बढ़ाएगा,

या कम करेगा?”

दोनों भाइयों ने श्रद्धा से पगड़ी को माथे से लगाया।

उस रात गाँव के मंदिर के प्रांगण में एक बैठक हुई।

कुछ किसान अपनी-अपनी परेशानियाँ बता रहे थे।

किसी की फसल सूख गई थी।

किसी के बैल बीमार थे।

किसी पर कर्ज़ था।

तब गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति ने कहा—

“बेटा…

मुसीबत में सबसे पहले इंसान की जेब खाली होती है।

अगर सावधान न रहे,

तो उसके बाद दिल भी खाली होने लगता है।

जेब भरने में समय लगता है,

लेकिन दिल खाली हो जाए,

तो उसे भरने में पूरी उम्र निकल जाती है।”

यह बात दोनों भाइयों के मन में गहराई तक उतर गई।

घर लौटते समय बड़ा भाई अचानक रुक गया।

उसने खेतों की ओर देखा।

धीरे से बोला—

“छोटू…

अगर कभी हमें काम का बँटवारा करना पड़े…

तो करेंगे।

अगर कभी ज़िम्मेदारियाँ अलग-अलग सँभालनी पड़ें…

तो सँभालेंगे।

लेकिन एक बात याद रखना—

हमारी माँ एक ही रहेंगी।

हमारा आँगन एक ही रहेगा।

और बाबूजी की याद…

वह कभी हिस्सों में नहीं बँटेगी।”

छोटे भाई ने आगे बढ़कर बड़े भाई को गले लगा लिया।

“भैया…

अगर कभी मैं भूल जाऊँ,

तो मुझे बाबूजी की यह बात याद दिला देना—

‘रिश्ता बच जाए,

तो हर नुकसान छोटा है।'”

दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।

लेकिन उन आँसुओं में हार नहीं थी।

वे उस संघर्ष की गवाही थे,

जिसमें दो भाई हर हाल में परिवार को बचाए रखना चाहते थे।

दूर कहीं बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई दी।

शायद बारिश आने वाली थी।

शायद नहीं।

पर इतना तय था—

अब उनके जीवन में जो अगला मौसम आएगा,

वह केवल खेतों की नहीं,

उनके रिश्तों की भी परीक्षा लेने वाला होगा।

और उस परीक्षा का परिणाम…

सिर्फ़ दो भाइयों का नहीं,

पूरे परिवार की आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करेगा।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

इक्कीसवाँ अध्याय — “जब बातें मन में रह गईं”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

कहा जाता है…

घर तब तक घर रहता है,

जब तक उसमें बातें होती रहती हैं।

जिस दिन बातचीत कम होने लगे,

उसी दिन दीवारें सुनना शुरू कर देती हैं।

पिता को गए कई महीने बीत चुके थे।

जीवन अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रहा था।

खेतों में फिर हरियाली लौट आई थी।

माँ की तबीयत भी पहले से कुछ बेहतर थी।

बच्चे स्कूल जाने लगे थे।

बाहर से देखने वाला कोई भी आदमी कहता—

“यह परिवार तो आज भी पहले जैसा ही है।”

लेकिन…

जीवन का सच बाहर से नहीं,

भीतर से दिखाई देता है।

अब दोनों भाइयों की दिनचर्या बदल गई थी।

बड़ा भाई सुबह-सुबह खेत के दूसरे हिस्से में निकल जाता।

छोटा भाई मंडी, बैंक और बच्चों की पढ़ाई के कामों में व्यस्त रहता।

दोनों दिन भर परिवार के लिए ही मेहनत करते,

लेकिन पहले जैसी बैठकर लंबी बातें करने की फुर्सत नहीं मिलती।

एक शाम…

माँ ने देखा कि दोनों अलग-अलग समय पर खाना खा रहे हैं।

पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था।

उन्होंने धीरे से पूछा—

“बेटा, आज साथ क्यों नहीं बैठे?”

बड़े भाई ने मुस्कुराकर कहा—

“काम थोड़ा ज़्यादा था, माँ।”

उसी समय छोटा भाई बोला—

“हाँ माँ, बस देर हो गई।”

दोनों के उत्तर सही थे।

लेकिन माँ का मन न जाने क्यों भर आया।

उन्हें याद आया—

जब यही दोनों बच्चे थे,

तो एक के बिना दूसरा पहला कौर भी नहीं खाता था।

उस रात माँ ने पिता की तस्वीर के सामने दीपक जलाया।

धीरे से बोलीं—

“सुन रहे हो न…

तुम्हारे बेटे आज भी अच्छे हैं।

बस…

समय ने उनसे उनका खाली समय छीन लिया है।”

अगले दिन गाँव में किसान सभा थी।

दोनों भाई भी गए।

सभा में खेती, पानी और ऋण की बातें हुईं।

लौटते समय बड़ा भाई कुछ किसानों के साथ रुक गया।

छोटा आगे निकल आया।

यह कोई बड़ी बात नहीं थी।

लेकिन पहली बार वे साथ घर नहीं लौटे।

माँ दरवाज़े पर खड़ी दोनों का इंतज़ार कर रही थीं।

पहले छोटा पहुँचा।

कुछ देर बाद बड़ा।

माँ ने कुछ नहीं कहा।

मगर उनके मन में एक हल्की-सी कसक उठी।

रात को आँगन में नीम के नीचे चारपाई डली।

हवा ठंडी थी।

आसमान तारों से भरा था।

बड़ा भाई बोला—

“छोटू…”

“जी भैया?”

“याद है…

बाबूजी कहते थे कि हर सप्ताह एक शाम बिना किसी काम के साथ बैठा करो?”

छोटा मुस्कुराया।

“याद है…

और हम वही बात सबसे पहले भूल गए।”

दोनों हल्के से हँस पड़े।

लेकिन वह हँसी पहले जैसी बेफ़िक्र नहीं थी।

बड़े भाई ने कहा—

“कल शाम जल्दी लौटेंगे।

माँ के साथ बैठेंगे।

बच्चों को भी साथ बिठाएँगे।”

छोटे ने तुरंत कहा—

“पक्का।”

दोनों ने वादा किया।

लेकिन…

जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है—

हम अक्सर जिन लोगों से सबसे ज़्यादा प्रेम करते हैं,

उन्हीं से मिलने की बात ‘कल’ पर टाल देते हैं।

और कई बार…

वह ‘कल’ वैसा नहीं आता जैसा हमने सोचा था।

सुबह होते ही अचानक खबर आई कि नहर का बाँध टूट गया है।

खेतों को बचाने के लिए गाँव के सभी किसान दौड़ पड़े।

दोनों भाई भी अलग-अलग दिशाओं में काम में लग गए।

पूरा दिन भागदौड़ में निकल गया।

शाम आई।

फिर रात।

और वह वादा…

जो नीम के नीचे किया गया था,

एक बार फिर अधूरा रह गया।

माँ दरवाज़े पर बैठी देर तक रास्ता देखती रहीं।

जब दोनों लौटे,

तो उनके कपड़ों पर मिट्टी थी,

चेहरों पर थकान,

और आँखों में नींद।

माँ ने खाना परोसा।

कुछ कहना चाहा…

फिर चुप रह गईं।

उन्हें लगा—

“आज नहीं…

कल कहूँगी।”

नीम के पत्ते हवा में हिल रहे थे।

जैसे वे बार-बार एक ही बात दोहरा रहे हों—

**”रिश्तों के लिए समय निकालो…

वरना समय रिश्तों को अपने साथ ले जाएगा।”**

उस रात…

पिता की खाली चारपाई पर चाँदनी पड़ रही थी।

ऐसा लगता था,

मानो समय स्वयं उस घर से पूछ रहा हो—

“क्या तुम अब भी एक-दूसरे की बातें सुनते हो… या केवल आवाज़ें?”उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

बाईसवाँ अध्याय — “काश… उस दिन हम बैठकर बात कर लेते”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

कुछ रिश्ते टूटते नहीं…

बस धीरे-धीरे एक-दूसरे तक पहुँचने का रास्ता खो देते हैं।

और जब रास्ते खो जाते हैं,

तो दिलों के बीच दूरियाँ पैदा होने लगती हैं।

उस सुबह गाँव पर हल्की धुंध छाई हुई थी।

मुर्गे की बाँग के साथ पूरा गाँव जाग गया।

माँ ने तुलसी पर जल चढ़ाया।

पिता की तस्वीर के सामने दीपक जलाया।

फिर धीरे से बोलीं—

“आज दोनों बेटों को जल्दी घर भेज देना…

बहुत दिन हो गए, साथ बैठकर खाना नहीं खाया।”

उन्हें क्या पता था,

जीवन की अपनी ही योजनाएँ होती हैं।

सुबह बड़े भाई को मंडी जाना पड़ा।

फसल का हिसाब करना था।

उधर छोटे भाई को बैंक जाना था।

ऋण की अगली किस्त और खेती के कागज़ पूरे करने थे।

दोनों निकलते समय एक-दूसरे से मिले।

बड़ा भाई मुस्कुराकर बोला—

“शाम को जल्दी लौटना।”

छोटा हँसकर बोला—

“आज कोई बहाना नहीं।

माँ के साथ बैठेंगे।”

दोनों अपने-अपने रास्ते चल दिए।

दोपहर बीत गई।

बड़ा भाई मंडी में किसानों की लंबी कतार में फँस गया।

उधर बैंक में तकनीकी समस्या के कारण छोटा भाई घंटों इंतज़ार करता रहा।

समय किसी का इंतज़ार नहीं करता।

सूरज पश्चिम की ओर झुकने लगा।

घर पर माँ बार-बार आँगन से दरवाज़े तक जातीं।

फिर वापस लौट आतीं।

चूल्हे पर दाल चढ़ी थी।

रोटियाँ सेंकी जा चुकी थीं।

लेकिन थाली अभी तक नहीं लगी थी।

क्योंकि इस घर में वर्षों से एक नियम था—

जब तक दोनों भाई न आ जाएँ,
रात का खाना पूरा नहीं होता था।

साँझ ढल गई।

पहले बड़ा भाई लौटा।

उसने आँगन में प्रवेश करते ही पूछा—

“छोटू आया?”

माँ ने सिर हिलाया।

“अभी नहीं।”

बड़ा भाई दरवाज़े पर खड़ा होकर सड़क की ओर देखने लगा।

कुछ देर बाद छोटा भाई भी आ गया।

वह थका हुआ था।

चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।

बड़े भाई ने पूछा—

“सब ठीक है?”

छोटे ने जवाब दिया—

“हाँ… बस बैंक का काम नहीं हो पाया।”

बड़ा भाई कुछ कहना चाहता था।

उसी समय एक पड़ोसी किसान आ गया।

उसे खेत की सिंचाई के बारे में सलाह चाहिए थी।

बड़ा भाई उसके साथ बाहर चला गया।

छोटा माँ के पास बैठ गया।

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

“बेटा…

तू बहुत थक गया है।”

छोटा मुस्कुराया।

“थकान काम से नहीं होती माँ…

थकान तब होती है जब अपने लोगों के साथ बैठने का समय न मिले।”

माँ की आँखें भर आईं।

रात का भोजन हुआ।

सब साथ बैठे,

लेकिन पहले जैसी खुली बातें नहीं हुईं।

बच्चे अपनी पढ़ाई की बातें करते रहे।

बहुएँ रसोई समेटती रहीं।

माँ सबको देखती रहीं।

और दोनों भाई…

एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुरा तो रहे थे,

लेकिन दिल की बातें फिर भी मन में रह गईं।

भोजन के बाद बड़ा भाई बोला—

“छोटू, थोड़ी देर नीम के नीचे बैठते हैं?”

छोटे ने घड़ी देखी।

“भैया…

कल सुबह बहुत जल्दी निकलना है।

कल बैठेंगे।”

बड़ा भाई मुस्कुराया।

“ठीक है…

कल सही।”

दोनों अपने-अपने कमरों की ओर चले गए।

माँ ने यह सब देखा।

उन्होंने पिता की तस्वीर की ओर देखा और धीमे से कहा—

“देख रहे हो न…

ये दोनों आज भी एक-दूसरे से दूर नहीं हैं।

बस…

समय इनके बीच आकर बैठ गया है।”

रात गहरी होती गई।

नीम के पत्तों से हवा की धीमी आवाज़ आ रही थी।

आँगन में पड़ी पिता की खाली चारपाई चाँदनी में नहा रही थी।

ऐसा लग रहा था,

मानो वह चारपाई अब भी इंतज़ार कर रही हो—

कि दोनों बेटे आएँगे,

बैठेंगे,

हँसेंगे,

और अपने मन की सारी गाँठें खोल देंगे।

लेकिन…

कई गाँठें समय पर न खुलें,

तो वे रस्सी नहीं,

तक़दीर बन जाती हैं।

और अगले दिन…

समय इस परिवार के सामने एक ऐसा प्रश्न रखने वाला था,

जिसका उत्तर देना आसान नहीं होगा।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

तेईसवाँ अध्याय — “दीवार बनने से पहले”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

घर की दीवारें…

एक दिन में नहीं उठतीं।

पहले ज़मीन नापी जाती है।

फिर निशान लगाए जाते हैं।

फिर ईंटें आती हैं।

और सबसे पहले…

एक अदृश्य रेखा खींची जाती है।

रिश्तों में भी ऐसा ही होता है।

पहले मन में एक रेखा बनती है,

फिर शब्द बदलते हैं,

फिर आदतें,

और अंत में लोग कहते हैं—

“अब तो बात बहुत आगे बढ़ गई है।”

उस सुबह गाँव में पंचायत भवन के बाहर किसानों की बैठक थी।

सरकार की नई सिंचाई योजना पर चर्चा होनी थी।

दोनों भाई भी पहुँचे।

अधिकारियों ने कहा—

“अगर खेतों का रिकॉर्ड और जिम्मेदारियाँ स्पष्ट हों,

तो कई योजनाओं का लाभ लेना आसान होगा।”

यह केवल एक प्रशासनिक बात थी।

लेकिन लौटते समय दोनों भाई सोच में डूब गए।

बड़ा भाई बोला—

“अगर कामों की जिम्मेदारी लिखकर तय कर लें,

तो शायद सब आसान हो जाए।”

छोटे भाई ने सिर हिलाया।

“हाँ भैया…

काम साफ़ होने चाहिए।

ताकि किसी पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ न पड़े।”

दोनों की नीयत एक थी—

परिवार को संभालना।

घर पहुँचकर उन्होंने माँ के सामने यह बात रखी।

माँ कुछ देर चुप रहीं।

फिर बोलीं—

“ज़िम्मेदारियाँ बाँट लो बेटा…

पर रिश्ते मत बाँटना।

यह घर तभी तक घर है,

जब तक इसमें ‘हम’ शब्द ज़िंदा है।”

दोनों ने एक साथ कहा—

“ऐसा कभी नहीं होगा, माँ।”

माँ मुस्कुराईं।

लेकिन उनकी मुस्कान में हल्की-सी चिंता भी थी।

शाम को दोनों भाई पिता की पुरानी कॉपी लेकर बैठे।

उसमें खेतों का हिसाब था।

बीज का।

फसल का।

और बीच-बीच में पिता के अपने हाथ से लिखे छोटे-छोटे वाक्य—

“पहले परिवार, फिर व्यापार।”

“क्रोध में लिया निर्णय हमेशा महँगा पड़ता है।”

“भाई से बड़ी कोई पूँजी नहीं।”

दोनों बहुत देर तक उन पन्नों को पढ़ते रहे।

छोटे भाई ने धीरे से कहा—

“भैया…

बाबूजी ने कितना कुछ लिख छोड़ा…

पर शायद सबसे ज़रूरी बात लिखी ही नहीं।”

बड़े भाई ने पूछा—

“क्या?”

छोटा बोला—

“जब दो भाई बहुत ज़िम्मेदार हो जाएँ…

तो उन्हें एक-दूसरे के लिए समय कैसे निकालना चाहिए।”

बड़े भाई की आँखें नम हो गईं।

“शायद इसलिए नहीं लिखा…

क्योंकि उन्हें भरोसा था कि हम यह बात खुद समझ जाएँगे।”

दोनों मुस्कुरा दिए।

उसी समय दोनों के बच्चे आँगन में खेलने लगे।

उन्होंने मिट्टी में एक बड़ा-सा घर बनाया।

फिर एक बच्चे ने बीच में उँगली से एक लकीर खींच दी।

दूसरे बच्चे ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं…

घर ऐसे नहीं बाँटते।

सब साथ रहेंगे।”

दोनों भाई चुपचाप वह दृश्य देखते रहे।

माँ की आँखों से आँसू बह निकले।

उन्होंने मन ही मन कहा—

*”हे प्रभु…

बच्चों की यह बात इनके बड़े होने तक बचाए रखना।”*

रात को बड़ा भाई अकेला आँगन में बैठा था।

नीम से सूखे पत्ते गिर रहे थे।

उसने एक पत्ता उठाया और हथेली पर रख लिया।

धीरे से बुदबुदाया—

“पेड़ कभी अपने पत्तों से हिसाब नहीं माँगता…

फिर इंसान क्यों माँगने लगता है?”

उसी समय छोटा भाई पीछे से आया।

बिना कुछ कहे बड़े भाई के पास बैठ गया।

दोनों ने आसमान की ओर देखा।

तारे वैसे ही थे।

चाँद भी वही था।

बस समय बदल रहा था।

और समय…

कभी किसी से पूछकर नहीं बदलता।

उस रात दोनों ने तय किया—

**हर रविवार शाम पूरा परिवार एक साथ बैठेगा।

कोई हिसाब नहीं होगा।

कोई काम नहीं होगा।

सिर्फ़ बातें होंगी।**

उन्हें नहीं पता था…

कभी-कभी जीवन इंसान की सबसे अच्छी योजनाओं की भी परीक्षा लेता है।

और अगला रविवार…

उनकी सोच से बिल्कुल अलग होने वाला था।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

चौबीसवाँ अध्याय — “जो रविवार कभी आया ही नहीं”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

कभी-कभी इंसान पूरे सप्ताह एक दिन का इंतज़ार करता है।

और फिर…

जब वह दिन आता है,

तो ज़िंदगी उसके लिए कोई और ही योजना लेकर खड़ी होती है।

उस रविवार का इंतज़ार पूरे घर को था।

बच्चे सुबह से ही खुश थे।

माँ ने रसोई में सबकी पसंद का खाना बनाने का निश्चय किया।

बड़ी बहू ने खीर चढ़ाई।

छोटी बहू ने पूड़ियाँ बेलनी शुरू कीं।

आँगन में नीम के नीचे चारपाइयाँ बिछा दी गईं।

माँ ने पिता की तस्वीर के सामने दीपक जलाया और मुस्कुराकर बोलीं—

“आज तुम्हारे बेटे फिर वैसे ही बैठेंगे…

जैसे पहले बैठा करते थे।”

उधर दोनों भाई भी मन ही मन प्रसन्न थे।

बड़े भाई ने खेत का काम शनिवार को ही पूरा कर लिया था।

छोटे भाई ने भी बैंक और मंडी के सारे काम निपटा दिए थे।

आज किसी को कहीं नहीं जाना था।

आज केवल परिवार था।

और परिवार के बीच बातें।

सुबह की चाय अभी ख़त्म ही हुई थी कि दरवाज़े पर तेज़ आवाज़ आई—

“अरे… कोई है?”

गाँव का एक लड़का हाँफता हुआ भीतर आया।

“भैया…

नहर का पानी अचानक बढ़ गया है।

नीचे वाले खेत में कटाव हो रहा है।

अगर अभी नहीं पहुँचे,

तो पूरी मेड़ बह जाएगी।”

बड़ा भाई एक पल के लिए ठिठक गया।

उसने माँ की ओर देखा।

फिर छोटे भाई की ओर।

छोटे ने बिना देर किए कहा—

“चलो भैया…

पहले खेत बचा लेते हैं।

शाम तक लौट आएँगे।”

दोनों फावड़े उठाकर दौड़ पड़े।

माँ दरवाज़े पर खड़ी उन्हें देखती रहीं।

उनकी आँखों में चिंता नहीं थी।

बस एक अधूरी प्रतीक्षा थी।

पूरा दिन खेत में संघर्ष चलता रहा।

गाँव के कई किसान मिलकर मेड़ बाँधते रहे।

धूप सिर पर चढ़ गई।

फिर बादल आए।

फिर हल्की बारिश भी हुई।

लेकिन दोनों भाई वहीं डटे रहे।

शाम ढली।

थके हुए कदमों से दोनों घर लौटे।

आँगन में चारपाइयाँ अब भी बिछी थीं।

खीर ठंडी हो चुकी थी।

रोटियाँ कपड़े में लिपटी पड़ी थीं।

माँ तुलसी के पास बैठी थीं।

उन्होंने दोनों को देखा।

चेहरे पर मुस्कान लाई।

“खेत बच गया?”

बड़े भाई ने थकान भरी आवाज़ में कहा—

“हाँ माँ…

मेड़ बच गई।”

माँ ने धीरे से पूछा—

“और आज की बैठक?”

दोनों भाई एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

कोई उत्तर नहीं था।

छोटा धीरे से बोला—

“माँ…

अगले रविवार ज़रूर बैठेंगे।”

माँ ने केवल इतना कहा—

“ठीक है बेटा…”

लेकिन उनके स्वर में जो हल्की-सी उदासी थी,

उसे केवल नीम का पेड़ समझ पाया।

रात को भोजन करते समय सब साथ बैठे,

पर थकान इतनी थी कि कोई लंबी बात न कर सका।

बच्चे भी जल्दी सो गए।

माँ देर तक जागती रहीं।

उन्होंने पिता की तस्वीर को देखा।

धीरे से बोलीं—

“देखो…

तुम्हारे बेटे आज भी साथ हैं।

बस…

ज़िंदगी उन्हें बैठने नहीं देती।”

हवा का एक झोंका आया।

दीपक की लौ काँपी,

लेकिन बुझी नहीं।

माँ मुस्कुरा दीं।

“जब तक यह लौ जल रही है…

उम्मीद भी ज़िंदा है।”

उधर दोनों भाई अपनी-अपनी चारपाई पर लेटे थे।

नींद किसी की आँखों में नहीं थी।

बड़ा भाई सोच रहा था—

“काश… आज दो घंटे बैठ लेते।”

छोटा भाई भी यही सोच रहा था—

“अगले रविवार चाहे कुछ भी हो,
मैं भैया के साथ ज़रूर बैठूँगा।”

लेकिन…

जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है—

हम जिन लोगों के लिए समय बचाकर रखते हैं,

उन्हीं से मिलने का समय

सबसे पहले छिन जाता है।

उस रात…

नीम के पेड़ से एक और सूखा पत्ता गिरा।

माँ ने उसे उठाकर हथेली में रखा और बहुत धीरे से कहा—

**”रिश्ते पेड़ों जैसे होते हैं।

उन्हें केवल पानी नहीं,

समय भी देना पड़ता है।”**

और दूर पूर्व दिशा में…

एक नया सवेरा जन्म ले रहा था।

उसी सवेरे के साथ…

इस परिवार के जीवन में एक ऐसा निर्णय आने वाला था,

जो किसी झगड़े से नहीं,

बल्कि परिस्थितियों से जन्म लेगा।

और शायद…

यहीं से इस उपन्यास का सबसे कठिन प्रश्न अपने उत्तर की ओर बढ़ना शुरू करेगा।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

पच्चीसवाँ अध्याय — “पहली बार ‘बँटवारा’ शब्द घर तक पहुँचा”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

कुछ शब्द…

जब तक किताबों में रहते हैं,

सिर्फ़ शब्द लगते हैं।

लेकिन वही शब्द,

जब अपने घर की चौखट पर आकर खड़े हो जाएँ,

तो साँसें भी भारी लगने लगती हैं।

उस दिन दोपहर का समय था।

आँगन में माँ गेहूँ बीन रही थीं।

बड़ी बहू रसोई में थी।

छोटी बहू बच्चों को पढ़ा रही थी।

दोनों भाई खेत से लौटकर अभी हाथ-मुँह धो ही रहे थे कि गाँव के एक बुज़ुर्ग रिश्तेदार आ पहुँचे।

उनका गाँव में सम्मान था।

वे अक्सर समझदारी की बातें किया करते थे।

सबने आदर से उनका स्वागत किया।

चाय आई।

कुछ देर खेती, मौसम और बच्चों की पढ़ाई की बातें होती रहीं।

फिर उन्होंने धीरे से कहा—

“बेटा…

एक बात कहूँ?”

बड़े भाई ने मुस्कुराकर कहा—

“कहिए काका।”

उन्होंने कुछ पल रुककर कहा—

“तुम दोनों बहुत अच्छे हो।

लेकिन अब परिवार बड़ा हो गया है।

ज़िम्मेदारियाँ भी बढ़ गई हैं।

अगर काम और हिसाब साफ़-साफ़ बाँटकर करोगे,

तो आगे चलकर गलतफ़हमियाँ कम होंगी।”

घर में एकदम सन्नाटा छा गया।

उन्होंने आगे स्पष्ट किया—

“मैं रिश्ते बाँटने की बात नहीं कर रहा।

मैं ज़िम्मेदारियाँ साफ़ करने की बात कर रहा हूँ।

ताकि कल किसी के मन में यह न आए कि उसने ज़्यादा किया या कम।”

बड़ा भाई ध्यान से सुनता रहा।

छोटा भाई भी।

दोनों को उनकी बात में बुराई नहीं लगी।

बात वास्तव में व्यवस्था की थी।

लेकिन…

एक शब्द था जिसने सबको भीतर तक छू लिया—

“बँटवारा।”

भले उसका अर्थ काम का रहा हो,

लेकिन सुनते ही माँ के हाथ रुक गए।

गेहूँ के दाने उनकी उँगलियों से फिसलकर ज़मीन पर बिखर गए।

उन्होंने सिर उठाया।

उनकी आँखों में वर्षों पुरानी यादें तैर रही थीं।

उन्हें अपने पति की आवाज़ सुनाई दी—

“ज़िम्मेदारियाँ बाँट लेना…
पर दिल मत बाँटना।”

रिश्तेदार चले गए।

घर फिर शांत हो गया।

शाम को दोनों भाई नीम के नीचे बैठे।

बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

आख़िर बड़े भाई ने चुप्पी तोड़ी।

“छोटू…

आज काका की बात बुरी लगी?”

छोटे ने सिर हिलाया।

“बात बुरी नहीं लगी, भैया…

लेकिन ‘बँटवारा’ शब्द सुनकर बाबूजी याद आ गए।”

दोनों की आँखें भर आईं।

कुछ देर बाद बड़ा भाई बोला—

“अगर कभी हमें काम अलग-अलग सँभालने पड़ें,

तो करेंगे।

लेकिन एक बात लिख लो—

माँ की रसोई का सम्मान,

बाबूजी की तस्वीर,

और यह आँगन…

इन पर किसी का हिस्सा नहीं होगा।

ये हम दोनों के रहेंगे।”

छोटे भाई ने बिना कुछ कहे अपना हाथ आगे बढ़ा दिया।

बड़े भाई ने उसका हाथ थाम लिया।

दोनों ने वही पुराना वादा दोहराया—

“जो भी फैसला होगा,
साथ बैठकर होगा।
कोई बात मन में नहीं रखेंगे।”

उसी समय माँ धीरे-धीरे उनके पास आईं।

उन्होंने दोनों बेटों के सिर पर हाथ रखा।

फिर बोलीं—

“बेटा…

घर टूटता नहीं,

थक जाता है।

उसे आराम रिश्तों से मिलता है,

दीवारों से नहीं।

अगर कभी कोई फैसला लेना,

तो पहले एक-दूसरे की आँखों में देखना।

जिस दिन आँखें झुक जाएँ,

समझ लेना कि फैसला गलत है।”

तीनों देर तक वहीं बैठे रहे।

सूरज डूब गया।

आकाश में पहला तारा चमका।

पिता की तस्वीर पर दीपक की लौ शांत थी।

जैसे वह अब भी यही कह रही हो—

*”मैंने तुम्हें खेत नहीं सौंपे थे…

मैंने तुम्हें एक-दूसरे का हाथ सौंपा था।”*

लेकिन…

जीवन की कठिनाइयाँ अब केवल शब्द नहीं रह गई थीं।

वे निर्णय बनकर सामने आने वाली थीं।

और हर निर्णय…

रिश्तों की कसौटी बनने वाला था।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

छब्बीसवाँ अध्याय — “जिस दिन आँगन के बीच एक लकीर खिंची”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

उस सुबह…

सूरज तो रोज़ की तरह ही उगा था।

लेकिन उसकी रोशनी आज आँगन में पहले जैसी नहीं लग रही थी।

नीम का पेड़ वहीं खड़ा था।

तुलसी का चौरा भी वहीं था।

पिता की तस्वीर भी उसी दीवार पर टँगी थी।

सब कुछ वैसा ही था…

बस लोगों के चेहरों पर एक अनकहा बोझ उतर आया था।

पिछले कई महीनों से दोनों भाई बार-बार बैठकर एक ही बात करते थे—

कैसे बढ़ती ज़िम्मेदारियाँ सँभाली जाएँ?

कैसे बच्चों की पढ़ाई, खेती, माँ की देखभाल और घर का खर्च बिना किसी उलझन के चलता रहे?

उन्होंने कई रास्ते खोजे।

कई रातें बिना सोए गुज़ारीं।

कई बार हिसाब की कॉपी बंद कर दी।

कई बार फिर खोली।

आख़िर एक दिन दोनों ने तय किया—

काम और खर्च की ज़िम्मेदारियाँ अलग-अलग लिख ली जाएँगी, ताकि किसी के मन में कभी बोझ या शिकायत न रहे।

उनकी नीयत घर बचाने की थी।

लेकिन गाँव में खबर कुछ और बन गई।

लोग कहने लगे—

“दोनों भाइयों का बँटवारा हो गया।”

यह बात जब माँ के कानों तक पहुँची,

तो उनका हाथ काँप गया।

उन्होंने धीरे से पूछा—

“सच है बेटा?”

बड़ा भाई माँ के पैरों के पास बैठ गया।

उसने माँ का हाथ पकड़ लिया।

“माँ…

हम अलग नहीं हुए।

हम तो बस चाहते हैं कि घर की ज़िम्मेदारियाँ साफ़ रहें।”

छोटा भाई भी वहीं बैठ गया।

उसकी आँखों में आँसू थे।

“माँ…

हम आज भी वैसे ही हैं।

बस काम बाँट रहे हैं…

दिल नहीं।”

माँ ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

लेकिन उनकी आँखों से आँसू लगातार बहते रहे।

उन्होंने आँगन की मिट्टी को देखा।

यहीं…

इसी जगह…

दोनों भाई बचपन में मिट्टी के घर बनाया करते थे।

यहीं…

बरसात में कागज़ की नावें चलती थीं।

यहीं…

पिता उन्हें अपने कंधों पर बैठाकर हँसते थे।

आज उसी आँगन में लोग एक लकीर की बात कर रहे थे।

शाम को दोनों भाई अकेले नीम के नीचे बैठे।

बड़े भाई ने मिट्टी पर उँगली से एक सीधी रेखा खींच दी।

फिर तुरंत अपने हाथ से उसे मिटा दिया।

“देखा छोटू?”

छोटे ने पूछा—

“क्या?”

बड़ा बोला—

“मिट्टी पर खींची लकीर मिट जाती है…

लेकिन अगर यही लकीर दिल पर बन जाए,

तो उसे मिटाने में पूरी ज़िंदगी लग जाती है।”

छोटे भाई की आँखों से आँसू टपक पड़े।

उसने बड़े भाई को गले लगा लिया।

दोनों बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।

नीम के पत्ते हवा में हिलते रहे।

जैसे पिता की आवाज़ फिर सुनाई दे रही हो—

“बेटा…
जो भी करना,
एक-दूसरे का हाथ मत छोड़ना।”

रात को माँ ने पिता की तस्वीर के सामने दीपक जलाया।

बहुत देर तक बैठी रहीं।

फिर धीमे से बोलीं—

“सुन रहे हो न…

तुम्हारे बेटे आज भी एक-दूसरे से प्रेम करते हैं।

बस…

समय ने इनके जीवन को कठिन बना दिया है।

अगर कहीं हो…

तो इन्हें आशीर्वाद देना।

इनके मन में कभी दीवार मत बनने देना।”

उस रात…

दोनों भाई अपने-अपने कमरों में थे।

लेकिन किसी की नींद नहीं आई।

बड़ा भाई पिता की पुरानी डायरी पढ़ता रहा।

छोटा भाई बचपन की एक पुरानी तस्वीर हाथ में लिए बैठा रहा।

तस्वीर में दोनों भाई हँस रहे थे।

बीच में माँ थीं।

पीछे पिता मुस्कुरा रहे थे।

उसने तस्वीर को सीने से लगा लिया और धीरे से कहा—

**”भैया…

अगर कभी हम सचमुच दूर हो गए…

तो यह तस्वीर हमें फिर से एक कर दे।”**

और बाहर…

नीम के पेड़ की दो बड़ी शाखाएँ अब भी एक ही तने से जुड़ी थीं।

मानो प्रकृति स्वयं कह रही हो—

“जड़ें साथ हों,
तो शाखाएँ चाहे जितनी दूर चली जाएँ,
पेड़ फिर भी एक ही रहता है।”उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

सत्ताईसवाँ अध्याय — “दूरी घरों में नहीं, समय में थी”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

कहते हैं…

दो घर बन जाने से रिश्ते नहीं टूटते।

रिश्ते तब टूटने लगते हैं,

जब मिलने के बहाने कम हो जाते हैं।

अब दोनों भाइयों की ज़िम्मेदारियाँ अलग थीं।

सुबह दोनों अपने-अपने काम में लग जाते।

एक खेत की ओर निकलता,

दूसरा मंडी, बैंक और बाज़ार के काम सँभालता।

शाम को लौटते,

तो थकान चेहरे पर पहले पहुँच जाती,

और बातें बाद में।

फिर भी…

एक आदत आज तक नहीं बदली थी।

सुबह जब भी बड़ा भाई आँगन से निकलता,

वह पहले माँ के चरण छूता।

उसी समय छोटा भाई भी आ जाता।

दोनों एक-दूसरे की ओर देखते,

हल्की-सी मुस्कान देते,

और बिना कुछ कहे अपने-अपने रास्ते चल पड़ते।

वह मुस्कान छोटी थी,

पर उसमें बचपन का पूरा विश्वास छिपा था।

माँ हर रोज़ उस पल को देखतीं।

और मन ही मन भगवान का धन्यवाद करतीं—

“मेरे बेटे आज भी एक-दूसरे की आँखों में अपनापन ढूँढ़ लेते हैं।”

त्योहार आया।

पूरा घर फिर से सज उठा।

दीपक जले।

बच्चों ने रंगोली बनाई।

माँ ने दोनों परिवारों को एक ही चौके में बैठाकर भोजन कराया।

खीर की पहली कटोरी पहले बड़े बेटे को दी,

दूसरी छोटे को।

फिर मुस्कुराकर बोलीं—

“जब तक तुम दोनों साथ बैठकर खाते रहोगे,

मुझे लगेगा कि मेरा घर अब भी एक है।”

दोनों भाइयों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

बिना कुछ कहे मुस्कुरा दिए।

लेकिन…

समय का स्वभाव बदलता नहीं।

धीरे-धीरे मिलने का समय फिर कम होने लगा।

कभी किसी बच्चे की परीक्षा।

कभी खेत में अचानक काम।

कभी बाज़ार की भागदौड़।

कभी किसी रिश्तेदार का आना।

हर दिन कोई न कोई कारण मिल जाता।

और जो बातें पाँच मिनट में हो सकती थीं,

वे फिर अगले दिन पर टल जातीं।

एक शाम माँ नीम के नीचे अकेली बैठी थीं।

उन्होंने देखा—

पेड़ की दो बड़ी शाखाएँ अलग दिशाओं में फैली थीं।

लेकिन जड़ एक ही थी।

माँ मुस्कुराईं।

फिर उनकी आँखें भर आईं।

धीरे से बोलीं—

“हे प्रभु…

मेरे बेटों की जड़ भी ऐसी ही बनी रहे।”

उसी समय बड़ा भाई आया।

उसने माँ को चुप देखा।

पूछा—

“क्या सोच रही हो?”

माँ ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“कुछ नहीं बेटा…

बस यह सोच रही हूँ कि पेड़ की शाखाएँ चाहे जितनी दूर चली जाएँ,

जड़ों को कभी मत भूलना।”

इतने में छोटा भाई भी वहाँ आ गया।

उसने माँ की बात सुन ली।

वह माँ के पास बैठ गया।

बड़े भाई ने उसका कंधा थपथपाया।

तीनों कुछ देर तक बिना बोले बैठे रहे।

कभी-कभी…

मौन भी परिवार की सबसे गहरी भाषा होता है।

सूरज डूब चुका था।

आकाश में शाम उतर आई थी।

पिता की तस्वीर के सामने दीपक जल रहा था।

उसकी लौ स्थिर थी,

मानो अब भी इस घर की साँसों की रखवाली कर रही हो।

लेकिन…

ज़िंदगी अभी उनकी परीक्षा पूरी नहीं कर पाई थी।

समय एक ऐसा मोड़ लेकर आने वाला था,

जहाँ प्रेम तो रहेगा,

पर उसे निभाने के लिए त्याग पहले से कहीं अधिक करना पड़ेगा।

और शायद…

वहीं तय होगा कि दो भाई सचमुच बँट गए,

या फिर हर कठिनाई के बाद भी एक-दूसरे के साथ खड़े रहे।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

अट्ठाईसवाँ अध्याय — “जब माँ की आँखें दोनों बेटों को ढूँढ़ने लगीं”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

माँ…

घर की वह चौखट होती है,

जिस पर परिवार रोज़ लौटकर अपना सुकून रख देता है।

जब वही चौखट कमज़ोर होने लगे,

तो पूरे घर की आवाज़ बदल जाती है।

सर्दियों की एक सुबह थी।

आँगन में धूप धीरे-धीरे उतर रही थी।

नीम के पत्तों पर ओस की बूँदें चमक रही थीं।

माँ हमेशा की तरह सबसे पहले उठीं,

लेकिन आज उनके कदम पहले जैसे मज़बूत नहीं थे।

तुलसी को जल चढ़ाते समय उनका हाथ काँप गया।

दीपक की लौ भी जैसे उनकी थकान महसूस कर रही थी।

बड़ी बहू दौड़कर आई।

“माँ, आप बैठ जाइए… मैं कर देती हूँ।”

माँ मुस्कुराईं।

“अभी इतनी भी बूढ़ी नहीं हुई हूँ बेटा…”

लेकिन मुस्कान के पीछे छिपी थकान किसी से छिप न सकी।

दोपहर तक उन्हें हल्का बुखार हो गया।

खबर बड़े भाई तक पहुँची।

वह खेत का काम अधूरा छोड़कर दौड़ा चला आया।

उधर छोटा भाई भी बाज़ार से लौटते ही सीधे माँ के कमरे में पहुँचा।

दोनों एक साथ दरवाज़े पर खड़े थे।

माँ ने आँखें खोलीं।

दोनों बेटों को साथ देखकर उनके चेहरे पर वही पुरानी शांति लौट आई।

उन्होंने धीमे से कहा—

“देखा…

मुझे पता था,

मेरी आवाज़ तुम दोनों तक एक साथ पहुँचेगी।”

दोनों भाइयों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

कई दिनों बाद उनकी आँखों में वही बचपन वाली चिंता थी—

“माँ ठीक हो जाएँ… बस यही ज़रूरी है।”

डॉक्टर आए।

दवा दी।

आराम करने को कहा।

शाम तक बुखार कुछ कम हुआ,

लेकिन माँ बहुत कमज़ोर लग रही थीं।

रात को दोनों भाई उनके सिरहाने बैठे थे।

कमरे में सन्नाटा था।

दीवार पर टँगी पिता की तस्वीर जैसे सब देख रही थी।

कुछ देर बाद माँ बोलीं—

“एक बात पूछूँ?”

दोनों ने एक साथ कहा—

“हाँ माँ…”

माँ ने धीमे स्वर में पूछा—

“अगर मैं एक दिन न रहूँ…

तो क्या तुम दोनों यूँ ही एक-दूसरे का हाथ पकड़े रहोगे?”

यह सुनते ही दोनों भाई सिहर उठे।

बड़े भाई ने तुरंत माँ का हाथ थाम लिया।

“ऐसी बात मत करो माँ।”

छोटे भाई की आँखों से आँसू बह निकले।

“आप ही तो हमारा घर हो…”

माँ ने दोनों की हथेलियाँ अपने हाथों में रख दीं।

“नहीं बेटा…

घर मैं नहीं हूँ।

घर तो तुम दोनों का प्रेम है।

जिस दिन यह बचा रहेगा,

उस दिन मैं भी यहीं रहूँगी…

चाहे दिखाई न दूँ।”

कमरे में कोई कुछ नहीं बोला।

सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।

बाहर नीम के पत्ते हवा में हिल रहे थे।

जैसे समय भी इस पल को याद रखना चाहता हो।

रात गहरी हो गई।

दोनों भाइयों ने बारी-बारी से माँ की सेवा की।

एक दवा देता,

दूसरा पानी पिलाता।

एक उनके माथे पर ठंडी पट्टी रखता,

दूसरा चुपचाप उनके पैरों को दबाता।

उन्हें देखकर ऐसा लगता ही नहीं था

कि लोग कहते हैं—

“इनका बँटवारा हो गया है।”

सुबह की पहली किरण कमरे में आई।

माँ ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

दोनों बेटे अब भी वहीं बैठे थे।

रातभर किसी ने ठीक से आँख नहीं झपकी थी।

माँ मुस्कुराईं।

“आज मैं बहुत अमीर हूँ…”

दोनों ने पूछा—

“कैसे?”

माँ बोलीं—

“जिस माँ के सिरहाने उसके दोनों बेटे साथ बैठे हों,

उससे अमीर इस दुनिया में कोई नहीं।”

दोनों भाई माँ से लिपट गए।

उनकी आँखों से बहते आँसू

माँ के हाथों पर गिर रहे थे।

और उस पल…

आँगन में खड़ा पुराना नीम,

दीवार पर मुस्कुराते पिता,

और उगता हुआ सूरज—

मानो तीनों एक साथ यही कह रहे थे—

“रिश्ते विरासत से नहीं बचते…
रिश्ते सेवा, समय और प्रेम से जीवित रहते हैं।”

लेकिन…

समय अभी पूरी तरह नहीं बदला था।

माँ की बीमारी ने दोनों भाइयों को फिर से पास तो ला दिया,

पर जीवन जल्द ही उनके सामने एक ऐसी परीक्षा रखने वाला था,

जिसमें उन्हें प्रेम और कर्तव्य में से किसी एक को नहीं,

बल्कि दोनों को साथ लेकर चलना होगा।उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

उनतीसवाँ अध्याय — “माँ का अंतिम नहीं, सबसे बड़ा उपदेश”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

कई बार…

बीमारी शरीर को कमज़ोर करती है,

लेकिन शब्दों को इतना मज़बूत बना देती है,

कि वे पीढ़ियों तक ज़िंदा रहते हैं।

माँ अब पहले से कुछ ठीक थीं।

बुखार उतर चुका था।

चेहरे पर थकान अभी भी थी,

लेकिन आँखों की ममता वैसी ही थी,

जैसी बचपन में दोनों बेटों को स्कूल भेजते समय हुआ करती थी।

उस दिन उन्होंने दोनों भाइयों को बुलाया।

आँगन में वही पुरानी चारपाई बिछी थी।

नीम के पत्तों से छनकर धूप आ रही थी।

दीवार पर पिता की तस्वीर मुस्कुरा रही थी।

दोनों भाई माँ के पास बैठ गए।

कुछ पल तक माँ चुप रहीं।

फिर धीरे से बोलीं—

“आज मैं तुम्हें कोई हुक्म नहीं दूँगी…

बस एक माँ की आख़िरी सीख सुनाना चाहती हूँ।”

दोनों भाइयों का दिल धड़क उठा।

बड़े भाई ने कहा—

“माँ, ऐसी बातें मत किया करो।”

माँ मुस्कुराईं।

“हर बात मौत की नहीं होती बेटा…

कुछ बातें जीवन को बचाने की भी होती हैं।”

उन्होंने दोनों का हाथ अपने हाथों में ले लिया।

“याद है…

जब तुम छोटे थे,

एक रोटी के दो टुकड़े करके खिलाती थी।”

दोनों मुस्कुरा दिए।

“याद है माँ…”

“और याद है…

जब तुम दोनों किसी खिलौने के लिए लड़ते थे,

तो मैं क्या कहती थी?”

छोटे भाई ने सिर झुकाकर कहा—

“आप कहती थीं…

खिलौना टूट जाए तो दूसरा आ जाएगा,

भाई टूट जाए तो दूसरा नहीं मिलेगा।”

माँ की आँखें भर आईं।

उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा—

“बस…

यही बात कभी मत भूलना।”

हवा का हल्का झोंका आया।

नीम के कुछ सूखे पत्ते चारपाई पर गिर पड़े।

माँ ने उनमें से एक पत्ता उठाया।

“देखो…

जब यह पत्ता पेड़ से अलग हुआ,

तो हवा जहाँ चाहती है, उड़ा ले जाती है।

लेकिन जब तक यह पेड़ से जुड़ा था,

तब तक इसकी पहचान थी।

इंसान भी ऐसा ही होता है।

जड़ों से जुड़ा रहे,

तो आँधियाँ भी उसे नहीं गिरा पातीं।”

दोनों भाई मौन थे।

माँ आगे बोलीं—

“बेटा…

अगर कभी मतभेद हो,

तो उसे रात तक मत ले जाना।

सोने से पहले एक-दूसरे से बात कर लेना।

क्योंकि कई रिश्ते झगड़ों से नहीं,

अधूरी बातों से मर जाते हैं।”

यह सुनकर छोटे भाई की आँखों से आँसू बह निकले।

उसे वे सारे रविवार याद आ गए,

जो बातें करने के लिए तय हुए,

लेकिन कभी पूरे न हो सके।

बड़ा भाई भी रो पड़ा।

उसने छोटे भाई का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“आज से एक वचन लेते हैं।”

छोटे ने पूछा—

“कौन-सा वचन?”

बड़े भाई ने कहा—

“हम चाहे कितने भी व्यस्त हों,

महीने में एक दिन नहीं…

हर सप्ताह एक शाम,

सिर्फ़ भाई बनकर बैठेंगे।

न खेत की बात,

न पैसे की,

न ज़िम्मेदारियों की।

सिर्फ़ अपने दिल की बात करेंगे।”

छोटे भाई ने बिना एक पल गँवाए कहा—

“मैं यह वचन निभाऊँगा, भैया।”

माँ ने दोनों के सिर पर हाथ रख दिया।

उनकी आँखों से बहते आँसू अब दुःख के नहीं,

संतोष के थे।

उन्होंने आसमान की ओर देखा,

मानो पिता से कह रही हों—

“देखो…

तुम्हारी सबसे बड़ी विरासत बच गई।

तुम्हारे बेटों का प्रेम।”

उस शाम पहली बार बहुत दिनों बाद,

दोनों भाई नीम के नीचे देर तक बैठे।

बचपन की शरारतें याद कीं।

पिता की डाँट पर हँसे।

माँ की रोटियों का स्वाद याद किया।

और फिर…

बिना किसी झिझक के एक-दूसरे से कहा—

“अगर कभी हमसे गलती हो,

तो हमें छोड़ना मत…

हमें समझाना।”

सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।

आकाश सुनहरे रंग में रंग गया था।

नीम के पत्ते हवा के साथ गुनगुना रहे थे।

और ऐसा लग रहा था,

मानो समय भी रुककर यह दृश्य देख रहा हो।

क्योंकि…

कुछ वचन केवल दो इंसान नहीं लेते,

उन्हें पूरा परिवार,

पूरी आने वाली पीढ़ियाँ निभाती हैं।

यही वह शाम थी,

जिसने दोनों भाइयों को फिर से याद दिलाया—

**घर ईंटों से नहीं बनता,

घर उन लोगों से बनता है,

जो हर दूरी के बाद भी

एक-दूसरे तक लौटना जानते हैं।**उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

तीसवाँ अध्याय — “जब भाई, भाई के लिए दीवार बनकर खड़ा हुआ”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

ज़िंदगी…

इंसान की परीक्षा तब नहीं लेती,

जब सब कुछ ठीक चल रहा हो।

वह तब परखती है,

जब एक तरफ़ अपना सुख हो,

और दूसरी तरफ़ अपने का दुःख।

उस वर्ष बरसात कुछ ज़्यादा ही हुई।

नदियाँ उफान पर थीं।

खेतों में खड़ी फसल पानी में डूबने लगी।

गाँव के किसानों की आँखों में चिंता उतर आई।

बड़ा भाई सुबह-सुबह खेत देखने निकला।

चारों ओर पानी ही पानी था।

मेड़ों का नामोनिशान मिट चुका था।

वह चुपचाप मिट्टी को हाथ में लेकर खड़ा रहा।

तभी पीछे से छोटे भाई की आवाज़ आई—

“भैया…”

बड़े भाई ने मुड़कर देखा।

छोटा बिना कुछ पूछे उसके पास आकर खड़ा हो गया।

दोनों ने डूबती फसल को देखा।

कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर बड़े भाई ने धीमे स्वर में कहा—

“इस बार बहुत नुकसान हो जाएगा।”

छोटे भाई ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“नुकसान फसल का है, भैया…

हमारा नहीं।

हम दोनों साथ हैं,

इससे बड़ी पूँजी और क्या होगी?”

ये शब्द सुनकर बड़े भाई की आँखें भर आईं।

उसे बचपन याद आ गया।

जब दोनों भाई बारिश में भीगते हुए मिट्टी के घर बनाते थे।

आज बारिश वही थी,

लेकिन ज़िम्मेदारियाँ बदल गई थीं।

घर लौटते ही दोनों ने हिसाब की पुरानी कॉपी निकाली।

कर्ज़, खर्च, बीज, बच्चों की पढ़ाई…

सब सामने था।

कुछ देर बाद छोटा भाई बोला—

“भैया…

मेरे पास थोड़ी बचत है।

उसे पहले खेत सँभालने में लगा देते हैं।”

बड़ा भाई तुरंत बोला—

“नहीं…

वह तुम्हारे बच्चों के काम आएगी।”

छोटा मुस्कुराया।

“मेरे बच्चे बाद में पढ़ लेंगे…

लेकिन अगर आपका मन टूट गया,

तो हमारा घर टूट जाएगा।”

यह सुनकर बड़ा भाई अपने आँसू रोक न सका।

उसने छोटे भाई को गले से लगा लिया।

माँ दरवाज़े पर खड़ी यह दृश्य देख रही थीं।

उन्होंने चुपचाप भगवान के सामने हाथ जोड़ दिए।

“हे प्रभु…

ऐसा प्रेम हर घर को देना।”

अगले कई दिनों तक दोनों भाई साथ मिलकर खेत सँभालते रहे।

कभी एक फावड़ा चलाता,

तो दूसरा मिट्टी भरता।

कभी एक थक जाता,

तो दूसरा उसका हाथ पकड़ लेता।

गाँव वाले दूर खड़े यह दृश्य देखते और कहते—

“लोग कहते हैं इनका बँटवारा हो गया…

पर हमने तो इन्हें पहले से भी ज़्यादा साथ देखा है।”

एक शाम काम पूरा होने के बाद दोनों भाई नीम के नीचे बैठ गए।

आसमान साफ़ था।

बरसात के बाद की मिट्टी से सोंधी खुशबू उठ रही थी।

बड़े भाई ने मुस्कुराकर पूछा—

“छोटू…

अगर बाबूजी आज होते,

तो क्या कहते?”

छोटे भाई ने आसमान की ओर देखा।

फिर धीरे से बोला—

“वही…

जो हमेशा कहते थे—

‘फसल फिर उग जाएगी…

पर भाई का विश्वास एक बार टूट गया,

तो उसे उगाने में पूरी ज़िंदगी लग जाती है।'”

दोनों देर तक मौन बैठे रहे।

माँ ने दूर से आवाज़ दी—

“चलो बेटा…

खाना तैयार है।”

दोनों एक साथ उठे।

बिलकुल वैसे ही…

जैसे बचपन में माँ की आवाज़ सुनते ही दौड़ पड़ते थे।

उस दिन गाँव के लोगों ने पहली बार समझा—

**बँटवारा घरों का हो सकता है,

दिलों का नहीं।

और जिस घर में भाई एक-दूसरे के लिए ढाल बन जाएँ,

वहाँ कोई आँधी स्थायी नहीं होती।**

रात को पिता की तस्वीर के सामने दीपक जल रहा था।

उसकी लौ पहले से कहीं अधिक उजली लग रही थी।

मानो वह भी मुस्कुरा रही हो।

और शायद…

कह रही हो—

**”मेरी सबसे बड़ी विरासत खेत नहीं थे…

मेरे बेटे थे।”**उपन्यास — “दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

अंतिम अध्याय — “असल बँटवारा ज़मीन का नहीं, समय का था”

धर्मेन्द्र शर्मा की कलम से

वक़्त…

किसी नदी की तरह बहता रहता है।

उसकी धारा में बचपन भी बह जाता है,

यौवन भी,

और एक दिन आदमी खुद भी आईने में अपने पिता जैसा दिखाई देने लगता है।

साल बीत गए।

नीम का पेड़ अब और भी विशाल हो चुका था।

उसकी छाया में अब दोनों भाइयों के बच्चे खेलते थे।

उसी मिट्टी में,

जहाँ कभी दोनों भाइयों ने कंचे खेले थे,

आज नई पीढ़ी अपने सपनों के घर बना रही थी।

माँ अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं।

चलना धीमा हो गया था,

लेकिन उनकी आँखों की चमक अब भी वही थी।

एक शाम उन्होंने दोनों बेटों को बुलाया।

“आज मुझे नीम के नीचे बैठना है।”

दोनों भाइयों ने उन्हें सहारा देकर उसी पुरानी चारपाई पर बैठाया।

हवा में मिट्टी की सोंधी महक घुली थी।

सूरज ढल रहा था।

आकाश हल्के सुनहरे रंग में रंगा हुआ था।

कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर माँ मुस्कुराईं।

“याद है…

यहीं तुम दोनों मिट्टी के घर बनाया करते थे।”

दोनों हँस पड़े।

“हाँ माँ…”

माँ ने पूछा—

“और जब घर टूट जाता था,

तो क्या करते थे?”

छोटे भाई ने कहा—

“फिर से बना लेते थे।”

माँ ने धीरे से कहा—

“बस…

यही बात असली जीवन है।

घर टूटे तो बना लेना…

रिश्ता टूटे,

तो उसे भी बना लेना।

बस अहंकार को कभी ईंट मत बनने देना।”

यह कहते-कहते उनकी आँखें पिता की तस्वीर पर टिक गईं।

दोनों भाइयों ने भी उधर देखा।

जैसे वर्षों बाद पिता की आवाज़ फिर सुनाई दे रही हो—

“बेटा…
जिस दिन एक-दूसरे के लिए समय निकालना छोड़ दोगे,
उसी दिन असली बँटवारा शुरू हो जाएगा।”

बड़ा भाई धीरे से बोला—

“छोटू…”

“हाँ भैया?”

“अब समझ आया…

हमारा बँटवारा कभी हुआ ही नहीं था।”

छोटा मुस्कुराया।

“हाँ…

हमने तो सिर्फ़ ज़िम्मेदारियाँ बाँटी थीं।

गलती बस इतनी हुई कि कभी-कभी समय नहीं बाँट पाए।”

दोनों की आँखों से आँसू बह निकले।

उन्होंने एक-दूसरे का हाथ वैसे ही थाम लिया,

जैसे बचपन में नदी पार करते समय थामा करते थे।

माँ की आँखों में संतोष उतर आया।

उन्होंने आसमान की ओर देखा।

धीरे से कहा—

“सुन रहे हो…

तुम्हारे बेटे आज भी साथ हैं।”

उसी समय हल्की हवा चली।

नीम के कुछ पत्ते दोनों भाइयों के कंधों पर आकर गिरे।

जैसे प्रकृति ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया हो।

दूर मंदिर की घंटी बजी।

गाँव की पगडंडी पर बच्चे हँसते हुए घर लौट रहे थे।

जीवन चलता रहा।

लेकिन उस शाम,

दोनों भाइयों ने अपने बच्चों को पास बुलाया।

बड़ा भाई बोला—

“बेटा…

ज़मीन बाँटनी पड़े,

तो बाँट लेना।

काम बाँटना पड़े,

तो बाँट लेना।

लेकिन कभी ऐसा मत होने देना कि तुम्हारे पास अपने भाई के लिए पाँच मिनट भी न बचें।”

छोटे भाई ने आगे कहा—

“याद रखना…

रिश्ते रोज़ थोड़ा-थोड़ा समय माँगते हैं।

अगर उन्हें समय नहीं दोगे,

तो एक दिन वे शिकायत भी करना छोड़ देंगे।”

बच्चे चुपचाप सुनते रहे।

शायद उन्हें उस समय सब समझ नहीं आया।

लेकिन माँ मुस्कुरा रही थीं।

उन्हें विश्वास था—

आज जो बात इन बच्चों के कानों में गई है,

वह कल उनके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बनेगी।

रात हो गई।

आँगन में दीपक जल उठा।

पिता की तस्वीर,

माँ की मुस्कान,

दो भाइयों का साथ,

और नीम की छाया—

सब एक ही दृश्य में समा गए।

और उसी क्षण इस कहानी ने अपने उत्तर को पा लिया।

“दो भाई… फिर बँटवारा क्यों?”

क्योंकि…

बँटवारा खेतों का नहीं होता,
बँटवारा घरों का नहीं होता,
बँटवारा दीवारों का भी नहीं होता।

असल बँटवारा तब होता है,
जब हम अपनों के लिए समय निकालना छोड़ देते हैं।

अगर प्रेम बचा रहे,

सम्मान बचा रहे,

संवाद बचा रहे,

तो एक ही गाँव में दो घर नहीं,

दो दिल भी हमेशा एक ही घर बने रहते हैं।


उपसंहार

यदि इस उपन्यास को पढ़ने के बाद…

कोई भाई अपने भाई को एक फ़ोन कर दे,

कोई बहन अपने भाई से रूठना छोड़ दे,

कोई बेटा अपने माता-पिता के साथ बैठकर भोजन कर ले,

या कोई परिवार फिर से एक साथ हँसने लगे—

तो समझिए,

इस कहानी का उद्देश्य पूरा हो गया।

— धर्मेन्द्र शर्मा की कलम सेलेखक की कलम से

प्रिय पाठकों,

यह केवल दो भाइयों की कहानी नहीं है।

यह हर उस घर की कहानी है जहाँ कभी एक ही थाली में खाना खाया गया, एक ही आँगन में खेला गया, एक ही माँ की गोद में सिर रखकर नींद आई, और एक ही पिता के कंधों पर बैठकर दुनिया देखी गई।

समय बदलता है।

ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती हैं।

घर बड़े हो जाते हैं।

लेकिन यदि दिल छोटे हो जाएँ, तो सबसे बड़ी संपत्ति भी इंसान को अमीर नहीं बना सकती।

मैंने यह उपन्यास किसी एक परिवार को देखकर नहीं लिखा।

मैंने इसे उन अनगिनत रिश्तों को देखकर लिखा है जो नफ़रत से कम, और चुप्पी से ज़्यादा टूटते हैं।

कई बार हम सोचते हैं—

“कल बात कर लेंगे…”

“अगले रविवार मिल लेंगे…”

“फुर्सत मिलेगी तो साथ बैठेंगे…”

लेकिन जीवन हर बार हमें वह “कल” नहीं देता।

इसलिए…

अपने लोगों के लिए समय निकालिए।

माँ के पास बैठिए।

पिता की बातें सुनिए।

भाई का हाथ पकड़िए।

बहन की हँसी को संजोइए।

क्योंकि जब ये रिश्ते छूट जाते हैं, तब दुनिया की कोई दौलत उन्हें वापस नहीं ला सकती।

यदि इस उपन्यास की किसी पंक्ति ने आपकी आँखें नम की हों…

यदि किसी अध्याय ने आपको अपने भाई, बहन, माता या पिता की याद दिलाई हो…

यदि आपने इसे पढ़कर किसी अपने को गले लगाने का मन बनाया हो…

तो मेरी कलम सफल हो गई।

मेरी बस एक ही प्रार्थना है—

घर बनाइए, दीवारें नहीं।
संवाद रखिए, चुप्पियाँ नहीं।
प्रेम बाँटिए, संपत्ति नहीं।

ईश्वर करे हर घर में प्रेम बना रहे, हर माँ की मुस्कान बनी रहे, और हर भाई का हाथ अपने भाई के हाथ में बना रहे।

आपके प्रेम और आशीर्वाद का आकांक्षी,

— धर्मेन्द्र शर्मा की कलम सेसमर्पण

उन सभी भाइयों के नाम…

जो बचपन में एक ही आँगन की मिट्टी में खेले,

एक ही थाली में रोटी खाई,

एक-दूसरे के आँसू बिना पूछे समझे,

और एक-दूसरे की खुशियों में अपनी खुशियाँ खोजीं।

उन सभी माताओं के नाम…

जिन्होंने अपने आँचल की छाँव में बच्चों को प्रेम, त्याग और एकता का पाठ पढ़ाया,

और जो आज भी यही दुआ करती हैं कि उनके बच्चे कभी एक-दूसरे से दूर न हों।

उन सभी पिताओं के नाम…

जिन्होंने अपने सपनों से बड़ा अपने परिवार का सपना देखा,

जिनके पसीने की हर बूँद ने घर की नींव को मज़बूत बनाया,

और जिन्होंने अपनी सबसे बड़ी विरासत ज़मीन नहीं,

बल्कि संस्कार छोड़े।

और…

उन हर टूटते रिश्ते के नाम,

जिसे अभी भी प्रेम, संवाद और थोड़ा-सा समय देकर बचाया जा सकता है।

यह उपन्यास उन सभी परिवारों को समर्पित है,

जो मानते हैं कि—

रिश्ते विरासत से नहीं,
विश्वास से चलते हैं।

घर ईंटों से नहीं,
अपनों के साथ से बनता है।

और…

भाई का हाथ कभी छूटना नहीं चाहिए,
क्योंकि दुनिया में हर रिश्ता दोबारा मिल सकता है,
पर बचपन वाला भाई नहीं।

— धर्मेन्द्र शर्मा

धर्मेन्द्र शर्मा

Ranpur Ambah, Morena (M.P.) M= 90391 04716

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