बाल कहानी – रिषभ को मिली साइकिल
रिषभ साइकिल को देखकर मचल जाता था। वह भी साइकिल चलाना सीखना चाहता है। अभी दस साल का है। कोई साइकिल देखता। वह उसे ललचाई नजरों से देखने लगता। वह साइकिल छू लेता और बड़े ध्यान से साइकिल निहारता। मन करता था कि वह साइकिल लेकर चल दे। कितनी प्यारी साइकिल है। एक साइकिल मुझे मिल जाती तो खूब दौड़ाता। मजा आ जाता। इतने में गोलू उधर से साइकिल चलाते हुए गुजरा। साइकिल को देखकर बेचारा रिषभ उतावला हो गया।
गोलू को देखकर चिल्लाया–“गोलू अपनी साइकिल थोड़ा देना, मैं भी सीखना चाहता हूँ।”
गोलू ने कहा–“अपने पापा से कहकर एक साइकिल ले लो। मेरी साइकिल तुम गिरा दोगे, टूट जायेगी।”
गोलू की साइकिल को देखता रहा। वहां से घर आ गया। कुछ बुझा सा लग रहा था। मम्मी के पास गया। मम्मी से रिषभ बोला– “मम्मी, पापा से कह दो एक साइकिल ला दे। गोलू के पास साइकिल है। मैं मांग रहा था। वह कह रहा था कि अपने पापा से कहकर साइकिल मंगा लो। मैं अपनी साइकिल नहीं दूंगा। “
इतने में रिषभ के पापा आ गये। रिषभ की मां ने बताया कि रिषभ कह रहा है एक साइकिल लेने के लिए। रिषभ पढ़ने में ज्यादा ध्यान नही देता था। उसके पापा ने कहा–अगर वह कक्षा में पढ़ने में तेज रहेगा और कक्षा में प्रथम स्थान लायेगा तो एक साइकिल दिला देंगें।
साइकिल का नाम सुनकर रिषभ अब दिनभर पढ़ने लगा। वह साइकिल लेना चाहता है। अब रिषभ पढ़ने में तेज हो गया और अपनी कक्षा में प्रथम स्थान आया। वादा के अनुसार रिषभ को साइकिल खरीदकर उसके पापा ने दे दी। अब रिषभ खूब खुश है। बच्चों को लालच देकर पढ़ने के लिए एकाग्र किया जा सकता है।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय
