तेरी मेरी यारी
‘तेरी मेरी यारी’… यह महज़ दो शब्दों का एक जुमला नहीं, बल्कि ज़िंदगी का वह सबसे ख़ूबसूरत एहसास है जिसमें अनगिनत कहानियों की ख़ुशबू बसी होती है। यह उस बेफ़िक्र दौर का नाम है जहाँ ना कोई नफ़ा-नुकसान का हिसाब था और ना ही दिखावे का कोई दायरा।
बचपन के खेल और बेफ़िक्र बचपन,,
दोस्ती की नींव अक्सर धूल और धूप से सने खेल के मैदानों में पड़ती है। वह शाम को ढलने से पहले एक और मैच खेलने की जिद्द, घुटने छिल जाने पर एक-दूसरे को संभालना और फ़िर एक मुस्कान के साथ सब भूल जानायही तो यारी का पहला सबक़ था।
स्कूल के दिन और वो आधी बांटी गई टिफ़िन
स्कूल के दिनों की यादें इस यारी के बिना बिल्कुल अधूरी हैं।
किताबों के बीच छिपे किस्से,आधी-अधूरी पढ़ाई और टीचर की नज़रों से बचकर एक-दूसरे को इशारे करना।
बेल बजते ही बिना पूछे एक-दूसरे का खाना चट कर जाना और वही आधी ठंडी रोटी भी दुनिया का सबसे स्वादिष्ट खाना लगना।
सज़ा में भी साथ, क्लास से बाहर धूप में खड़े होने पर भी एक-दूसरे का चेहरा देखकर हंस देना।
वक्त बदला, लेकिन अहसास वही रहा।
समय के साथ-साथ ज़िंदगी बदलती है, शहर छूटते हैं और ज़िम्मेदारियों का बोझ बढ़ता है। स्कूल की यूनिफॉर्म से निकलकर हम सूट और फॉर्मल्स में आ जाते हैं, लेकिन सच्ची यारी कभी पुरानी नहीं होती। महीनों बाद भी जब फ़ोन बजता है, तो संवाद वहीं से शुरू होता है जहाँ कल छूटा था। यहाँ किसी शिष्टाचार की जरूरत नहीं होती; बस एक ‘हाँ भाई, बता!’ ही दिल को सुकून देने के लिए काफ़ी होता है।
अपनापन और बिना शर्त का सहारा
ज़िंदगी जब भी थकाती है, तो यारी का वह पुराना कंधा ही सबसे महफ़ूज़ ठिकाना लगता है। दोस्ती में प्यार होता है, लेकिन बिना किसी शर्त का; अपनापन होता है, लेकिन बिना किसी उम्मीद का।
‘तेरी मेरी यारी’ दरअसल हमारे बचपन की उन मासूम मुस्कानों का एक सुरक्षित रिज़र्व बैंक है, जहाँ से हम जब चाहें, बिना किसी ब्याज़ के ढेर सारी ख़ुशियाँ निकाल सकते हैं।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
