कलियुग का महत्व
अक्सर लोग कहते रहते हैं- “अरे भाई घोर कलियुग है”। जहाँ कहीं कोई अनियमितता देखी रोने लगते हैं- “कलियुग में तो अब यही सब देखना पड़ेगा”।
एक दिन मुझे विचार आया कि लोग ऐसा क्यों कहते हैं। मनन किया तो विलक्षण तथ्य सामने आये।
मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य है मोक्ष प्राप्त करना। सतयुग, द्वापर, त्रेता सभी युगों में मनुष्य को मोक्ष प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करनी पड़ती थी, यज्ञ करना पड़ता था और यह सभी अनुष्ठान करने में आसुरी वृत्तियाँ (शक्तियां) व्यवधान उत्पन्न करती थीं। इसीलिए विश्वामित्र जी राम, लक्ष्मण को असुरों से अपने यज्ञ की रक्षा के लिए अपने आश्रम में ले गए थे।
किन्तु कलियुग में यदि आप यज्ञ करें तो कोई भी व्यवधान नहीं डालेगा ज़्यादा से ज़्यादा लोग कहेंगे की पता नहीं कैसा आदमी है व्यर्थ में इतना घी बर्बाद कर रहा है।
आप कहीं जंगल या किसी पार्क में पेड़ के नीचे बैठकर ध्यान, तप, साधना करें तो व्यवधान पैदा करना तो दूर कोई आपके पास फटकेगा नहीं दूर से ही लोग आपस में बात करेंगे कि भाई पता नहीं कौन पागल आदमी है पंद्रह दिन से वहां पेड़ के नीचे बैठा पता नहीं क्या कर रहा है।
कलियुग में इतनी अच्छी व्यवस्था है कि अच्छे कार्यों में कोई भी प्रतिद्वंदी सामने नहीं आता है। आप किसी को दान दें तो आपसे अधिक दान देने के लिए कोई सामने नहीं आएगा बल्कि लोग यही कहेंगे कि बेवकूफ है फालतू में पैसा बर्बाद कर रहा है। सारी मारामारी, लड़ाई-झगड़ा, प्रतिद्वंदिता ठेका, टेंडर आदि में जनता के धन की लूट करने जैसे बुरे कामों में दिखाई देती है।
क्या आप जानते हैं कि कलियुग में मोक्ष प्राप्त करने के लिए कितनी बड़ी सुविधा ईश्वर ने दी है। केवल राम (ईश्वर) का नाम लेने से ही इस युग में मोक्ष मिल जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है
“कलजुग केवल नाम अधारा,
सुमिरि-सुमिरि नर उतरहिं पारा। “
उपरोक्त तत्थों के आधार पर जब आप सोचेंगे तो पाएंगे की कलियुग दूसरे सभी युगों की तुलना में कितना सुविधाजनक और अच्छा है लोग व्यर्थ ही कलियुग को कोसते रहते हैं।
–प्रेम चन्द्र शुक्ल
