मुक्तक/दोहा

सोरठा छंद

मत कर तू अपराध,  मनमानी सब व्यर्थ है ।
मन को अपने साथ, ईश्वर पर विश्वास कर।।

कहें मित्र यमराज, इक दिन होता बोध है।
हो जाती है देर, कब समझे मानव भला।।

कमल खिला बंगाल, जाने कैसे क्या हुआ।
ये भी हुआ कमाल, अब शुभेंदु सरकार है।।
 
अब तो नित्य कमाल, सेना अपनी कर रही।
जमकर मचा बवाल, और देखिए पाक में।।

नहीं जानते आप, हम हैं बड़े कमाल के।
क्या ये कोई पाप, बने मित्र यमराज जी।।

हो  जाओ  तैयार,         आने  वाला  नौतपा।
हम तो थे लाचार, कल मत कहना किसी से।।

मानव अब लाचार, किस कारण से इन दिनों।
हुए  सभी  बीमार,     यह  कैसा  दुर्भाग्य है।।

सहे युद्ध की मार, जन  मानस की  बेबसी।
वे भी हैं लाचार, तनिक दोष जिनका नहीं।।

मात-पिता लाचार,  सबसे ज्यादा आजकल।
असहनीय  व्यवहार, बच्चे  उनसे  कर  रहे।।

मेरे पालनहार, वृद्धाश्रम में आज हैं।
कैसे हैं लाचार, कोई  बतलाए हमें।।

सौंप दिया संतान, अपनी पूँजी भला क्यों।
लिया आज ये जान, मूर्ख नहीं लाचार हो।।

इतना सारा प्यार, बिना स्वार्थ उसने दिया।
कब था वो लाचार, दुनिया चाहे जो कहे।।

जनता  है  लाचार, राजनीति  के  द्वंद्व  में।
खुद अपनी सरकार, उसने ही तो है चुना।।

रहता मस्त मलंग,  अपनी धुन में जो सदा।
जैसे पीकर भंग, उसे  देख  जग  हँस रहा।।

साधू संत फकीर, भला दिखावा कब करें।
व्यर्थ मानते  पीर, मस्त  मलंगी  भावना।।

खुद को मान मलंग, काश रहें हम आप भी।
कभी दुखों का रंग,  नहीं चढ़ेगा  एक  पर।।

अब तो रोज प्रहार, जल जंगल पर हो रहा।
कुत्सित है व्यवहार, ओढ़ लबादा दंभ का।।

दोहन अरु व्यापार,जल स्रोतों का हो रहा।
सहता   अत्याचार, हर  प्राणी  बेचैन  है।।

इसका हमको ध्यान, गर्मी से हम जल रहे।
ये कैसा है ज्ञान, आज मनुज का देखिए।।

वृक्ष  लगाओ  एक, कहते  हैं यमराज जी।
भागें रोग अनेक, देख भाल भी कीजिए।।  

वृक्ष  लगाओ  आप, अपने  बच्चों  के  लिए।
बने नहीं अभिशाप, आज आपके कर्म कल।।

बिगड़ गया अनुपात, आज प्रकृति के चक्र का।
प्रकृति  संग  उत्पात, जब से हम  करने  लगे।। 

हम  सब  जिम्मेदार, तपती  धरती  के  लिए।
कैसे  कहते  आप  हैं, उचित  यही व्यवहार।।

जाना जब यमलोक, धरती की क्या फिक्र है। 
नाहक  करते  शोक, पर्यावरण का आप भी।।

रामायण  का  पाठ, देता  है  सद्ज्ञान  भी।
खुल जाती हर गाँठ, संग प्रभो वरदान के।।

अब मैंने अवतार, फलाँ प्रभो का ले लिया।
ये  सारा  संसार,    मेरी  मुट्ठी  में  कैद  है।।

मान  लीजिए  आप, मैं यम का अवतार हूँ।
बचे रहो मम शाप, धन दौलत सौंपो मुझे।।

है मुझको  विश्वास, गुरू ईश अवतार  सम।
पूरी हो  हर आस, दोनों  की इतनी  कृपा।।

राम-कृष्ण  अवतार,  विष्णु रूप में भूमि पर।
यही सत्य का सार, दोनों अब तक अमर हैं।।

सोच  रहा था आज,  लूँ रावण अवतार मैं।
देखूँ  उनका काज, इतने  ज्ञानी  विश्व  में।।

साधू संत फकीर, भला दिखावा कब करें।
पीर न जाने  पीर, मस्त  मलंगी  भावना।।

इतना सारा प्यार, बिना स्वार्थ उसने दिया।
कब था वो लाचार, दुनिया चाहे जो कहे।।

नहीं जानते आप, हम हैं बड़े कमाल के।
क्या ये कोई पाप, बने मित्र यमराज के।।

मात-पिता लाचार,  सबसे ज्यादा आजकल।
असहनीय  व्यवहार, बच्चे  उनसे  कर  रहे।।

मेरे पालनहार,  वृद्धाश्रम में आज हैं।
कैसे हैं लाचार,  कोई  बतलाए हमें।।

मेरा  भी  अपमान,     आप  संग  में  हो  गया।
जिसका तनिक गुमान, सपने में मुझको नहीं।।

 वह देता कब ध्यान,  जिसे  बोध  होता  नहीं।
उनका  कब  अपमान, आप  हमें  बतलाइए।। 

फैले मुख मुस्कान, रहें सदा सब हंसते।
मान गुणों की खान , ईश कृपा हो सब पे।।

होंठों की  मुस्कान, मन की  नीरसता हरे।           
सुंदर सा यह ज्ञान, मस्ती पल में ही भरे।।

आप कभी मुस्कान, नहीं छीनिए किसी की।
मानें मत अहसान, नियम यही सबके लिए।।

जीवन  में  उत्कर्ष, हर  प्राणी  है  चाहता।
चहुँदिश में हो हर्ष, संत करें नित प्रार्थना।।

होता  है   उत्कर्ष,    नीति   नियम   सिद्धांत  से।
खो  देता  निज  हर्ष,      गलत  पर  जो  चला।।

तुम हो  सेवादार, नहीं  भरोसा  हम  करें।
भरते आप बखार,  ईश्वर का घर लूटकर।।

अक्सर ही उत्पात, त्योहारों  पर हो रहा।
कैसी है यह जात, पहचानी जाती नहीं।।                                
बस केवल उत्पात, कुछ लोगों की धारणा। 
खाते  जूता  लात,  जाने  कैसी  बुद्धि  है।।

मन की आँखें खोल, जो भी आगे  बढ़ते।
बोलें मीठे बोल, जिसका यह सिद्धांत है।।

होता  अपने  हाथ, मन  की  आँखें  खोलना।
हर मुश्किल में साथ, सबका मिलता है उसे।।

मन में देखो झाँक कर, देखो अपने पाप।
राम दान को लूटते, करके  माला  जाप।।

मन में  देखो  झाँक, पाक-साफ  कितना हुए।
पाप को अपने टाँक, या फिर घर में बैठकर।।

जो  करते  स्वीकार, मन  में  अपने  झाँकना।

आज समय दरकार,यही बड़प्पन मनुज का।।

करो आप बदलाव, मन में अपने झाँककर।
केवल  नेक  सुझाव, देते  हैं  यमराज जी।।

चढ़ा चढ़ावा खूब,  प्रभो राम  के चरण में।
वो भी श्रद्धा डूब, जिसने भी चोरी किया।।

करते क्यों अपराध, चोर चढ़ावा बोलकर।
रहा राम को साध, वो भी तो इक भक्त है।।

गुस्से  में  यमराज,  चोर  चढ़ावा  कह रहे।
उनको आती लाज, देख अनूठे भक्त को।।

बिना भाव का फूल, काँटा बनता मुफ्त में।
हर लेते सब शूल, पत्थर के  भगवान भी।।

देश हुआ बदहाल, नहीं आज का सत्य है।
चिंतन पड़ा अकाल, मान रहे हैं आप भी।।

कहें मित्र यमराज, करो ईश का ध्यान नित।
होंगे  पूरण  काज, बदहाली  भी दूर  सब।।

किसका इसमें दोष, आज अगर बदहाल हैं।
झूठा  करते  रोष,      जिम्मेदारी  आपकी।।

कैसे  हो  विस्तार, यही तो हमें सोचना।
बैठे -बैठे  यार, नहीं   लगेगा   रोचना।।

बस अपना  विस्तार, आज सभी  हैं चाहते।
चुनें  सभी आधार, रिश्ता  स्वार्थ के वास्ते।।

एक  मात्र  यमराज, मेरे  प्यारे  मित्र  हैं।
कैसा भी हो काज, रुकता मेरा है नहीं।। 

जगन्नाथ  सरकार, होती   जय-जयकार  है।
उल्लासित संसार।,निकल पड़े रथ बैठकर।।

पुण्य कमाते लोग, रथ यात्रा रथ खींचकर।
भक्त जनों के रोग, जगन्नाथ  प्रभु जी हरें।।ं

कहें  मित्र  यमराज, रथयात्रा  रथ  थामकर।
सेवा अवसर आज, जगन्नाथ प्रभु दीजिए।।

तपता जन का मान, अनशन की ज्वाला जले।
मिटे नहीं अभिमान, और  गले तन  साँच  में।।

नहीं  बड़ा  हथियार, गुरू-ईश से  जगत  में।
अपनी  है  सरकार, कहते ज्ञानी संत मुनि।।

सिर्फ आज हथियार, धरना प्रदर्शन बना।
 झूठा इसका सार, होता जाता कुछ नहीं।।

करें न्याय की बात, हाथों में हथियार ले।
केवल जूता-लात, इनको केवल चाहिए।।

बना लिया हथियार, दान चोर ने राम को।
जो मेरा अधिकार, हमने तो वो ही किया।।

हो  जिसका  हथियार, सत्य धर्म  ईमान ही।
आप व्यर्थ तकरार, उनसे कभी न कीजिए।

निज का हर हथियार, हिम्मत को ही मानिए।
बाकी  सब  बेकार, काम  यही आता  सदा।।

भारत  देश  महान, दुनिया  करती गान है।
बना तिरंगा शान, नित नूतन पहचान की।।

बनी  अनूठी  शान, अपने भारत  देश की।
सीना अपना तान, सीमा पर सैनिक खड़े।।

हमको है अभिमान, हर भारतवासी कहे।
भारत देश महान, सबसे सुंदर विश्व  में।।

प्रगति  संग  पहचान, नित गौरव है बढ़ रहा।  
भारत देश महान, विश्व पटल पर चमकता।।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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