लौ दीये की
बहुत ढूंढा कहीं मिला ही नहीं
वह पत्थर जिस पे सर रखकर
कभी अर्पित कर सकती
अपनी मासूम इच्छाएं
सौंप देती अपने सारे सपने
आंखों के कोरों का जल
तमाम निर्दोष याचनाएं
और एकतरफा रास्ता
चाहे कितनी भी कठोरता होती
हर कंपन से वह दरक जाता
बिखरता हुआ उसका कण-कण
एकदम भुरभुरा सा हो जाता
अवचेतन मन के भटकाव में
तमस की संभावनाएं प्रबल होती
शून्य के इर्द-गिर्द रौशनी चाहिए
मन के किसी कोने में आकृति आकार लेती
मेरा हाथों निर्मित होता एक दीया
मैं बन जाती उसकी गीली बाती
टिमटिमाती लौ जैसे समर्पण का प्रतीक
हर पल,हर लम्हा सांसे स्पंदित होती
— सपना चन्द्रा
