कविता

रसामृत कृष्ण (रूपगोस्वामी के भक्ति-दर्शन से प्रेरित)

तम की तंद्रा टूटी, नील निशा मुस्काई,
बंदीगृह के घोर तम में कृष्ण-ज्योति आई।
जैसे सूनी धरती पर सावन-ऋतु छाई,
वैसे मानव-मन में प्रेम-प्रभा मुस्काई।

न मुकुट की चाह मुझे, न मोतियों का हार,
अधरों पर बस गूँज उठे मुरली की झंकार।
श्याम-नाम की सुधा मिले, मिट जाए मन-भार,
एक बूँद से खिल उठे जीवन का मधुमास अपार।

तुम केवल देव नहीं, प्रेम स्वयं साकार,
राधा के अनुराग में तुम प्रेम के आधार।
ज्ञान जहाँ थमकर झुके, प्रेम बने गतिमान,
भक्ति जब बन जाए प्राण, गल जाए अभिमान।

न चाह रहे, न अधिकार, न अपना कोई मान,
प्रिय की प्रसन्नता में ही प्रेमी का कल्याण।
प्रेम न माँगे प्रतिदान, प्रेम न गिने उपकार,
प्रिय के सुख में सुख पाए—यही प्रेम का सार।

मिलन बने मधुमास-सा, विरह बने मधुप्यास,
दूर रहो तो नाम बनो, पास रहो तो श्वास।
विरह-वेला में भी मिले स्मृति का मधुर प्रकाश,
श्याम-स्मरण से भर उठे अंतर का आकाश।

गोपी-प्रेम-सा निर्मल हो मन का हर व्यवहार,
‘मैं’ का बंधन गलता जाए, ‘तुम’ ही जीवन-सार।
निज सुख से ऊपर उठकर प्रिय-सुख हो स्वीकार,
यही समर्पण, यही साधना, यही प्रेम-विस्तार।

वृन्दावन की धूल में प्रेम हुआ साकार,
कुंज-कुंज में कान्हा गूँजे, मुरली की झंकार।
कण-कण में कान्हा झलके, पत्ती-पत्ती प्यार,
श्याम-स्मृति की छाँव तले खिलता रहे संसार।

रूप कहें—रस एक है, रूप अनेक अपार,
जैसे सागर एक हो, लहरें रूप हजार।
प्रेम-बूँद में सिंधु समाया, बूँद में विस्तार,
कृष्ण-प्रेम की एक झलक खोले आत्म-द्वार।

न मुक्ति की अभिलाषा, न वैकुण्ठ-विहार,
जन्म-जन्म बस प्रेम मिले, श्याम! चरणों में प्यार।
राधा-भाव की रश्मि बने, कृष्ण-नाम की धुन,
प्रेम-सुधा से भीगता रहे मन का अंतर-कुंज।

जब तक धड़कन शेष रहे, तब तक यही पुकार—
कृष्ण! तुम्हीं रस, तुम्हीं प्रेम, तुम्हीं मेरे आधार।

जन्माष्टमी का पर्व बने अंतर का उजियारा,
मन से मिटे मोह-मद, मिटे अँधियारा सारा।
भीतर का जो कंस बसे, प्रेम करे संहार,
दया, धर्म, करुणा से महके जीवन-व्यवहार।

जब ‘मैं’ का कारागार टूटे, कृष्ण तभी मुस्काएँ,
सूने मन के आँगन में प्रेम-कुसुम खिलाएँ।
मंदिर-मंदिर दीप जले, मन भी दीपित हो जाए,
कृष्ण-जन्म तब पूर्ण कहाएँ—जब हम कृष्णमय हो जाएँ।

— डॉ. अनिता जैन ‘विपुला’

डॉ. अनिता जैन

1. नाम: डॉ. अनिता जैन 2. धारक नाम / उपनाम (लेखन हेतु): "विपुला" 3. जन्मदिन एवं जन्म 11 जुलाई स्थान: बीकानेर राजस्थान 4. शैक्षणिक योग्यता (ऐच्छिक): Ph. D. , M. Phil. NET. M.A. (संस्कृत - साहित्य , दर्शन ) M.A. ( हिंदी साहित्य ) MBA in HR 5. व्यवसाय: अतिथि प्राध्यापक ( विश्वविद्यालय में ) 6. प्रमुख लेखन विधा: छंद मुक्त, मुक्तक, हायकू ,वर्णपिरामिड, क्षणिका, लघुकथा,निबन्ध, आलेख आदि। 7. साहित्यिक उपलब्धियाँ/पुरस्कार/सम्मान: विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ एवं लेख प्रकाशित होते रहते हैं। आकाशवाणी में एंकरिंग एवं कविता पाठ आदि । ngo से जुड़ी हुई हूँ। समय समय पर सामाजिक उत्थान के कार्यों में सहभागिता। हिंदी के साथ साथ राजस्थानी भाषा में भी लेखन। "वर्णपिरामिड श्री", "सर्वश्रेष्ठ मुक्तककार", सम्मान आदि । 8. रुचि/शौक़: संगीत, अध्ययन,लेखन,प्राकृतिक स्थलों का भ्रमण,कुकिंग आदि । 9. वर्तमान पता एवं सम्पर्क सूत्र (ऐच्छिक): सेक्टर - 4, उदयपुर राजस्थान । Email- dranitajain@gmail.com 10. उपलब्धियों में- 12 वीं बोर्ड की योग्यता सूची में 7वाँ स्थान। मेडल एवं मैरिट छत्रवृति प्राप्त, बी. ए. में राष्ट्रीय छत्रवृत्ति प्राप्त। NSS में प्री आर डी एवं राष्ट्रीय एकात्मकता शिविर में राजस्थान का प्रतिनिधित्व।वाद विवाद , आशु भाषण, निबन्ध एवं कविता आदि में छात्र जीवन में अनेक पुरस्कार प्राप्त। *महाविद्यालय शिक्षिका के रूप में केरियर की शुरुआत। अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में पत्र वाचन, शोध पत्र प्रकाशन। *दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित होने वाली हैं।

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