बड़की भाभी
वह सींचती है घर को
अपने मेहनत से
भोर में ही उठ जाती है
कुछ बाकी सी नींद रह जाती है
फिर भी उठती है
नींद में कुछ करते नजर आती है
घर के कूड़े को
एक तरफ करती हुई
पल्लू को खोंसते हुये
कुछ घरेलू काम में
वह व्यस्त नजर आती है
कुछ नाश्ते के लिए
चूल्हों पर फूंक मारती है
कई फूंक मारने पर
तब जलती हैं लकड़ियाँ
पूरा चेहरा
धुएँ से भर जाता है
सेंकती तवे पर रोटियां
पसीने से भीगी वह
ऊपर से ब्लाउज का
दो बटन खोल कर रखती है
ताकि हवा की लहरों से
कुछ ठंडई मिल जाये
पर बेचारी
पोंछती पसीने को
परोसती खाने को
सब को खिलाकर
बची सब्जियों को लेकर
रोटियां तोड़ती
कुछ कौर खाती
सास मांग लेती एक गिलास पानी
खाना छोड़कर
संस्कार निभाती बेचारी
जब भी खाने बैठती
किसी काम को करने का आदेश मिलते ही
बिना शिकायत किये
झटपट दौड़ पड़ती
समय के प्रवाह में
ऐसे ही कट रही है
जिम्मेदारियों के बीच
बड़की भाभी का दिन
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
