राजकोष पर बोझ या घर में क्रांति? असली सवाल यही है
किसी घर की आर्थिक ताकत अलमारी में रखे नोटों से नहीं, उस हाथ से तय होती है जो अगला रुपया खर्च करता है। भारत के करोड़ों घरों में यह फैसला लंबे समय तक उस महिला के हाथ में नहीं था, जो भोजन, बच्चों की पढ़ाई और परिवार की देखभाल संभालती रही। अब सरकारें उसी महिला के बैंक खाते में हर महीने या निश्चित अंतराल पर पैसा भेज रही हैं—न कूपन, न वस्तु, न खर्च की शर्त; सीधा नकद। यही इस बदलाव की असली कहानी है। पीआरएस विधायी अनुसंधान के अनुसार, 2025-26 में 12 राज्यों ने महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर बिना शर्त या लगभग बिना शर्त नकद हस्तांतरण की योजनाएं लागू कीं, जिन पर करीब 1.68 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान था।
नकद सहायता की ताकत रकम में नहीं, उसे खर्च करने की स्वतंत्रता में है। इसे केवल ‘सरकारी पैसा बांटना’ कहना अधूरा है। महिला तय कर सकती है कि पैसा राशन, फीस, दवा, कर्ज या बचत में जाए। अध्ययनों में पश्चिम बंगाल की लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं में राशि का उपयोग घरेलू खर्च, शिक्षा, चिकित्सा और छोटे कारोबार में होने का उल्लेख है। मध्य प्रदेश में एसबीआई रिसर्च के अनुसार, लाड़ली बहना लाभार्थियों का व्यापारी प्रतिष्ठानों पर खर्च समान गैर-लाभार्थी समूह की तुलना में करीब 9,302 रुपये अधिक बढ़ा। यह हर रुपये के उत्पादक निवेश का प्रमाण नहीं, लेकिन कम आय वाले परिवारों में नकदी बढ़ने से आर्थिक गतिविधि बढ़ सकती है।
अतिरिक्त नकद का असर खर्च के साथ बचत में भी दिखता है। 2026 में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े अध्ययन ने महाराष्ट्र की लाड़की बहिन और ओडिशा की सुभद्रा योजना के बैंकिंग आंकड़ों का विश्लेषण किया। महाराष्ट्र में लाभार्थियों के महीने के अंत के बैंक बैलेंस में करीब 84 प्रतिशत यानी 6,884 रुपये की वृद्धि और मासिक खर्च में 46 प्रतिशत बढ़ोतरी पाई गई। ओडिशा में बैंक बैलेंस करीब 45 प्रतिशत यानी 6,887 रुपये बढ़ा, जबकि खर्च 28 प्रतिशत बढ़ा। अध्ययन के अनुसार, महाराष्ट्र में अतिरिक्त एक रुपये में करीब 90 पैसे खर्च हुए। यानी नकद सहायता तत्काल जरूरतें पूरी करने के साथ निम्न-आय परिवारों की आर्थिक कमी भरती और वित्तीय सुरक्षा देती है।
महिला के खाते में आया पैसा घर की अर्थव्यवस्था के साथ उसकी स्थिति भी बदल सकता है। भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा और बच्चों की जरूरतों पर खर्च की स्वतंत्रता बढ़े तो उसका असर अगली पीढ़ी तक जा सकता है। बैंक खाते और डीबीटी ने बिचौलियों की भूमिका घटाकर भुगतान को अधिक प्रत्यक्ष बनाया है। डिजिटल लेन-देन से वित्तीय समावेशन भी बढ़ सकता है। लेकिन खाते का मालिक होना और पैसे पर वास्तविक नियंत्रण होना एक बात नहीं है। बैंकिंग सुविधा दूर हो, डिजिटल साक्षरता कम हो या परिवार का कोई अन्य सदस्य खाते और मोबाइल पर नियंत्रण रखता हो, तो कागजी स्वायत्तता वास्तविक स्वायत्तता में नहीं बदलती। इसलिए नकद के साथ बैंकिंग सहायता, डिजिटल ज्ञान और वित्तीय साक्षरता जरूरी हैं।
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है, जिसे उत्साह में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पीआरएस के अनुसार, 2025-26 में इन 12 राज्यों में छह ने राजस्व घाटे का अनुमान लगाया था। रिपोर्ट ने रेखांकित किया कि नकद हस्तांतरण पर बढ़ता खर्च दूसरी उत्पादक मदों के लिए राज्यों की वित्तीय गुंजाइश प्रभावित कर सकता है। मध्य प्रदेश में 2025-26 के बजट अनुमान में नकद हस्तांतरण के लिए 20,821 करोड़ रुपये का प्रावधान था, जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद का करीब 1.23 प्रतिशत था। इसलिए सवाल यह नहीं कि महिला को आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए या नहीं; असली सवाल है कि इसकी कीमत क्या है और इसे लंबे समय तक वित्तीय रूप से कैसे टिकाया जाएगा।
नकद सहायता पर बड़ा सवाल निर्भरता और अवसर-लागत का है। राज्य की सीमित आय का बड़ा हिस्सा नियमित नकद भुगतान में जाए तो सड़क, सिंचाई, स्कूल, अस्पताल, कौशल और रोजगार जैसी दीर्घकालिक जरूरतों के लिए कम गुंजाइश बच सकती है। लेकिन नकद को केवल ‘मुफ्त की रकम’ कहना भी सरलीकरण होगा। नियमित आय गरीब परिवारों को कर्ज के दबाव से निपटने, जरूरी खर्च टालने से बचने और आर्थिक फैसले लेने में मदद कर सकती है। इसलिए सवाल ‘नकद या विकास’ का नहीं, बल्कि नकद सुरक्षा को रोजगार, कौशल और संपत्ति निर्माण से जोड़ने का है। लक्ष्यीकरण भी अहम है—ढीला हो तो संसाधन गलत जगह जा सकते हैं और कठोर हो तो जरूरतमंद महिलाएं बाहर रह सकती हैं।
आगे की राह ‘कैश’ नहीं, ‘कैश प्लस’ होनी चाहिए। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के 2026 के अध्ययन ने नकद हस्तांतरण को कौशल-विकास, डिजिटल साक्षरता और स्वयं सहायता समूहों से जोड़ने तथा लाभार्थियों और राशि की समय-समय पर समीक्षा की जरूरत बताई है। मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना जैसी योजना में नियमित सहायता के साथ सिलाई, पशुपालन, खाद्य-प्रसंस्करण, छोटे व्यापार, स्वयं सहायता समूह और बाजार से जुड़ने के अवसर मिलें, तो रकम उपभोग से आगे आय का साधन बन सकती है। यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि कितने लाभार्थी हैं, कितना पैसा पहुंचा, कितनी शिकायतें आईं और स्वतंत्र मूल्यांकन में क्या परिणाम मिले। लोकप्रिय योजना को जवाबदेह बनाना अगली परीक्षा है।
महिलाओं को नकद हस्तांतरण की ‘चुपचाप क्रांति’ विधानसभा से ज्यादा घर में दिखती है—जहाँ नारा भाषण नहीं, बैंक का संदेश है और परिणाम केवल खर्च नहीं, निर्णय लेने की क्षमता है। 12 राज्यों में करीब 1.68 लाख करोड़ रुपये का पैमाना बताता है कि यह अब सीमित कल्याण कार्यक्रम नहीं रहा। इसके लाभ हैं आर्थिक सुरक्षा, बचत, उपभोग, घरेलू सौदेबाजी और वित्तीय समावेशन; चुनौतियाँ हैं राजकोषीय दबाव, अवसर-लागत, लक्ष्यीकरण और निर्भरता। सही रास्ता न अंधा उत्साह है, न अस्वीकृति। असली कसौटी यह है कि आज खाते में आया पैसा कल महिला की बचत, कौशल, आय, संपत्ति और निर्णय-शक्ति में कितना बदले। तभी यह सरकारी सहायता से सामाजिक परिवर्तन की पूंजी बनेगा।
— कृति आरके जैन
