कहानी

कभी कभी 

रात बहुत गहरी हो चुकी थी।घर की सारी बत्तियाँ बुझ चुकी थीं। बाहर सड़क पर कभी-कभार किसी गाड़ी के गुजरने की आवाज आती और फिर वही सन्नाटा फैल जाता।विमल खिड़की के पास बैठा था।उसकी पत्नी मीरा कई बार उसे आवाज दे चुकी थी, लेकिन आज विमल जैसे किसी दूसरी ही दुनिया में था।उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन वह सामने कुछ देख नहीं रहा था।मीरा आखिर उठकर उसके पास आ गई।“क्या हुआ है तुम्हें?”विमल ने कोई उत्तर नहीं दिया।

“जब से माँ जी से फ़ोन पर प्रीति की खबर मिली है, तुम बिल्कुल बदल गए हो। समझ सकती हूं तुम्हारी पड़ोसन थी हम उम्र थी तुम उसे जानते अच्छे से जानते थे लेकिन ऐसा क्या था कि उसके जाने की खबर ने तुम्हें इस तरह तोड़ दिया?” तुम सदमे से बाहर ही नहीं आ रहे हो। विमल ने बुदबुदाते हुए कहा प्रीति बच सकती थी और धीरे से आँखें बंद कर लीं।कुछ क्षण बाद बोला—“मैंने तुम्हें कभी पूरी बात नहीं बताई।”मीरा उसके सामने बैठ गई।“कौन-सी बात?”विमल ने बहुत धीमी आवाज में कहा—“प्रीति और राज की।”मीरा चुप हो गई।“राज कौन?”“मेरा बहुत पुराना दोस्त।”विमल ने खिड़की के बाहर देखा।“वह लड़की… जिसे मैंने राज से मिलवाया था।”मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।“फिर?”विमल की आँखें भर आईं।“फिर कुछ ऐसा हुआ, जिसे शायद उस समय हम तीनों में से कोई नहीं समझ पाया।”विमल कुछ देर चुप रहा।फिर बोला—“आज तुम्हें पूरी कहानी सुनाता हूँ।”“बहुत साल पहले की बात है।राज तब चौबीस-पच्चीस साल का था।मैं उसे कॉलेज के दिनों से जानता था। बहुत शांत लड़का था। जरूरत से ज्यादा गंभीर।उस समय उसके घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। खेती ही परिवार का मुख्य सहारा थी।तुम जानती हो न गाँव के उन परिवारों को, जहाँ जमीन तो होती है, लेकिन इतनी नहीं कि सबके सपने पूरे हो सकें?राज के घर में भी कुछ ऐसा ही था।

घर का हर सदस्य खेती में लगा रहता था, लेकिन सबकी निगाहें राज पर थीं। पूरे परिवार को लगता था कि राज जिसे वो लोग बाबू कहते थे पढ़-लिखकर कुछ बनेगा और घर की हालात बदलेगा।राज भी शायद इसी उम्मीद के बोझ के नीचे पढ़ रहा था।वह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था। सु बह से रात तक किताबें। कभी लाइब्रेरी।कभी दोस्तों से नोट्स।कभी पैसे की चिंता |कभी भविष्य की। उसे इतना गुमसुम देख मैं कभी कभी उसे घर बुला लेता था। थोड़ा खाना पीना अच्छे खा लेता थोड़ा मूड बदल जाता था उसका। और उस दिन भी ऐसा ही कुछ था । राज बैठा था और प्रीति घर आई थी कुछ प्रसाद लेकर और ने उसे हम दोनों को खाना परोसने का काम सौंप दिया था वहीं हमने उसे राज से मिलवाया था। 

प्रीति उस समय बीस-बाईस साल की रही होगी। बी ए फाइनल का एग्जाम दे चुकी थी। बहुत साधारण लड़की थी। न कोई दिखावा। न बनावटीपन। बात करती थी तो आँखों में सीधापन होता था।उस दिन मैंने दोनों का परिचय कराया।‘ये राज है।’ ‘और ये प्रीति।’बस।कुछ देर दोनों बैठे।मैं भी था।हमने इधर-उधर की बातें कीं।पढ़ाई की।नौकरी की।घर की।फिर हम अलग हो गए।बस इतनी-सी मुलाकात थी।”मीरा ने पूछा—“तो इसमें ऐसा क्या था जिसे तुम आज तक याद किए बैठे हो?”विमल हल्का-सा मुस्कुराया।“उस समय मुझे भी नहीं पता था।”  “उस मुलाकात के बाद जिंदगी अपने रास्ते चलती रही।प्रीति के पिता को जल्दी ही एहसास हो गया था कि बेटी बड़ी हो गई है।रिश्ते आने लगे।वह भी अपने भविष्य के बारे में सोच रही थी।और राज?

वह तो अपने भविष्य के लिए लड़ रहा था।उसकी चाल धीमी थी…लेकिन उसकी आँखों में बहुत दूर तक देखने वाले सपने थे।प्रीति की चाल इसके बिल्कुल उलट थी।वह जैसे खरगोश की तरह तेजी से जिंदगी के अगले पड़ाव की तरफ भाग रही थी।दोनों की जिंदगी अलग-अलग रास्तों पर चल रही थी।फिर भी पता नहीं क्यों, राज कभी-कभी मुझसे प्रीति के बारे में पूछ लेता।बहुत सामान्य ढंग से।‘विमल, प्रीति कैसी है?’‘कहाँ है?’ एक बार मैने राज को बताया था कि प्रीति के पिता उसकी शादी जल्द से जल्द करवाना चाहते हैं लेकिन जाने क्यूं प्रीति टाल रही है।अगली मुलाकात में राज ने फिर पूछा प्रीति के क्या समाचार हैं ‘उसकी शादी हुई क्या?’मैं समझता था—बस यूँ ही पूछ रहा ह।एक दिन मैंने मजाक में उससे कहा भी—‘कहीं तू उसे पसंद तो नहीं करता?’राज हँस दिया।बहुत सहजता से बोला—‘पागल है क्या?’मैं भी हँस पड़ा।और वहीं बात खत्म हो गई।

लेकिन शायद…वह बात वहीं खत्म नहीं हुई थी।बस हमने उसे नाम नहीं दिया था।”मीरा धीरे से बोली—“क्या प्रीति भी राज को पसंद करती थी?”विमल ने लंबी साँस ली।“आज लगता है… शायद।”

“समय बीतता गया।राज ने बहुत मेहनत की।और आखिर वह दिन आया जब वह सिविल सर्विस में चयनित हो कर अधिकारी बन गया। जिस परिवार की उम्मीदें उसके कंधों पर थीं, उस दिन उन उम्मीदों को जैसे मंजिल मिल गई।मैं बहुत खुश था। हम सब खुश थे।किंतु उस समय राज ने प्रीति की कोई बात नहीं की।और उसी समय राज ने अपने जीवन का दूसरा बड़ा फैसला लिया।उसने अपनी एक सहकर्मी से विवाह कर लिया। जो कि उसकी ही बैचमेट थी वह भी राज की तरह ही अधिकारी थी।पढ़ी-लिखी। समझदार। अच्छे परिवार की।

कुछ दिन बाद मैं घर पर था दोपहर का समय था मैं मां को राज की शादी के बारे में बता रहा था न जाने कब से दरवाजे के पास खड़ी प्रीति ने सब सुन लिया था।

और दो दिन बाद माँ ने मुझे लड्डू खिलाकर बोला प्रीति का रोका हो गया। बड़ी बावरी निकली प्रीति पहले तो शादी के लिए मानती ही न थी और कल अपनी माँ से बोली मैं तैयार हूं शादी के लिए और चटपट मंगनी हो गई। लड़के वाले तो कब से तैयार ही बैठे थे। मैं कुछ समझ कर भी समझ नहीं पाया।और इधर राज को लगा कि उसने जिंदगी का सबसे सही फैसला कर लिया है।उसने अपने दिमाग से फैसला किया था।शायद दिल को उसने उस समय कोई मौका ही नहीं दिया।विवाह के बाद उसका जीवन बाहर से बहुत अच्छा था।नौकरी।सम्मान।घर।सुविधाएँ।परिवार।

लेकिन धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि उसके भीतर कुछ खाली है।”“कैसे?”मीरा ने पूछा।

“एक दिन उसने मुझे फोन किया।बहुत छोटी-सी बात थी।उसके ऑफिस में उसे एक बड़ी उपलब्धि मिली थी।मैंने बधाई दी।वह कुछ देर चुप रहा।फिर अचानक बोला—‘विमल… अगर प्रीति को पता चले तो उसे अच्छा लगेगा न?’मैं हँस पड़ा।‘क्यों? अब भी याद है?’वह भी हँसा।लेकिन उसकी हँसी में कुछ था।आज सोचता हूँ तो समझ आता है।उस दिन मुझे उससे पूछना चाहिए था—‘राज, सच बता… तू अब भी प्रीति से प्यार करता है?’लेकिन मैंने नहीं पूछा।यही बात आज तक मुझे अंदर से खाती है।”“राज ने कभी प्रीति से प्रेम का इजहार नहीं किया।शायद उसे खुद भी बहुत देर तक समझ नहीं आया कि वह उसके लिए क्या महसूस करता है।

लेकिन उसकी अनुपस्थिति धीरे-धीरे उसकी जिंदगी में एक स्थायी उपस्थिति बन गई।जब वह खुश होता—प्रीति याद आती।जब दुखी होता—प्रीति याद आती।किसी बात पर उसे बहुत अच्छा लगता—मन करता, प्रीति को बताए।किसी दिन अकेलापन लगता—उसका चेहरा सामने आ जाता।एक दिन उसने मुझसे कहा—‘विमल, मेरे पास सब कुछ है… फिर भी मुझे लगता है कि कुछ नहीं है।’मैंने कहा—‘क्या कमी है?’वह बोला—पता नहीं।’

मीरा, उस दिन मैं समझ गया था।लेकिन मैंने फिर भी उससे बात नहीं की।मैं डर गया था।मुझे लगा—अब उसका विवाह हो चुका है।मैं क्यों उसकी पुरानी बातों को कुरेदूँ?शायद यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी।और नियति का चक्र देखो मेरी ही शादी में दोनों की मुलाकात हो गई।मैं भी वहाँ था।दोनों ने एक-दूसरे को देखा।बहुत सामान्य-सी मुस्कान।‘कैसी हो?’‘ठीक हूँ।’‘बच्चे कैसे हैं?’‘अच्छे हैं।’‘आप?’‘ठीक हूँ।’बस।इतना ही।लेकिन मीरा…मैंने उनकी आँखें देखी थीं।उन आँखों में वह सब था, जो उनके शब्दों में नहीं था।उस दिन मुझे लगा—अब तो मुझे राज से बात करनी ही चाहिए।लेकिन मैं फिर चुप रह गया।मैंने सोचा—क्या फायदा?दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं।कुछ रिश्ते शायद सिर्फ यादों में ही अच्छे लगते हैं।

लेकिन मुझे नहीं पता था कि यह चुप्पी एक दिन इतनी महंगी पड़ेगी।”“एक दिन राज ने मुझे फोन किया।उसकी आवाज बहुत भारी थी।उसने कहा—‘विमल, मैंने जिंदगी में एक बहुत बड़ी गलती की है।’मैंने पूछा—‘क्या?’वह बोला—‘मैंने कभी प्रीति से पूछा ही नहीं कि वह क्या चाहती थी।’मैं चुप रहा।उसने कहा—‘अगर उसने मना कर दिया होता तो मैं स्वीकार कर लेता।’

‘लेकिन मैंने पूछा ही नहीं।’‘मैंने फैसला खुद कर लिया।’फिर वह कुछ देर चुप रहा।और बोला—‘शायद मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी चाल अपने दिमाग से चली… जबकि उस वक्त मुझे दिल से चलना चाहिए था।’मीरा, मैं उसके दर्द को सुन रहा था।लेकिन उसके बाद भी मैंने उसे सिर्फ इतना कहा—‘जो हो गया उसे भूल जा।’आज सोचता हूँ…कितना आसान था मेरे लिए यह कहना।जिसके पास कोई अधूरा सवाल नहीं था, वह दूसरे के अधूरे सवाल को क्या समझता?”

“फिर एक दिन माँ से पता चला कि प्रीति बहुत बीमार है। और मायके आई हुई है। जाने क्यूं मैने राज को फोन कर के बता दिया। मैने क्यों बताया मुझे नहीं मालूम। राज बेचैन हो गया।

वह उससे मिलना चाहता था।लेकिन नहीं गया।उसने मुझसे पूछा—‘क्या मुझे जाना चाहिए?’मैंने उससे उल्टा सवाल ही पूछ लिया कहा—  ‘तुम्हारा जाना ठीक होगा?’ बस।इतना-सा सवाल था।और राज चुप हो गया।आज सोचता हूँ—मुझे कहना चाहिए था—‘जाओ।’बस इतना।जाओ।एक पुराने परिचित की तरह जाओ।एक इंसान की तरह जाओ।उससे मिलो।उससे बात करो।लेकिन मैंने उसके भीतर के डर को और मजबूत कर दिया।राज नहीं गया।”मीरा की आँखें भर आई थीं।“फिर?”विमल ने आँखें पोंछीं।

“प्रीति ठीक हो गई थी। सिर्फ ऊपरी तौर पर। शायद वह राज के बिना अधूरी थी। लेकिन उसके पास इस अधूरेपन को जीने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। लड़की थी। कैसे अपने से अपने प्रेम का इजहार करती। वो भी उस लड़के से जो कि इतना सफल हो गया था। उसे लगता रहा होगा राज कुछ बन कर उसका हाथ मांग लेगा लेकिन राज ने तो सीधा शादी ही कर ली और एक अधिकारी पत्नी ले आया।

मीरा अब मुझे समझ आता है कि क्यों प्रीति शादी से पहले इनकार कर रही थी और बाद में राज की शादी का पता चलने के बाद खुद ही शादी के लिए हां कर दिया था।

मीरा मुझे लगता है मुझे राज को प्रीति की शादी टालने वाली बात और बाद में उसके शादी के लिए मान लेने वाली बात से सीधा प्रीति का मन समझ कर राज को बताना चाहिए था। लेकिन मैने भी कुछ नहीं किया। मीरा मैं खुद को भी दोषी मानता हूं उन बातों के लिए।

लेकिन उस बीमारी ने शायद राज को भीतर से हिला दिया था।उसने मुझसे कहा—‘विमल, जिंदगी बहुत छोटी है।’और मैंने फिर भी उसकी बात को पूरी तरह नहीं समझा ।

कुछ साल बाद अपने गोलू के मुंडन में राज और प्रीति की फिर मुलाकात हुई।इस बार राज ने हिम्मत की।उसने प्रीति से कहा—‘मुझे तुमसे कुछ कहना है।’प्रीति मुस्कुराई।‘कहो।’राज की आवाज काँप रही थी।‘मैंने तुम्हें बहुत देर से पहचाना।’प्रीति चुप रही।राज बोला—‘मुझे नहीं पता तुमने कभी मुझे चाहा था या नहीं। लेकिन मैं… मैं तुम्हें शायद बहुत पहले से चाहता था।’प्रीति की आँखों में आँसू आ गए।उसने बहुत देर बाद कहा—‘कुछ बातें कहने में देर हो जाए तो उनका अर्थ बदल जाता है।’राज ने पूछा—‘अगर मैं उस समय कह देता तो?’प्रीति ने मुस्कुराकर कहा—‘शायद कहानी अलग होती।’बस।इतना ही।राज ने पूछा नहीं—‘तुम मुझे चाहती थीं?’और प्रीति ने बताया नहीं।दोनों के बीच वह प्रश्न हमेशा के लिए अधूरा रह गया।”मीरा धीरे से बोली—“तो क्या प्रीति भी उससे प्यार करती थी?”विमल ने सिर झुका लिया।“मैं आज निश्चित होकर कह सकता हूं कि हां बहुत ज्यादा प्यार करती थी “”लेकिन… लेकिन क्या?”“एक बार मैंने प्रीति से पूछा था।”वह बात जो विमल ने राज को कभी नहीं बताई“बहुत साल पहले की बात है।राज के जाने के बाद प्रीति कुछ देर तक दरवाजे की तरफ देखती रही थी।मैंने मजाक में पूछा—‘क्या हुआ?’वह मुस्कुराई थी।फिर बोली—‘कुछ नहीं।’मैंने कहा—‘कुछ तो है।’वह कुछ देर चुप रही।फिर बहुत धीमे से बोली—‘कुछ लोग अच्छे लगते हैं, लेकिन उन्हें बताया नहीं जाता।’मीरा…उस दिन मुझे सब समझ जाना चाहिए था।लेकिन मैंने उसे भी मजाक में टाल दिया।मैंने कभी राज को यह बात नहीं बताई।कभी नहीं।और आज…प्रीति चली गई है।”विमल की आवाज टूट गई।मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।“प्रीति के जाने की खबर जिस दिन आई, मैं अंदर से हिल गया।मुझे लगा जैसे मैंने सिर्फ एक दोस्त नहीं खोया…मैंने अपनी जिंदगी की एक अधूरी कहानी का आखिरी पन्ना भी खो दिया।मैं राज को फोन करना चाहता था।लेकिन फोन करने से डर रहा था।फिर मैंने किया।

बहुत देर तक दोनों चुप रहे।फिर मैंने कहा—‘राज… मुझे माफ कर देना।’उसने पूछा—‘किस बात के लिए?’मैंने कहा—‘मैंने तुम्हें और प्रीति को मिलवाया था।’वह चुप रहा।फिर बोला—‘विमल, तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।’मैंने कहा—‘गलती थी।’‘मुझे तुमसे पूछना चाहिए था।’‘मुझे प्रीति से पूछना चाहिए था।’‘मुझे तुम दोनों की चुप्पी समझनी चाहिए थी।’राज बहुत देर तक कुछ नहीं बोला।फिर उसने कहा—‘विमल, अगर तुम मुझे प्रीति से नहीं मिलवाते तो शायद मैं उसे कभी जान ही नहीं पाता।’मैं रो पड़ा।फिर मैंने उससे कहा—‘लेकिन तुम उसे पा भी नहीं सके।’वह बोला—‘शायद कुछ लोग पाने के लिए नहीं मिलते।’और फिर बहुत देर तक फोन पर सिर्फ उसकी साँसों की आवाज आती रही।”

मीरा ने धीरे से पूछा—“लेकिन विमल, तुम्हारा अपराधबोध क्यों?”विमल ने उसकी ओर देखा।“क्योंकि मैं उन दोनों के बीच का तीसरा आदमी था।”“मैंने पहली मुलाकात देखी थी।”“मैंने राज की आँखों में प्रेम देखा था।”“मैंने प्रीति की चुप्पी सुनी थी।”“मैंने दोनों की जिंदगी बदलते देखी।”“और फिर भी…”उसकी आवाज भर्रा गई।“मैंने किसी को समय रहते सच बोलने के लिए नहीं कहा।”

मीरा ने कहा—“लेकिन तुम उनके फैसले कैसे बदल सकते थे?”विमल कुछ देर चुप रहा।“शायद नहीं बदल सकता था।”“लेकिन कम से कम…”उसने खिड़की से बाहर देखा।“कम से कम मैं उन्हें यह तो बता सकता था कि जो बात वे अपने भीतर दबा रहे हैं, उसे एक बार शब्द दे दें।”उस रात विमल ने अपनी पत्नी से एक बात और कही।“मीरा, मुझे लगता है राज आज भी खुद को माफ नहीं कर पाया है।”“क्यों?  “क्योंकि उसे लगता है कि उसने प्रीति को नहीं खोया।”“उसने उसे चुना ही नहीं था।”“और यही तो उसका दुख है।”विमल की आँखों में आँसू थे।

“किसी को खो देना उतना दुखद नहीं होता जितना यह जानना कि उसे पाने का अवसर तुम्हारे पास था… और तुमने उस अवसर को पहचानने में देर कर दी।”मीरा चुप थी।विमल ने कहा—“और मैं भी शायद जिंदगी भर यही सोचता रहूँगा।”“क्या?”“अगर उस दिन मैं राज से कह देता—‘जा, प्रीति से पूछ ले।’अगर मैं प्रीति से कह देता—‘राज तुम्हें चाहता है।’अगर मैंने दोनों की चुप्पी को चुप्पी ही न रहने दिया होता…तो क्या उनकी कहानी अलग होती?”मीरा के पास कोई उत्तर नहीं था।वह सिर्फ उसके पास आकर बैठ गई।उस रात विमल ने अपनी पुरानी डायरी निकाली।

उसके एक पन्ने पर वर्षों पहले उसने तीन नाम लिखे थे—राज। प्रीति।विमल।

तीनों नामों के नीचे उसने एक वाक्य लिखा—

“कुछ मुलाकातें जिंदगी बदल देती हैं, लेकिन जिंदगी उन्हें बदलने का मौका नहीं देती।”

उसने कलम उठाई।नीचे एक और पंक्ति लिखी—“मैं उस अधूरी कहानी का गवाह था।”कुछ देर बाद उसने पेन रख दिया।आँखें बंद कर लीं।और उसे लगा जैसे बहुत दूर से किसी की हँसी सुनाई दे रही हो।शायद प्रीति की।शायद उसकी अपनी स्मृति की।शायद उस जिंदगी की…जो कभी हो सकती थी।राज के पास प्रीति की याद थी।प्रीति अपने साथ राज का अनकहा प्रेम लेकर चली गई थी।और विमल के पास दोनों की कहानी थी।एक ऐसी कहानी जिसमें किसी ने किसी को धोखा नहीं दिया था।किसी ने जानबूझकर किसी का दिल नहीं तोड़ा था।किसी ने प्रेम से इनकार भी नहीं किया था।फिर भी…तीनों हार गए थे।राज इसलिए कि उसने अपने दिल की बात बहुत देर से समझी।प्रीति इसलिए कि उसने अपने मन की बात कभी कही ही नहीं।और विमल इसलिए कि उसने वह सब देखा…फिर भी समय रहते किसी को बोलने के लिए नहीं कहा।शायद प्रेम की सबसे बड़ी त्रासदी यही है—कभी-कभी प्रेम करने वाले दो लोग नहीं हारते,

उनके बीच की चुप्पी जीत जाती है।और कुछ कहानियाँ इसलिए अधूरी नहीं रह जातीं कि प्रेम कम था…बल्कि इसलिए कि समय पर एक शब्द कम पड़ गया।राज और प्रीति की कहानी भी ऐसी ही थी।एक मुलाकात से शुरू हुई।एक उम्र तक चली।बिना नाम के रही।बिना अधिकार के रही।बिना किसी वादे के रही।और अंत में…मृत्यु ने उसका आखिरी अध्याय लिख दिया।लेकिन कहानी फिर भी खत्म नहीं हुई।क्योंकि राज के भीतर प्रीति जीवित रही।और विमल की स्मृति में…उन दोनों का वह अधूरा प्रेम हमेशा के लिए मुकम्मल हो गय

— प्रज्ञा पाण्डेय मनु 

*प्रज्ञा पाण्डेय 'मनु'

वापी़, गुजरात

Leave a Reply