कविता

कुदरत के नज़ारे

देखो, लगते बड़े निराले,
बादल छाए काले-काले।
बादल घिरे, अंधेरी छाई,
चारों ओर रात घिर आई।।

निकले नील गगन के घर से,
टप-टप करके बादल बरसे।
रिमझिम-रिमझिम बरखा लाए,
गर्मी सारी दूर भगाए।।

हर्षित देखा जब नील गगन,
बच्चे सारे तब हुए मगन।
छू-मंतर हुई गरमी सारी,
मारें सब मिलकर किलकारी।।

बनी सब गलियां ताल-तलैया,
नाचे मिलकर ता-ता-थैया।
पानी बरसा इतना खासा,
लगता जैसे हो चौमासा।।

देखा तब अजीब तमाशा,
इंद्रधनुष ने रूप तराशा।
कुदरत के ये अजब नजारे,
लगते सबको प्यारे-प्यारे।।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

Leave a Reply