सामाजिक

सड़क चौड़ी हो रही थी, मगर अफवाह ने खाई चौड़ी कर दी

कभी अफवाह पैदल चलती थी, इसलिए उसे फैलने में वक्त लगता था। अब उसके पास एआई का इंजन है—वह उड़ती है और हजारों दिमागों में पल भर में घर बना लेती है। मध्यप्रदेश के उज्जैन की शाही मस्जिद के बाहर भड़की हिंसा ने इस नए खतरे का भयावह चेहरा दिखाया। मामला सड़क चौड़ीकरण के लिए मस्जिद के केवल प्रभावित हिस्से को हटाने का था, लेकिन सोशल मीडिया पर एआई-निर्मित (या एडिटेड) वीडियो फैलाए गए, जिनमें पूरी मस्जिद को ढहता दिखाया गया। पुलिस के अनुसार, इन फर्जी दृश्यों ने अफवाह को भड़काया और भीड़ जुटाने में भूमिका निभाई। पत्थर चले, आंसू गैस छोड़ी गई और मंदिर, मस्जिद, घाट व सह-अस्तित्व की पहचान रखने वाला उज्जैन कुछ घंटों के लिए अविश्वास की आग में घिर गया।

यह कहानी केवल एक मस्जिद या सड़क की नहीं, उस बदलती दुनिया की है जहां आंखों देखा भी अब सत्य की गारंटी नहीं। सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण हो रहा है। शाही मस्जिद के सड़क की जद में आए हिस्से को हटाने की प्रक्रिया पर कानूनी विवाद हुआ और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने संबंधित याचिकाओं पर प्रशासन के पक्ष में रास्ता साफ किया। रिपोर्टों के अनुसार, इसी मार्ग पर अन्य धार्मिक संरचनाओं के हिस्सों पर कार्रवाई का उल्लेख भी अदालत के सामने हुआ। लेकिन कानून, आदेश और वास्तविक कार्रवाई के बीच सोशल मीडिया ने ऐसा दृश्य परोस दिया, जिसने तथ्य को पीछे और उत्तेजना को आगे कर दिया।

यही एआई युग का नया संकट है—झूठ अब सिर्फ लिखा नहीं जाता, फिल्माया भी जाता है। नकली दृश्य में धूल उड़ती है, दीवार गिरती है, मलबा बिखरता है और कैमरा ऐसे चलता है, मानो प्रत्यक्षदर्शी ने घटना रिकॉर्ड की हो। देखने वाले के पास उसे सच मानने का पर्याप्त दृश्य-प्रमाण होता है, पर जांच का धैर्य नहीं। उज्जैन में भी कथित तौर पर ऐसे वीडियो प्रसारित हुए, जिनमें पूरी शाही मस्जिद ढहती दिखाई गई, जबकि वास्तविक विवाद उसके केवल एक हिस्से को हटाने का था। पुलिस ने भ्रामक सामग्री के प्रसार की जांच शुरू की है। यही वह क्षण है, जब तकनीक सूचना का माध्यम नहीं, धारणा की निर्माता बन जाती है।

हमारी सबसे बड़ी कमजोरी तकनीक नहीं, जल्दबाजी है। पहले अफवाह कई लोगों से गुजरती थी; अब एक फॉरवर्ड से घर पहुंच जाती है। पहले खबर पर सवाल करने का समय मिलता था; अब वायरल होने की रफ्तार सवाल करने की क्षमता से तेज है। धार्मिक स्थल के फर्जी विध्वंस का दृश्य केवल इमारत को काल्पनिक रूप से नहीं गिराता, वह लोगों की स्मृतियों, आस्थाओं और आशंकाओं को एक साथ झकझोरता है। यहीं सूचना भावना और भावना भीड़ में बदल सकती है। उज्जैन की घटना चेताती है कि सांप्रदायिक तनाव की चिंगारी अब वास्तविक घटना से ही नहीं, उसकी कृत्रिम तस्वीर से भी भड़क सकती है।

विकास और आस्था को आमने-सामने खड़ा करना सबसे आसान, पर सबसे गलत रास्ता है। शहरों को भविष्य की जरूरतों के मुताबिक बदलना पड़ता है, तो धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों के प्रति संवेदनशीलता भी जरूरी है। उज्जैन सिंहस्थ जैसे विराट आयोजन की तैयारी कर रहा है; सड़क, यातायात और सुरक्षा की जरूरतें वास्तविक हैं, तो धार्मिक स्थलों से जुड़ी भावनाएं भी। ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया, प्रशासनिक पारदर्शिता, समुदायों से संवाद और तथ्यपरक सूचना—चारों साथ चलें, तभी विकास विवाद बनने से बचेगा। उज्जैन का अनुभव बताता है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी करना ही पर्याप्त नहीं; उसकी सही जानकारी समाज तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।

डिजिटल युग में साक्षरता का अर्थ अब केवल मोबाइल चलाना नहीं, सूचना को परखना और सही-गलत में फर्क करना है। बच्चों को सिर्फ लिंक खोलना नहीं, उस पर भरोसा करने से पहले सवाल करना भी सिखाना होगा। परिवारों में संवेदनशील वीडियो को तुरंत साझा करने के बजाय उसके स्रोत, तारीख, स्थान और संदर्भ की जांच करने की आदत बने। समाज में स्थानीय प्रशासन और विश्वसनीय समाचार माध्यमों से पुष्टि को प्राथमिकता मिले। सोशल मीडिया मंचों की जिम्मेदारी भी केवल भ्रामक सामग्री हटाने तक सीमित नहीं रह सकती। पुलिस के अनुसार उज्जैन में भ्रामक पोस्ट और सोशल मीडिया खातों की जांच की जा रही है। कानून दोषियों पर कार्रवाई कर सकता है, लेकिन हर नागरिक के हाथ में मौजूद ‘शेयर’ बटन को रोकने का विवेक केवल नागरिक ही विकसित कर सकता है।

एआई की असली परीक्षा उसकी शक्ति में नहीं, हमारी विवेक-शक्ति में है। तकनीक हमें असाधारण गति दे सकती है, मगर दिशा नहीं; दृश्य रच सकती है, सत्य नहीं; भीड़ जुटा सकती है, समाज नहीं। उज्जैन में एक कृत्रिम दृश्य ने वास्तविक तनाव पैदा किया—यह हमारे समय का विचित्र विरोधाभास है कि आभासी दुनिया का झूठ वास्तविक दुनिया में पत्थर बनकर लौट सकता है। यदि हम हर चमकती स्क्रीन को प्रमाण मान लेंगे, तो सत्य पीछे छूटता जाएगा और झूठ आगे दौड़ेगा। तब हमारी प्रसिद्धि वायरल होने की होड़ में, पहचान त्वरित प्रतिक्रिया में और गौरव क्षणिक उत्तेजना में बदल जाएगा। यही वह मोड़ है जहां तकनीक की प्रगति और मनुष्य के विवेक की परीक्षा एक साथ शुरू होती है।

जब झूठ सेकंडों में तस्वीर बन जाए, तब सच की सबसे बड़ी ढाल विवेक ही है। उज्जैन की घटना का सबक तकनीक से डरना नहीं, उसके साथ विवेक विकसित करना है। मस्जिद हो या मंदिर, आस्था हो या विकास, विवाद हो या प्रशासनिक निर्णय—हर संवेदनशील विषय में पहला कर्तव्य प्रतिक्रिया नहीं, सत्यापन होना चाहिए। समाज की असली ताकत तेज इंटरनेट या शक्तिशाली एआई में नहीं, बल्कि इस बात में है कि झूठ हमारे बीच पहुंचने पर हम कितनी देर तक विवेक और इंसानियत कायम रखते हैं। एआई की तस्वीर सेकंडों में बन सकती है, मगर सद्भाव बनाने में पीढ़ियां लगती हैं। यही उज्जैन की सबसे बड़ी सीख है—तकनीक की रफ्तार से विवेक पीछे छूटा, तो भविष्य डिजिटल जरूर होगा, मानवीय नहीं।

— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

प्रो. आरके जैन 'अरिजीत'

बड़वानी (मप्र)

Leave a Reply