हरश्रृंगार धरा पर बिखर गई
काश! कहीं कोई ऐसा हो,
जो बनकर आधार सँभाले,
थककर जब यह जीवन बिखरे,
मौन स्नेह से गले लगा ले।
रजनी भर महकी पारिजात ,
सुरभि-सुधा जग में बिखराई,
भोर हुई, थक टूटी कलिका,
सुध लेने स्वर्णिम भोर आई।
धरणी सम मिले पावन आश्रय,
तो जीवन को विश्राम मिले,
साँसों की इस सुरभित महक को,
धरा-धाम-सी छाँव मिले।
शाखा से छूटना अंत नहीं है,
समर्पण का यह रूप नया,
झरना पारिजात का सार्थक,
अवनी से लिपटी उसकी हया।
विश्वास दृढ़ है हरश्रृंगार का
धरा तो अंक लगाएगी
पारिजात की पावन महक को,
हर हृद तक पहुंचाएगी ।
हरश्रृंगार धरा पर बिखर गई।
लिपट अवनी से निखर गई।
— सविता सिंह ‘मीरा’
