गीतिका
नई नई तरकीब निकाले सत्ता का नाकाम मदारी।
सभी बंदरिया घुड़क रही हैं, कुछ तो हुआ घोटाला है।।
हरेक पैंतरे फेल हो रहे, सभी डुगडुगी हार गई।
बाजीगर लाचार लगे हैं, बासी हुआ मसाला है।।
मजमा सारा बिखर रहा है, धुन बीनो की रिरियाती।
पीटारी के सांप डस रहे, सभी दाल में काला है।।
कुनबे की इज्जत मुंह बाए, शायद कोई करिश्मा हो।
अबके फटी ढोल ना बाजे, हर उंगली में छाला है।।
चाहे जितना जोर लगा लें, सत्ता के धनपाल सुनें।
अबके पत्ते मौन रहेगे, हर जुबान पे ताला है।।
अब भालू कैसे नाचेगा, उसने पुस्तक पढ़ ली है।
धंधा और नहीं चलने का, जूठा मनका माला है।।
— सतीश चन्द्र श्रीवास्तव
