एक और आत्महत्या
एक युवती आत्महत्या के लिए
पुल से कूदना चाहती है
अंत करना चाहती है
खौफनाक दृश्य
कोई नहीं रोकना चाहता है
बेचारी को
घर के ताने सुन-सुनकर
सह ले रही थी
जब तक पति से उम्मीद थी
सब सह रही थी
जब एक दिन
पति से उम्मीद खत्म हो गयी
उसने भी तरह-तरह का लांछन लगाया
अब वह मायके भी नहीं जाना चाहती है
उनका भी बोझ नहीं बनना चाहती है
रात के अंधेरे में
अपनी मौत की गठरी लेकर
नदी में कूद गयी
कुछ ने रोका
रोकने वाले रोक रहे थे
कोई उसके घरवालों को
नहीं रोक रहा था
रुक भी जायेगी तो
कौन उसके बोझ को
कंधे का सहारा देगा
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
