कसाई रहम करो भाई
सत्ता के जो गलियारे हैं,वहां संवेदना सोती है,
कुर्सी के भूखे हाकिम को,कब जनता की पीड़ा होती है?
तुम न्याय मांगने जाते हो,उस व्यवस्था के दरबारों में,
जहां हर एक फाइल बिकती है,रिश्वतों के बाजारों में,
नेताओं के वादों में बस,छलावा और मक्कारी है,
अधिकारियों की कलम यहां,आम आदमी पर भारी है,
तुम ढूंढ रहे हो दया वहां,जहां सिर्फ स्वार्थ का साया है,
ये गिद्धों की एक महफ़िल है,जिसने तंत्र को भरमाया है,
जो खुद लहू पीते हैं,वो कब मरहम लगाने आएंगे?
तुम चीखोगे,चिल्लाओगे,वो अपनी जेबें भर जाएंगे,
पहचानो इस खूंखार तंत्र को,मत झूठी उम्मीद पलो,
कसाई से मत रहम मांगो,अपनी ताकत बनकर बदलो,
सीने में इंक़लाब जगाओ,ये याचना का वक़्त नहीं,
ये बहरे कानों की बस्ती है,यहां पिघलता कोई पत्थर नहीं,
जब तक तुम हाथ जोड़ोगे,ये और तुम्हें सताएंगे,
जब हक़ के लिए उठ खड़े होगे,ये कुर्सी छोड़ भाग जाएंगे,
सत्ता के जो गलियारे हैं,वहां संवेदना सोती है,
कुर्सी के भूखे हाकिम को,कब जनता की पीड़ा होती है?
तुम न्याय मांगने जाते हो,उस व्यवस्था के दरबारों में,
जहां हर एक फाइल बिकती है,रिश्वतों के बाजारों में,
नेताओं के वादों में बस,छलावा और मक्कारी है,
अधिकारियों की कलम यहां,आम आदमी पर भारी है,
ढूंढ रहे हो दया वहां,जहां सिर्फ स्वार्थ का साया है,
ये गिद्धों की एक महफ़िल है,जिसने तंत्र को भरमाया है,
जो खुद लहू पीते हैं,वो कब मरहम लगाने आएंगे?
तुम चीखोगे,चिल्लाओगे,वो अपनी जेबें भर जाएंगे,
पहचानो इस खूंखार तंत्र को,मत झूठी उम्मीद पलो,
कसाई से मत रहम मांगो,अपनी ताकत बनकर बदलो,
सीने में इंक़लाब जगाओ,ये याचना का वक़्त नहीं,
ये बहरे कानों की बस्ती है,यहां पिघलता कोई पत्थर नहीं,
जब तक तुम हाथ जोड़ोगे,ये और तुम्हें सताएंगे,
जब हक़ के लिए उठ खड़े होगे,तो ये कुर्सी छोड़ भाग जाएंगे।
— राजेन्द्र लाहिरी
