माँ शैलपुत्री : शक्ति-साधना की प्रथम ज्योति
नवरात्रि के प्रथम दिवस पूजी जातीं माँ शैलपुत्री,
पर्वतराज हिमालय की पुत्री, जग की पालनहारी।
वृषभ पर आरूढ़ होकर ‘वृषारूढ़ा’ कहलाती हैं माँ,
दाएँ त्रिशूल, बाएँ कमल धारण कर शोभा पाती हैं माँ॥
श्वेत वस्त्रों में सजी माँ की छवि मन को भाती है,
उनके दर्शन मात्र से भक्तों के मन में शांति आती है।
माँ के चरणों में श्रद्धा से जो अपना शीश झुकाता है,
उसके जीवन में धैर्य, साहस और स्थिरता आती है॥
माँ शैलपुत्री शक्ति की प्रथम स्वरूपा मानी जाती हैं,
भक्तों के जीवन में नई ऊर्जा, चेतना, जागृति जगाती हैं।
गाय के घी और श्वेत वस्तुओं का भोग लगाया जाता है,
प्रेम और विश्वास से ही माँ का पूजन किया जाता है॥
कहते हैं, पूर्वजन्म में माँ ‘सती’ के नाम से जानी जाती थीं,
राजा दक्ष की पुत्री बनकर धरती पर अवतरित हुई थीं।
मन से ही भगवान शिव को अपना पति स्वीकार किया,
शिव से विवाह कर जीवन को तप और भक्ति से भर दिया॥
एक बार राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया,
पर उस यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया।
सती जब पहुँचीं, देखा शिव का वहाँ सम्मान नहीं हुआ,
अपने आराध्य के अपमान से उनका हृदय अत्यंत दुखी हुआ॥
पिता के उस व्यवहार से सती का मन व्यथित हो गया,
शिव के अपमान का दुःख उनके अंतर्मन में भर गया।
योगाग्नि में अपनी देह त्यागकर सती ने प्राण दिए,
प्रेम, निष्ठा और समर्पण के अद्भुत आदर्श दिए॥
समय बीता, हिमालय के घर फिर दिव्य प्रकाश आया,
पार्वती के रूप में माँ ने पुनः इस धरती पर जन्म पाया।
बाल्यकाल से ही शिव को पाने का मन में संकल्प किया,
कठोर तपस्या करके अपनी भक्ति का परिचय दिया॥
अनेक कठिनाइयाँ आईं, पर माँ का संकल्प न डोला,
तप के मार्ग पर बढ़ते हुए भक्ति का दीप न बुझा।
अंततः भगवान शिव ने उनकी तपस्या को स्वीकार किया,
पार्वती ने पुनः शिव को अपने पति रूप में प्राप्त किया॥
हे माँ शैलपुत्री! मेरे मन में भी अटूट विश्वास जगाओ,
डगमगाते जीवन को अपने चरणों का आश्रय दिलाओ।
जब कठिन राह मिले, तब साहस बनकर साथ निभाना,
जब मन निराश हो, माँ, तुम आशा की ज्योति जलाना॥
मेरे भीतर स्थिरता हो, वाणी में मधुरता भर देना,
अहंकार मिटाकर हृदय में सच्ची भक्ति भर देना।
दुःख में धैर्य, कर्म में शक्ति और मन में विश्वास रहे,
हर पल मेरे हृदय में माँ, आपका ही निवास रहे॥
हे गिरिराज की बेटी, हे जग की पालनहारी,
तेरी महिमा सबसे न्यारी, तेरी ममता सबसे प्यारी।
तेरे चरणों में शीश झुकाकर बस इतनी अरदास हमारी,
जनम-जनम तक बनी रहे माँ, तेरी कृपा हम पर भारी॥
जय माँ शैलपुत्री! जय आदिशक्ति! जय माता दी!
— रूपेश कुमार
