डिफॉल्ट

कुण्डलिनी छंद

आई है जब आपदा, भरते हैं सब आह।
मानें ईश्वर दंड है, बस्ती हुई तबाह।।
बस्ती हुई तबाह, आज तो हम सब डरते।
पाप घड़े में पुण्य, सभी मिलकर हैं भरते।।१३७

धीरज लालीपाप है, कहते हैं अब लोग।
जिसके हिस्से आ गया, कल ही भारी रोग।।
कल ही भारी रोग, कहेंगे क्या अब नीरज।
कहते हैं यमराज, भला क्यों रखना धीरज।।१३८

दुर्घटना के बाद तो, होते सारे खेल।
सूत्र जोड़ते फिर रहे, निकल रहा है तेल।।
निकल रहा है तेल, व्यर्थ लगता है खटना।
कहें मित्र यमराज, नहीं हो अब दुर्घटना।।१३९

कहना कितना है सही, मिले कहाँ आराम।
इसका मतलब है यही, करते क्या हो काम।।
कब करते हो काम, बनाया इसको गहना।
कहें मित्र यमराज, बात सब सच ही कहना।।१४०

मानव नाहक बन रहा, जानबूझ अंजान।
शीश झुका स्वीकारिए, विधि का अजब विधान।।
विधि का अजब विधान, नहीं तुम बनना दानव।
होगा तब कल्याण, आप बन रहना बस मानव।।१४१

खिंचती कुर्सी लोभ में, नफरत की दीवार।
आपस में ही फैलती, नित नूतन तकरार।।
नित नूतन तकरार, व्यर्थ ही जनता लड़ती।
बात-बात पर आज, नई तलवारें खिंचती।।१४२

दिखता क्यों हमको नहीं, बिछा मौत का जाल।
या फिर होती है खुशी, आ जाता है काल।
बन जाता है काल, हमें तो खाना पिस्ता।
किसका रखना ध्यान, नहीं जब कोई दिखता।।१४३

ऐसी करनी कीजिए, लोग करें गुणगान।
संग आपसे दूर हो, कैसा भी अभिमान।।
कैसा भी अभिमान, भावना दूजा कैसी।
करना नहीं विचार, संत की वाणी ऐसी।।१४४

नजराना जो पा रहे, उस पर करो विचार।
आखिर इसका राज क्या, या फिर चढ़े उधार।।
या फिर चढ़े उधार, आज का देख जमाना।
कल को पड़े न भार, आज मिलता नजराना।।१४५

झूठा नहीं जताइए, प्रिय मित्र तुम खेद।
छोटी सी तो बात है, करिए कभी न भेद।।
करिए कभी न भेद, भले हो कोई रूठा।
समझो इतनी बात, खेल करना मत झूठा।।१४६


जन्माष्टमी


कहना है श्री कृष्ण से, दें थोड़ा अब ध्यान।
एक बार फिर जगत को, दें गीता का ज्ञान।।
दें गीता का ज्ञान, हमें अब आया ठगना।
मानें मेरी बात, प्रेम से इतना कहना।।१४७

माखन चोर का जन्मदिन,मना रहे हम आज।
इससे सुंदर कुछ नहीं, दूजा कोई काज।।
दूजा कोई काज, कर्म भी जब मनभावन।
तब होंगे श्री कृष्ण, आप घर खाकर माखन।।१४८

लाला नंद के चाहते, रहो खुशी से आप।
मगर कर्म ऐसा करो, जिसको कहते पाप।।
जिसको कहते पाप, बड़ा है गड़बड़झाला।
उलझन में हैं आज, कृष्ण कन्हैया लाला।।१४९

जाना ही जब आपको, आते क्यों हो आप।
नहीं देखना है अगर, जब धरती का पाप।।
जब धरती का पाप, सिर्फ है माखन खाना।
कहें मित्र यमराज, कृष्ण मत आकर जाना।।१५०


घर की रौनक बेटियाँ, आँगन की मुस्कान।
मात-पिता के हृदय का, नभ जैसा अरमान।।
नभ जैसा अरमान, आज अब डर है भारी।
तेजी से है बढ़ रही, लगे कैंसर सी बीमारी।।१५१

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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