पर्यावरण

फिर हवा खराब: प्रदूषण की लौटती समस्या और हमारी जिम्मेदारी

हवा जीवन का आधार है। मनुष्य भोजन के बिना कई दिन और पानी के बिना कुछ समय तक जीवित रह सकता है, लेकिन हवा के बिना कुछ मिनट भी जीवन की कल्पना करना कठिन है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि जिस हवा पर हमारा अस्तित्व निर्भर है, उसी को हम अपनी गतिविधियों से लगातार प्रदूषित कर रहे हैं। हर वर्ष मौसम बदलने के साथ एक बार फिर समाचार सुनाई देने लगते हैं—हवा खराब हो गई है, वायु गुणवत्ता गिर रही है और लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। सवाल उठता है कि आखिर हर साल हवा खराब क्यों हो जाती है और हम इससे स्थायी मुक्ति क्यों नहीं पा रहे हैं?

हर साल लौटता प्रदूषण का संकट

भारत के अनेक शहरों, विशेषकर उत्तर भारत में, सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण गंभीर समस्या बन जाता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में धुंध, धुएँ और प्रदूषक कणों का मिश्रण वातावरण को प्रभावित करता है। पराली जलाना इस समस्या का एक कारण है, लेकिन इसे ही संपूर्ण समस्या मान लेना वास्तविकता को अधूरा समझना होगा।

वाहनों से निकलने वाला धुआँ, उद्योगों का उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, सड़कों की धूल, कचरा जलाना, घरेलू ईंधन और बिजली उत्पादन से होने वाला प्रदूषण भी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। सर्दियों में हवा की गति कम होने और वायुमंडलीय परिस्थितियों के कारण प्रदूषक जमीन के निकट जमा हो सकते हैं। परिणामस्वरूप प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ जाता है।

इसलिए हवा की खराब गुणवत्ता किसी एक दिन, एक शहर या एक किसान की समस्या नहीं है। यह हमारी विकास व्यवस्था, ऊर्जा के उपयोग, परिवहन प्रणाली और पर्यावरण के प्रति हमारी सामूहिक लापरवाही से जुड़ी हुई चुनौती है।

पराली: समस्या और समाधान दोनों पर विचार जरूरी

फसल कटाई के बाद खेतों में बची पराली को जल्दी हटाने के लिए कुछ किसान उसे जला देते हैं। सीमित समय, अगली फसल की तैयारी, श्रम की लागत और मशीनों तक पहुंच जैसी समस्याएँ इस व्यवहार को बढ़ावा दे सकती हैं। पराली जलने से निकलने वाला धुआँ वायु प्रदूषण में योगदान देता है।

लेकिन किसानों को केवल दोषी ठहराने से समस्या हल नहीं होगी। उन्हें सस्ती मशीनें, समय पर सहायता, फसल अवशेष प्रबंधन के व्यावहारिक विकल्प और आर्थिक प्रोत्साहन उपलब्ध कराना आवश्यक है। पराली से जैव-ईंधन, कम्पोस्ट, पशु-आहार के उपयुक्त विकल्प तथा औद्योगिक उपयोग की संभावनाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जहाँ वे तकनीकी और आर्थिक रूप से व्यवहार्य हों।

किसानों को पर्यावरण संरक्षण का भागीदार बनाना होगा, न कि समस्या का अकेला जिम्मेदार।

बच्चों और बुजुर्गों पर अधिक प्रभाव

प्रदूषित हवा का प्रभाव केवल दिखाई देने वाली धुंध तक सीमित नहीं रहता। हवा में मौजूद सूक्ष्म कण, विशेषकर पीएम2.5, फेफड़ों में गहराई तक पहुँच सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से हृदय और श्वसन संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।

बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएँ तथा पहले से हृदय या फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित लोग विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। प्रदूषण के दिनों में खाँसी, आँखों में जलन, सांस लेने में परेशानी और अस्थमा के लक्षण बढ़ सकते हैं।

इसका प्रभाव शिक्षा, कामकाज और जीवन की गुणवत्ता पर भी पड़ता है। जब बच्चे खुले मैदान में खेलने से बचने लगें, बुजुर्ग सुबह की सैर न कर सकें और लोगों को सामान्य गतिविधियाँ सीमित करनी पड़ें, तो यह केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट बन जाता है।

केवल सलाह नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए

वायु प्रदूषण के दौरान लोगों को मास्क पहनने, बाहर की गतिविधियाँ कम करने और सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। ये उपाय कुछ परिस्थितियों में उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन इनसे प्रदूषण के मूल कारण समाप्त नहीं होते।

सरकारों को प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करके नियमित निगरानी करनी चाहिए। सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रित करना, कचरा खुले में जलाने पर प्रभावी रोक लगाना और औद्योगिक उत्सर्जन के नियमों का पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है।

शहरों में केवल पौधे लगाने के अभियानों के बजाय मौजूदा पेड़ों और हरित क्षेत्रों की रक्षा भी जरूरी है। पेड़ पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे वाहन उत्सर्जन, औद्योगिक धुएँ और खुले में कचरा जलाने का विकल्प नहीं बन सकते। प्रदूषण कम करने के लिए स्रोत पर नियंत्रण सबसे प्रभावी रणनीतियों में से एक है।

राज्यों के बीच समन्वय भी आवश्यक है, क्योंकि हवा प्रशासनिक सीमाओं को नहीं मानती। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और अन्य प्रभावित क्षेत्रों को साझा वैज्ञानिक जानकारी, बेहतर योजना और निरंतर कार्रवाई के आधार पर काम करना चाहिए।

नागरिक क्या कर सकते हैं?

प्रत्येक नागरिक का योगदान महत्वपूर्ण है। छोटी-छोटी आदतें मिलकर सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं।

– निजी वाहन के स्थान पर जहाँ संभव हो, सार्वजनिक परिवहन, साइकिल या साझा वाहन का उपयोग करें।

– कचरा, पत्तियाँ और कृषि अवशेष खुले में न जलाएँ।

– बिजली और ईंधन की अनावश्यक खपत कम करें।

– स्थानीय वायु गुणवत्ता सूचकांक  की जानकारी रखें और प्रदूषण अधिक होने पर बाहरी गतिविधियों में सावधानी बरतें।

– बच्चों, बुजुर्गों और श्वसन रोगियों की विशेष देखभाल करें।

– प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों की सूचना संबंधित अधिकारियों को दें और पर्यावरण संबंधी जन-जागरूकता में भाग लें।

प्रदूषण अधिक होने पर अच्छी गुणवत्ता वाला, सही फिटिंग का एन95 या समकक्ष रेस्पिरेटर सूक्ष्म कणों के संपर्क को कम करने में मदद कर सकता है। हालांकि, कोई भी मास्क सभी प्रदूषकों से पूर्ण सुरक्षा नहीं देता।

 सर्दी से पहले जागना होगा

हर साल हवा खराब होने पर चिंता व्यक्त करना और कुछ दिनों बाद सब कुछ भूल जाना पर्याप्त नहीं है। यदि प्रदूषण के कारण हर वर्ष वही संकट लौटता है, तो इसका अर्थ है कि हमारे समाधान अभी पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं।

स्वच्छ हवा किसी विशेष वर्ग का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। इसे सुनिश्चित करना सरकार, उद्योग, किसानों और आम नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।

हमें ऐसा भविष्य बनाना होगा जिसमें सर्दियों का आगमन प्रदूषण के भय का संकेत न बने और बच्चों को साफ हवा में सांस लेने के लिए संघर्ष न करना पड़े।

हवा अपने आप खराब नहीं होती; हमारी गतिविधियाँ उसे खराब करती हैं। इसलिए हवा को स्वच्छ बनाने की शुरुआत भी हमारी सोच, हमारी आदतों और हमारे सामूहिक प्रयासों से ही होगी।

— डॉ. विजय गर्ग

*डॉ. विजय गर्ग

शैक्षिक स्तंभकार, मलोट

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