राजनीति का गिरता स्तर, जातिवादी मानसिकता और लोकतंत्र का भविष्य
वर्तमान समय में यदि देश की राजनीतिक परिस्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन किया जाए, तो एक गहरी बेचैनी और दिशाहीनता का माहौल साफ़ दिखाई देता है। लोकतंत्र का मूल आधार जनता का कल्याण और उसके बुनियादी मुद्दे होते हैं, किंतु आज विडंबना यह है कि वे सारे सरोकार राजनीतिक शोर के बीच नेपथ्य में धकेल दिए गए हैं। देश आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहाँ बहसें जनहित की नीतियों पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आक्षेपों, बेलगाम बयानबाजी और संकीर्ण एजेंडों पर केंद्रित हो चुकी हैं।
सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि क्या आज़ादी के सात दशकों बाद भी जाति-पाँत और पहचान की राजनीति ही देश में वोट प्राप्त करने का एकमात्र ज़रिया बनकर रह गई है? क्या एक महान लोकतांत्रिक देश में ऐसा होना देश और समाज के लिए उचित है? इन सवालों की गहराई में उतरने पर वर्तमान व्यवस्था की कई विसंगतियां सामने आती हैं।
आज चुनाव के मैदान में नीति, नीयत और विकास के एजेंडे पीछे छूट जाते हैं और जातीय समीकरण तथा भावनात्मक ध्रुवीकरण सबसे आगे आ जाते हैं। राजनीतिक दल समाज को जातियों और उपजातियों में विभाजित कर अपनी रोटियाँ सेकने से बाज नहीं आ रहे हैं।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर और हमारे अन्य संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे आधुनिक भारत का सपना देखा था, जहाँ व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि एक सजग नागरिक के रूप में हो। लोकतांत्रिक प्रणाली का उद्देश्य समानता और न्याय को सुनिश्चित करना है, न कि समाज को खांचों में बाँटकर सत्ता हासिल करना। स्पष्ट शब्दों में कहें तो, एक विविधता से भरे लोकतांत्रिक देश में राजनीति का पूरी तरह जाति-पाँत पर आधारित हो जाना देश की एकता, अखंडता और भविष्य के लिए अत्यंत घातक और अनुचित है। जब योग्यता और विकास के बजाय जाति को प्राथमिकता दी जाती है, तब देश का समग्र विकास अवरुद्ध हो जाता है।
राजनीतिक संवाद का स्तर आज अपने सबसे निचले पायदान पर पहुँच गया है। नेताओं की ज़ुबानें बेलगाम हो चुकी हैं और बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देना आम बात बन गई है। राजनीतिक मंचों से जिस प्रकार की अमर्यादित शब्दावली का प्रयोग हो रहा है, उसने सार्वजनिक जीवन की शालीनता को तार-तार कर दिया है।
लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष को गाड़ी के दो पहिये माना गया है, जो संतुलन बनाए रखते हैं। लेकिन मौजूदा दौर में इस संतुलन के स्थान पर केवल और केवल छींटाकशी और अनर्गल प्रलाप दिखाई देता है। इस अंतहीन रस्साकशी में आम जनता पिस रही है, जिसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
इस पूरे परिदृश्य में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की भूमिका भी आत्ममंथन की मांग करती है। निष्पक्ष पत्रकारिता और जनता के मुद्दों को मुख़रता से उठाने के बजाय, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आज सनसनीखेज बहसों और टीआरपी की अंधी दौड़ में लिप्त नज़र आता है। जब राजनेता समाज को तोड़ने वाली भाषा का प्रयोग करते हैं, तो कई बार सनसनी फ़ैलाने के लिए उसे मंच प्रदान कर दिया जाता है। मीडिया को सत्ता से तीखे सवाल पूछने और जनता की आवाज़ बनने का माध्यम होना चाहिए था, न कि राजनीतिक नैरेटिव का अनुचर।
इस धुंधले राजनीतिक माहौल में यदि देश के पास कोई सबसे बड़ी उम्मीद है, तो वे हैं,देश के युवा। आज भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है, और इन कंधों पर ही इस दिशाहीन राजनीति को सही रास्ते पर लाने का भारी दायित्व है।
युवाओं को अब खोख़ले नारों और भावनात्मक बहकावे से ऊपर उठकर राजनेताओं से रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास पर ठोस सवाल पूछने होंगे। जब युवा वोट देते समय उम्मीदवार की जाति देखने के बजाय उसकी योग्यता, विज़न और ट्रैक रिकॉर्ड को परखेंगे, तभी राजनीतिक दलों को अपनी सामंती और जातीय कार्यशैली बदलने पर मजबूर होना पड़ेगा।
राजनीति का यह वर्तमान स्वरूप देश के लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए एक चेतावनी है। यदि समय रहते राजनेता अपनी भाषा, आचरण और प्राथमिकताओं में सुधार नहीं लाते हैं, तो जनता का इस पूरी व्यवस्था से मोहभंग होना स्वाभाविक है।
अब समय आ गया है कि देश जाति-पाँत और बेलगाम बयानबाजी की इस राजनीति को सिरे से नकारे। मीडिया अपनी खोई हुई साख़ को पुनर्जीवित करे और देश का युवा वर्ग आगे आकर लोकतंत्र की इस गाड़ी को पटरी पर लाए। देश की असली ताकत जनता का सामूहिक विवेक है, जब जनता अपने बुनियादी मुद्दों पर अडिग हो जाएगी, तब राजनीति को भी जनभावनाओं के सामने झुकना ही पड़ेगा।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
