राजनीति

रामलीला में अखिलेश की हुंकार, यूपी में गठबंधन की एकता पर सवाल!

दिल्ली के रामलीला मैदान से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा के खिलाफ ऐसी हुंकार भरी है, जिसकी असली परीक्षा अब उत्तर प्रदेश में होगी। एक नवंबर को इंडिया गठबंधन की महारैली में विपक्षी नेताओं ने एक मंच पर खड़े होकर चुनावी व्यवस्था, कथित वोट चोरी और भाजपा की राजनीति पर हमला बोला। अखिलेश ने दावा किया कि 2027 में उत्तर प्रदेश से भाजपा की विदाई होगी। उन्होंने यहां तक कहा कि यूपी के लोग स्वागत अच्छा करते हैं तो विदाई उससे भी बेहतर करते हैं। उनके इस बयान ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। मगर सवाल यह है कि जो विपक्ष दिल्ली के रामलीला मैदान में एकजुट दिखाई दिया, क्या वह लखनऊ पहुंचते-पहुंचते भी अपनी एकजुटता बचा पाएगा? क्योंकि भाजपा को सत्ता से हटाने की लड़ाई में सबसे बड़ा रोड़ा विपक्ष की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बन सकती हैं।अखिलेश यादव ने अपने भाषण में उत्तर प्रदेश को बदलाव की राजनीति का केंद्र बताया। उन्होंने रामलीला मैदान को लोकतंत्र की हल्दीघाटी बताते हुए कहा कि परिवर्तन का संदेश यहीं से निकलेगा। भाजपा पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि जिनकी जमीन ही नहीं बची, वे पैर कहां रखेंगे। उनका इशारा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अंगद के पैर वाले बयान की तरफ था।अखिलेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम कटने संबंधी बयान को भी राजनीतिक हथियार बनाया। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर यह आंकड़ा कहां से आया और इसकी जानकारी किस आधार पर दी गई? उनका कहना था कि जब सरकार के मुखिया ही इतने बड़े आंकड़े की बात कर रहे हैं तो इस सवाल पर विपक्ष की आवाज को अनसुना नहीं किया जा सकता।हालांकि मतदाता सूची में नाम कम होने और कथित वोट चोरी के आरोपों को एक ही तथ्य मानना उचित नहीं है। नाम हटने की वजह, पात्र मतदाताओं की स्थिति और निर्वाचन प्रक्रिया के आधिकारिक आंकड़ों की जांच जरूरी है। विपक्ष को अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण भी सामने रखने होंगे।

अखिलेश यादव की राजनीतिक आक्रामकता के पीछे 2024 के लोकसभा चुनाव का परिणाम है। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीती थीं। दोनों दलों का संयुक्त आंकड़ा 43 सीटों तक पहुंच गया था। भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई थी। यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उत्तर प्रदेश लंबे समय से भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति का सबसे मजबूत आधार बना हुआ है।सपा ने पहली बार प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दौरान इतनी बड़ी राजनीतिक बढ़त हासिल की। अखिलेश ने अपने पीडीए समीकरण को चुनावी परिणाम में बदलकर दिखाया। कांग्रेस को भी गठबंधन से नई राजनीतिक ताकत मिली। यही वजह है कि दोनों दल अब 2027 के विधानसभा चुनाव को सत्ता परिवर्तन के बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं।लेकिन 2024 की जीत को 2027 की जीत की गारंटी समझना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे अलग होते हैं। स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, संगठन की सक्रियता और सरकार के कामकाज का असर विधानसभा चुनाव में कहीं अधिक दिखाई देता है।उत्तर प्रदेश की विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं और बहुमत के लिए 202 सीटों की जरूरत होती है। 2022 के चुनाव में भाजपा ने अकेले 255 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। समाजवादी पार्टी 111 सीटों तक पहुंची थी। कांग्रेस को केवल दो सीटें मिली थीं। भाजपा के सहयोगियों को मिलाकर एनडीए की संख्या 273 तक पहुंच गई थी।इन आंकड़ों से साफ है कि विपक्ष को सत्ता तक पहुंचने के लिए अपनी पिछली स्थिति से काफी आगे जाना होगा। 2024 में लोकसभा की 43 सीटें जीतना बड़ी उपलब्धि जरूर है, लेकिन विधानसभा की 202 सीटों का लक्ष्य हासिल करने के लिए विपक्ष को हर क्षेत्र में मजबूत उम्मीदवार और भरोसेमंद संगठन चाहिए।भाजपा को हराने के लिए केवल नाराजगी का माहौल बनाना काफी नहीं होगा। जनता को यह भी भरोसा देना होगा कि सत्ता मिलने पर सरकार किस दिशा में काम करेगी।गठबंधन की सबसे कठिन परीक्षा सीटों के बंटवारे में होगी। कांग्रेस 2024 के प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है। पार्टी की नजर उन सीटों पर है जहां उसका पुराना जनाधार और मजबूत उम्मीदवार मौजूद हैं। दूसरी तरफ सपा खुद को प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत मानती है।मई 2026 में सामने आए राजनीतिक घटनाक्रम के अनुसार कांग्रेस ने 100 से 125 सीटों पर मजबूत उम्मीदवार तैयार करने की रणनीति बनाई थी। वहीं सपा सीटों की संख्या के बजाय जीतने की संभावना को प्राथमिकता देने की बात कहती रही है। दोनों दलों के बीच अंतिम सीट समझौता अभी होना बाकी है।यहीं से गठबंधन की असली परेशानी शुरू होती है। कांग्रेस को ज्यादा सीटें मिलती हैं तो सपा के स्थानीय नेताओं की नाराजगी बढ़ सकती है। सपा ज्यादा सीटें अपने पास रखती है तो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा हो सकता है। दोनों दलों के सामने अपने-अपने राजनीतिक आधार को बचाने की चुनौती है।2017 का अनुभव भी सामने है। उस समय सपा और कांग्रेस ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था। कांग्रेस को 105 सीटें दी गई थीं, लेकिन पार्टी केवल सात सीटें जीत सकी थी। सपा को भी सत्ता से बाहर होना पड़ा था। 2022 में दोनों दल अलग-अलग लड़े और कांग्रेस दो सीटों पर सिमट गई। ऐसे में दोनों को समझना होगा कि गठबंधन की मजबूती केवल सीटों की संख्या से नहीं, बल्कि सही उम्मीदवार और जमीनी तालमेल से तय होती है।

अखिलेश यादव की राजनीति का सबसे बड़ा आधार पीडीए है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एक राजनीतिक मंच पर लाने की उनकी कोशिश ने 2024 में सपा को बड़ी सफलता दिलाई। मगर 2027 में इस समीकरण को बनाए रखना आसान नहीं होगा।कांग्रेस का अपना सामाजिक आधार है। सपा का अपना संगठन और मतदाता वर्ग है। छोटे सहयोगी दल भी अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं। ऐसे में अखिलेश को सबको साथ लेकर चलना होगा। केवल बड़े नेताओं की संयुक्त तस्वीर से मतदाता एक साथ नहीं आते। इसके लिए गांवों, कस्बों और बूथों तक साझा अभियान चलाना होगा।बसपा प्रमुख मायावती की राजनीति भी इस समीकरण को प्रभावित कर सकती है। दलित मतदाताओं के बीच बसपा का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसलिए सपा और कांग्रेस को यह समझना होगा कि दलित मतदाताओं का समर्थन केवल नारों से नहीं, भरोसे और राजनीतिक भागीदारी से हासिल होगा।भाजपा को विपक्ष की एकजुटता से राजनीतिक चुनौती जरूर मिलेगी, लेकिन उसे कमजोर समझना विपक्ष की बड़ी भूल होगी। भाजपा के पास प्रदेशव्यापी संगठन, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और सरकार का अनुभव है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पार्टी पहले से चुनावी तैयारी में जुटी है।विपक्ष को महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था जैसे सवालों पर सरकार को घेरना होगा। साथ ही यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह इन समस्याओं का समाधान कैसे करेगा।रामलीला मैदान में अखिलेश यादव ने भाजपा को चुनौती देने का ऐलान कर दिया है। लेकिन अब उन्हें अपने सहयोगियों को साथ रखने, सीटों का विवाद सुलझाने और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का कठिन काम करना होगा। 2027 की लड़ाई में अखिलेश यादव के पास 2024 का आत्मविश्वास है, लेकिन भाजपा के पास 2022 की सत्ता और मजबूत संगठन है। कांग्रेस के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने का अवसर है, जबकि सपा के सामने प्रदेश में अपनी सबसे बड़ी विपक्षी ताकत की पहचान बचाए रखने की चुनौती है।रामलीला मैदान में विपक्ष ने भाजपा के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी है। मगर दिल्ली में हाथ उठाकर एकता दिखाना और उत्तर प्रदेश की 403 सीटों पर एक साथ चुनाव लड़ना दो अलग-अलग बातें हैं। अगर सीटों की खींचतान, नेतृत्व की महत्वाकांक्षा और स्थानीय गुटबाजी हावी हुई तो यह एकता चुनाव से पहले ही कमजोर पड़ सकती है।अखिलेश यादव को अब केवल भाजपा की विदाई का नारा नहीं देना है, बल्कि अपने सहयोगियों को यह भरोसा भी दिलाना है कि गठबंधन में सबकी राजनीतिक हिस्सेदारी सुरक्षित रहेगी। क्योंकि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता रामलीला मैदान से नहीं, बल्कि उन हजारों बूथों से होकर गुजरता है जहां मतदाता अपना फैसला सुनाता है। 2027 में भाजपा की विदाई होगी या विपक्ष की एकता की परीक्षा में फिर दरार पड़ेगी, इसका जवाब नारों से नहीं, जमीन पर किए गए काम से मिलेगा।

— अजय कुमार

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