दस्तक दो इस बार सखे
तुम बिन सूना मन का आँगन,
बन जाओ झंकार सखे !
साँसें तुमको ढूँढ रही हैं,
कर लो अब स्वीकार सखे !
मौन समर्पण की यह बेला,
तुमको ही आवाज़ लगाती,
जैसे चातक की व्याकुलता,
स्वाति-बूंद का राह ताकती,
सूखे मरुथल पर चाहत की,
कर दो तुम बौछार सखे !
साँसें तुमको ढूँढ रही हैं…
कर लो अब स्वीकार सखे !
— सविता सिंह मीरा
