कविता

दस्तक दो इस बार सखे

तुम बिन सूना मन का आँगन,
बन जाओ झंकार सखे !
साँसें तुमको ढूँढ रही हैं,
कर लो अब स्वीकार सखे !

मौन समर्पण की यह बेला,
तुमको ही आवाज़ लगाती,
जैसे चातक की व्याकुलता,
स्वाति-बूंद का राह ताकती,

सूखे मरुथल पर चाहत की,
कर दो तुम बौछार सखे !
साँसें तुमको ढूँढ रही हैं…
कर लो अब स्वीकार सखे !

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com

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