क्षणिका : तर्पण
-1- जीते जी,,, सम्मान नहीं मरने पर श्राद्ध तर्पण कैसा घोटाला ? -2- अतृप्त मन स्नेह मृगतृष्णा, कैसे कर दूं,
Read More-1- जीते जी,,, सम्मान नहीं मरने पर श्राद्ध तर्पण कैसा घोटाला ? -2- अतृप्त मन स्नेह मृगतृष्णा, कैसे कर दूं,
Read Moreऔरतें बहुत चालाक होती हैं बड़ी ही सावधानी से, अपने चारों ओर इक वृत्त खींच लेती हैं ! … और
Read Moreसिखाया होगा किसी वक़्त उसने “बोलना” मुझको पर अब लगता …. उसको बोलना नहीं आता है। हां! मां को
Read Moreपांचवीं कक्षा में पढ़ने वाला राहुल बहुत ही समझदार बच्चा था। रोज़ की भांति जैसे ही वह स्कूल से निकला,
Read Moreदिल के कोने में सिकुड़ी – सिमटी सी इक ख्वाहिश अक्सर,,, करती है फरियाद दिल से “ऐ” दिल, आज फिर…
Read Moreसुनो सजना… सुनो सजना ! सुरमई शाम ने फिर शरारत भरी,,, साजिश की है। सुनहरे सपने दिखा, सतरंगी एहसास जगा,
Read More“सुरभि बेटा, यह क्वारंटाइन क्या होता है?” कमरे के बाहर खड़ी सुरभि से अख़बार से नज़र उठाते हुए दादी
Read More