ग़ज़ल : भोर की आस
अँधेरी रात में भी भोर की आस रखना तुम | अँधेरा नित नहीं रहता यही विशवास रखना तुम || घृणा
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Read Moreजहरीली हवा घुटती जिंदगानी दोस्तो यही है नये दौर की कहानी दोस्तो पर्वतों पे देखो कितने बाँध बन गये जवां
Read Moreकई गलतफहमियाँ दरकिनार करनी पडती हैं दुखों की घड़ियाँ साथ की सुई से टांकनी पड़ती हैं सरे राह गला पकड़
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