ग़ज़ल
रूठे-रूठे यार मना कर आया हूँ। दरिया ऊपर पुलबना कर आया हूँ। गुलशन को है मेरे पर इतराज़ बहुत, काँटों
Read Moreमेरे साहित्यिक उस्ताद थे पण्ड़ित विष्णु कालिया जी। पतला दुबला लम्बे कद काठ का शरीर। गोरा रंग। मधुर संवेदना व्यक्तित्त्व।
Read Moreबच्चे सबको प्यारे लगते। माँ को राज दुलारे लगते। इन में ही भगवान मिलेगा। इक सच्चा इन्सान मिलेगा। घर में
Read Moreसर्व उच्च सत्कार बाबा दीप सिंह। मानवता का प्यार बाबा दीप सिंह। दुश्मनों के वास्ते ललकार था। तेज़ तीख़ी चमकती
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