गीतिका
कण – कण में प्रभु की कविताई। छंद, शब्द , लय में बँध छाई।। कर्म किया करता जन जैसा, वैसी
Read Moreनाम था उसका भोला।स्वभाव का भी भोला। दीवाली से दो दिन पहले एक दिन वह अपने खेत की मेंड़ की
Read Moreआपके साथ हर समय रहने वाले ,सबकी अच्छी – बुरी सुनने वाले ;हम आपके ही दो कान हैं। आप ये
Read Moreहमने आज शहर में देखे, मँहगाई के पाँव। पास दीवाली आती देखी, बाजारों में पहुँचे। मुनिया के कुछ कपड़े ले
Read Moreजिसने जग को दिया उजाला। कहलाता वह दीया निराला।। करता दूर अँधेरा सारा। भले गगन में ऊपर तारा।। जुगनू भी
Read Moreदूसरों को देखकर ,जी हाँ, मात्र देखकर जलने लगना ,मानव स्वभाव है।’स्व’ अर्थात अपना भाव है।अर्थात यह भाव किसी अन्य
Read Moreअपनी पीठ आप ही थपथपाना हमारा स्वभाव है।जिसे मुहावरेदार भाषा में कहें तो कहा जायेगा तो मियाँ मिट्ठू बनना ही
Read Moreछत – छत पर फहराते झंडे, जनता आज्ञाकारी ? एक बार आदेश हो गया, चादर तानी सोया! लगा राष्ट्र ध्वज
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