ग़ज़ल
जिद ना कर बात मान रहने दे, पुरखों का मकान रहने दे हर नई चीज़ नहीं है बेहतर, कुछ पुराने
Read Moreजिसको देखो पूछता है वो कब अच्छे दिन आएँगे कब हम घर में बैठकर अपने दूध-मलाई खाएँगे लेकिन हम ये
Read Moreमौन रहूँ तो सबको शेष-शय्या का विष्णु लगता हूँ लेकिन कुछ बोलूँ तो बड़ा ही असहिष्णु लगता हूँ मेरे प्यारे
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