क्षणिका
हमनें रोज बदलते देखा इंसा को उसके लहजे उसकी बातों को
Read Moreकुछ कुछ भूलने सा लगा हूँ स्मृति भी धूमिल सी होने लगी है उम्र की वजह है या दिन दुनियां
Read Moreन खुला अम्बर न खुली छत है चाँद मुस्कुरा रहा फेंक रहा अपनी चांदनी बरसा रहा अमृत कैसे पाऊं यह
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