लघु कथा – वीर रस का कवि
हेलो, जी मैं “अलाने” शहर से विकराल रूप झंझावात बोल रहा हूँ। क्या मैं “फलाने” शहर के कुपित कुमार अग्नि
Read Moreहेलो, जी मैं “अलाने” शहर से विकराल रूप झंझावात बोल रहा हूँ। क्या मैं “फलाने” शहर के कुपित कुमार अग्नि
Read Moreसूर्य को भी चंद्र कहने पर तुले हैं,दृष्टि में है दोष, या फिर मति मलिन है।। शत्रुओं के सामने घुटनों
Read Moreशब्द को ज्वाला बना कवि, गीत को अंगार कर।राष्ट्र के सब द्रोहियों पर लेखनी से वार कर।। शत्रु सीमा पार
Read Moreसिन्धु-तीर पर लोगों की अठखेली देख रहा हूँ।मस्ती करते अलबेले-अलबेली देख रहा हूँ।। दूर क्षितिज से आकर लहरें कितना इठलाती
Read Moreआजकल तो एक हफ़्ते में नहाने का चलन है।शत्रु लगता गुसलखाना, दूर से जल को नमनहै।कँपकँपाती देह एवम् थरथराता हुआ
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