गीत
भावों के ताने-बाने कुछ उलझ गए हैं,
थोड़ा ठहरो, सुलझा लूँ, तब गीत बुनूँगा।।
आँखें नम हैं, मन का हर कोना घायल है।
सुधियों की गलियों में भारी कोलाहल है।
सब अच्छा करके भी जब निंदा ही पाई,
यही अंत में स्वीकारा, प्रारब्ध प्रबल है।
मुझे पता है, शूल बिछे हैं सच के पथ में,
पर जब भी चुनना होगा, पथ यही चुनूँगा।।
हर कोई अपना बनकर ही छलने आया।
मीठी-मीठी बातें कर विश्वास जमाया।
रहा एक सा ही अनुभव सारे अपनों से,
काम हुआ तो फिर न किसी ने मुख दिखलाया।
समझ आ गया जब, ऐसी ही है यह दुनिया,
अब ना पछताऊँगा, अब ना शीश धुनूँगा।।
जो भी मिलता है, सलाह देकर जाता है।
हमें हमारे ही निर्णय से भटकाता है।
इतने-इतने मार्ग बता देती है दुनिया,
भ्रमित हुआ मन खुद को उलझन में पाता है।
जितनी राय मिली उतनी ही ठोकर खाई,
सोच लिया है अब न किसी की बात सुनूँगा।।
— बृज राज किशोर ‘राहगीर’
