कविता

खामोशी

खतरनाक चुप्पी और निस्तेज खामोशी
कहीं हमें ले न डूबे,
फिर वही आन पड़े जब रहना पड़े बुझे बुझे,
हां किये पुरखों ने पानी के लिए झगड़े,
लगाये जोर शोर से जयकारे,
कहीं से तो फूटेंगे चमक ले उजियारे,
मगर अन्य दीगर जरूरी मुद्दों पर
चंद अल्फाज बोल न पाये,
मिमियाती चुप्पी मुंह खोल न पाये,
न हक़ हुकूक की चिंता,
न अधिकारों खातिर कोई सोच,
सहे जा रहे खामोशी से
और कुत्ते,भेड़िये खा रहे नोच नोच,
कोई बाहर से आया जिसने हमें मानव जाना,
हमारी क्षमताओं को पहचाना,
लेकिन हम चुपचाप पड़े रहे हो मदमस्त
धतूरे के आगोश में,
खुद ही खुद को देख नहीं पाये आक्रोश में,
महामानवों के संघर्षों से मिले अधिकार,
ले कर हम कर्तव्य भूल पहुंचे उस पार,
भूल गए कि हमें क्या करना चाहिए,
मिले हुए गड्ढों को मिल जुल भरना चाहिए,
जो कुछ वापस करना था
उसे लुटाते रहे ताउम्र परजीवियों पर,
अपनों के हक़ अधिकार खुद ही कुतर,
आज भी रह रहे ओढ़ खामोशी,
छायी हुई है अब तक रंगीन मदहोशी।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554