कविता
अदब से दुनिया वाले तुम्हारी, नेक दिली पर शीश नवाते हैं, रखते हो तुम जहाँ कदम वहां फूल बिछ जाते
Read Moreवो आस्तिक या नास्तिक ही सही , पर पूरा तो ईमान रखता है … इंसानियत के नाते , इंसान की
Read Moreखामोश हूँ मैं , अब शिकायत नहीं होती, अब इस ज़माने में , किसी का ‘दिल’ समझने की ‘रिवायत ‘
Read Moreशाख से टूटे कुछ पत्ते कुछ मुरझाये ,कुछ सूखे कुछ मिटटी में सने हुवे मुस्काती कलियों को देख रहे थे
Read Moreजीवन जन्म से लेकर अंतिम सांस तक चलता ही रहता है , लेकिन यह जीवन कैसा है, सम्मानित है, सुखी
Read Moreसमुद्र का पानी खारा है तो क्या हुआ, सूरज की तपिश सह कर भी, बादल बन उड़ता है, टकराता है
Read Moreवो भी क्या ज़माना था — जब सिर्फ पांच पैसे का एक पोस्ट कार्ड , इंसानी रिश्तो का – कितना
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