सामाजिक

ये भी देखो समझो

जहां सुमति होती हैं वहां संपत्ति भी होती है,परिवार में एक विचार होने से एक सा ही व्यवहार होता हैं।एक सा व्यवहार होने से परिवार  में एकरूपता आती हैं।इससे परिवार की उन्नति होती हैं। सुमति होने से भिन्न विचार होने पर भी सभ्य के बीच सुमेल रहता हैं।और कुमति होने से सभ्यों के बीच एक […]

सामाजिक

धैर्य

बचपन से सुनते आएं हैं धैर्य से काम लो तो फल जरूर मिलेंगे।आजकल के ज़माने में धैर्य खत्म होता जा रहा हैं।कुछ तो जमाने में हर जगह ’स्पीड’ –झड़प कह सकते हैं उसकी अतिशयोक्ति आ गई है।देखें तो वाहन,पहले के जमाने में पैदल या तांगा वे बैलगाड़ी में यात्रा करते थे।क्या करते थे उस समय […]

कविता

मुस्कुराते चेहरे

हो खत्म दुनिया से दुःख की लहरे तब दिखेंगे हम मुस्कुराते हुए चेहरे जुल्म ओ सितम का दौर खत्म हो प्यार और अमन के सपनें रचे हो लिखे सब प्रेम महोबबत की कहानी न नफरत की बातें किसी की जुबानी जब लिखेंगे हम सब प्यार के ही तराने दुनिया में करते नफरत कीसी बहाने बताओं […]

भाषा-साहित्य

हिन्दी हमारी कितनी?

हिंदी दिवस की शुभकामनाएं के अनगिनत msg पाएं किंतु कैसे छुड़वा पाएंगे अंग्रजी के पाश से? Msg को क्या बोलेंगे? समाचार? नहीं ये गलत प्रयोग होगा,संदेश? ये आप ही सोचे हिंदी को हिंदी बनाएं रखना कितना मुश्किल हैं?कई क्षेत्र ऐसे खास कर डॉक्टरी ,विज्ञान आदि के को परिभाषिक शब्द या वाक्यांश हैं जो सिर्फ अंग्रजी […]

कविता

तवारीख

फट जाता हर महीने एक पन्ना अपनी तवारिख का हर महीना एक कटा रह गए थे ग्यारह कुछ एहसासों से थे बाहर दूसरा कटा रह गाएं थे दस फिर भी नहीं हो रहा था बस फिर गए बीत दिन थे इकत्तीस रह गए थे अब नौ सिर्फ बीत जाते दिन कट जाते पन्ने अब क्यो […]

राजनीति

गुजरात प्रदेश प्रमुख बीजेपी चंद्रकांत रघुनाथ पाटिल (सी आर पाटिल)

जब सी आर पाटिल को बीजेपी पक्ष प्रमुख गुजरात बनाया गया था तो थोड़ा प्रतिभाव के भाव आए थे उनके गुजराती नहीं होने पर किंतु उन्होंने जब बताया की वे सालों से गुजरात में स्थापित है,उनका जन्म 1955 में चाहे महाराष्ट्र के जलगांव में हुआ था,उन्होंने 1989 में पुलिस कांस्टेबल की नौकरी छोड़ बीजेपी में […]

कविता

घायल परिंदे

मत उड़ इतना मासूम परिंदे सब जगह रह देखें हैं दरिंदे माना आसमां बड़ा बड़ा हैं लेकिन वहां भी छैक बड़ा हैं नहीं वहां हैं तेवारी कोई सुरक्षा पग पग पर हैं कड़ी परीक्षा पहचान नहीं पाओगे तुम जो काट काट के वे खायेंगे तुम्हें एक दो नहीं  वे पैंतीस टुकड़े कर डालेंगे क्या तुम […]

बोधकथा

सकारात्मकता

एक कौआ था बहुत ही खुश मिजाज था।जब देखो कांव कांव कर के उड़ता था और अपनी खुशी जाहिर करता था।ज्यादातर वह राजा के महल के आसपास उड़ा करता था।एक दिन राजा कुछ ज्यादा ही परेशान था।कुछ शासकीय समस्या थी जैसे उन्होंने कौए को गाते फुदकते देखा तो गुस्से से पागल हो गया,सिपाहियों को हुक्म […]

सामाजिक

संसार के सुख दुःख

यूं तो शिखा इनकी बहन हैं लेकिन कॉलेज में मेरे साथ पढ़ती थी तो हम भी सहेलियां ही थी।एक ही वर्ग में एक ही बैंच पर बैठती थी हम,एक ही बास्केटबॉल की टीम में खेलती थी हम।बहुत ही नजदीक हुआ करती थी हम पर जैसे ही इनसे शादी हुई मेरी उसका रवैया बदल गया।घर भरा […]

सामाजिक

विवाह

बहुत दिनों बाद अपनी सखी के घर गई थी मैं,बेटी की शादी की बधाई भी देनी थी और मौसीजी के सेहत भी पूछ लेने के आशय से चार बजे पहुंची तो तीनों पीढ़ी एक साथ बैठी थी।नानी,मां और बेटी,साथ बैठ चाय पी रही थी। मैंने पूछा,“ बड़ी देर से आई हो पग फेरे के लिए […]