कविता : फितरत
खुद की उलझनों में उलझ कर प्रभु को भूल जाना इंसानी फितरत तो ना थी जब जब उलझता है सुलझने
Read Moreखुद की उलझनों में उलझ कर प्रभु को भूल जाना इंसानी फितरत तो ना थी जब जब उलझता है सुलझने
Read Moreकल ही की तो बात है बैठे बैठे मार रही थी मच्छर उन्हें मरा देख हुई मन में बेचैनी सी
Read Moreआज दिल कर रहा है कुछ याद करूँ अपने ही भूले-भटके हुये गुनाहों को खुद से ही फ़रियाद करूँ जो
Read Moreहमने ही बनाई यह सृष्टि हम ही है पिछड़े हमने ही सिखाया चलना हमे ही अब सिखा रहें हम मौन
Read Moreकमजोर हूँ तो क्या हुआ तुझे अपने कन्धों पर बिठा कर चल सकता हूँ , राह पर कोई कांटे बिछायें
Read Moreसच्चाई के लिए लड़ते हुए , खोया बहुत कुछ , पाया -पाया कुछ भी नहीं | फिर भी गर्व है
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