लौ
प्रकृति के अंतर्मन से उदीयमान हो रही थी कुछ संवेदनाएं जेहन में प्रदीप्त हो रही थीं । शांत था अलाव
Read Moreनेह लगाकर भूल गए क्यों पास बुलाकर दूर गए क्यों। मैं तो तुम्हरी प्रीत बाबरी , वंशी बजाकर छोड़ गए
Read Moreउम्मीदों के चिराग , आज भी हैं बेहिसाब । क्या हुआ जो रात एक गुजर गई । मौसम के मिजाज
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