लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 33 अंतिम)
भरत जी ने सुग्रीव जी का स्नेह से आलिंगन करते हुए कहा- “सुग्रीव! तुम हम चारों के पाँचवें भाई हो।”
Read Moreभरत जी ने सुग्रीव जी का स्नेह से आलिंगन करते हुए कहा- “सुग्रीव! तुम हम चारों के पाँचवें भाई हो।”
Read Moreभरत जी ने शत्रुघ्न जी को आदेश दिया कि नगर की हर प्रकार से सजावट करें और मार्गों को ठीक
Read Moreऋषि भरद्वाज ने श्री राम से आगे कहा- ”यशस्वी राम! जब आप जटा और वल्कल वस्त्र धारण करके अपनी पत्नी
Read Moreअयोध्या के बाहर नन्दीग्राम में रहकर भरत जी बड़े परिश्रम और मनोयोग से राजकार्य चला रहे थे। उनके राज्य में
Read Moreप्रातः उठकर सभी अपने नित्य कर्म करके चलने को तैयार हुए। पहले उन्होंने यमुना नदी पार की, जिसमें बहुत समय
Read Moreभरत जी द्वारा श्री राम के प्रतिनिधि के रूप में चौदह वर्षों तक अयोध्या का शासन सँभालना स्वीकार करने के
Read Moreश्री राम की बात सुनकर भरत जी और अधिक उदास हो गये। अयोध्या से उनके साथ आये हुए सभी लोग
Read Moreऋषि जाबालि से बात करते हुए श्री राम कुछ रोष में आ गये थे, इसलिए महर्षि वशिष्ठ ने उनको शान्त
Read Moreभरत जी ने फिर कहा- ”भैया! आप अयोध्या लौटकर मेरी माता के कलंक को धो डालिये और पिताजी को भी
Read Moreअगले दिन प्रातःकाल सभी भाई और अन्य लोग अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के लिए मंदाकिनी नदी के तट
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