कविता

नववर्ष आ गया

नववर्ष आ गया ●●●●●●●●●● आखिर देखते देखते लो तेईस भी आ गया स्वप्न नये दिखला गया, था जिसका इंतज़ार मन था बेकरार वो समय भी आ गया। बाइस की भी ऐसी ही बेकरारी थी हम मानें न मानें मगर बीस इक्कीस की तरह बाइस भी सबक बहुत सिखला गया। हम चाहकर भी सबक सीखना नहीं […]

कविता

नववर्ष की चुनौतियां और तैयारियां

  नववर्ष के साथ नयी नयी चुनौतियां भी कम नहीं है, कोरोना का नया वैरिएंट अभी से धमका रहा है। राजनीति का पराभव किसी खतरे से कम नहीं है, नेताओं के बिगड़ते बोल देश की मानसिकता दूषित कर रहे हैं, स्वार्थ में अंधे नेता देश के लिए जोंक से कम नहीं हैं। जेल में नेता […]

क्षणिका

चांद: तुम घुमंतु हो!

चांद, तुम घुमंतु साहित्यकार हो या नहीं घुमंतु तो हो ही! कहीं टिककर रहना तो तुमने सीखा ही नहीं वैसे घुमंतु होने का भी अपना आनंद है नए-नए मनोहारी स्थलों के दर्शन भी करो और ज्ञानवर्धन भी हो!

कविता

चांद, तुम योगी हो

चांद, चाहे तुम्हें कोई पांडुरोग से कहे पीड़ित कोरोना के तनाव से ताड़ित दाग के दंश से दंशित तुम नहीं समझते अपमानित किंचित भी नहीं होते क्रोधित चंदनिया के मृदुल मधु-रस से समरस रहकर करते हो आप्लावित गीता पढ़ी या नहीं पढ़ी रहते हो हर पल निर्लिप्त. सूर्य से उजियारा लेकर करते नहीं संचित सतत […]

कविता

चांद ज़रा सा घटता रहा

चक्र समय का चलता रहा, चांद जरा सा घटता रहा, तारों से अठखेलियां करके, छुपमछुपाई खेलकर रमता रहा. सूर्य से रोशनी लेकर वह, जग को रोशन करता रहा, पूर्ण रहने की कोशिश में, बढ़ता रहा घटता रहा. शुक्लपक्ष में इतराकर , बच्चों की तरह मचलता रहा, बच्चों का चंदामामा बनकर, टॉफी-चॉकलेट-पूए बांटता रहा. मधुरस से […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

जीने की ख़ुशी, न मरने का गम है, मानव मिला तन, यही क्या कम है। किया क्या है हमने, यह तन पाकर, जीवन मरण का, यह कैसा भ्रम है? डरते नहीं हम मरने से, लेकिन, जीने का मक़सद, हमारा कर्म है। संस्कार संस्कृति, हमारी विरासत, पुरातन होने का, हमको न गम है। मर्यादा में रहना, […]

कविता

आओ लौट चले अपने गाँव की ओर

आ अब लौट चलें अपने गांव की ओर जहाँ है अभी मासूमियत नहीं है ठगा ठौरी धोखेबाजी अपनी मिट्टी अपने लोग है उनमें परस्पर अपनापन गाँव के बीच बहती नदी नदी में मदमस्त हो कूदना प्रकृति का भरपूर प्यार माँ का मिलता दुलार स्कूल जाते राह में रूकना मास्टर जी की लम्बी छड़ी मुर्गा बनने […]

कविता

मुक्ति है कितनी सुखदाई!

संघर्ष से मिलती है मुक्ति, मुक्ति के लिए संघर्ष करना, संघर्ष  ही मुक्ति बन जाता, बड़े-बड़ों का है यह कहना.   मुक्ति की राह कठिन है, सरल भी बहुत है मगर, निकलता है अनमोल हीरा, संघर्ष की भट्टी में तपकर.   रुकावट आती है सफलता की राहों में, यह कौन नहीं जानता है? फिर भी […]

कविता

सच्चा प्रेम

पूरा होगा  अब अपना  सब सपना खुशियों की चमन सा घर हो अपना आओ मोहब्बत को नजीर    बनायें लैला मंजनूं सा बन कर हम दिखायें दो नदियों का जैसा हो मिलन गंगा यमुना सा अपना हो संगम हम दो हमारे भी दो का होगा नारा छोटी सी परिबार सुख की हो धारा ना कोई […]

कविता

जिन्दगी

जिन्दगी सुख की चाहत अरमान है जिन्दगी दुःख भरी एक फरमान है जिन्दगी बदनसीबी की     जाम है जिन्दगी खुशकिस्मती का  नाम है जिन्दगी परेशानी का एक साया है जिन्दगी दुखियारी की    माया है जिन्दगी खुशियो की बरसात है जिन्दगी ठोकर की  आघात  है जिन्दगी शराब की    जाम है जिन्दगी जहर भरी  पैगाम […]