पद्य साहित्य

कविता

रिश्वतखोरी : शर्मसार करते रिचार्ज

अंतिम सांस गिन रहीं हैं इंसानियत,रिश्वतखोरों की पौ बारह वहशियत।मौत मुनाफे की दुकानों पे नाच रहीं,दुनिया भयानक उत्सव देखती रहीं।

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