ग़ज़ल
मुफ़्त मिलती नहीं इज़्ज़त कमानी पड़ती हैजगह ज़माने में अपनी बनानी पड़ती है पूरे करने हों जो ख़्वाब तुमने देखे
Read Moreन वह चूल्हे की रोटी न वह घड़े का पानीबदल सी गई कुछ ऐसी ज़िंदगानीबुढापा भी कुछ और सा बीत
Read Moreसुबह की नरम धूप जब आँगन में उतरती है,चिड़ियों की चहचहाहट मन को छूकर गुजरती है।एक प्याली चाय के साथ
Read Moreजीवन की जंग लड़ता तन, पीड़ा से भरा हर श्वास,फिर भी सभी को चाहिए, लक्ष्यों का विकास। रिश्तों की थकान,
Read Moreपत्थर भी अपने चले, अपने ही थे हाथ।फिर कहते निर्दोष हैं, कैसी झूठी बात॥ आग लगाकर बस्तियाँ, करते ऊँची बात।आँसू
Read Moreहां मैं लिखता हूंसिर्फ लिखने के लिए नहींअपने जज्बातों केइज़हार के लिए भी हां मैं लिखता हूंहर अल्फ़ाज़ में तुमकोमगर
Read Moreधरती डोली एक पल, काँपे घर-दरबार।रोया सारा देश फिर, टूटा जन-आधार॥ मलबों में दबते रहे, कितने सपने-प्राण।भाषण देते रह गए,
Read Moreविश्वास की डोरी टूट गई, सपनों की दुनिया छूट गई,जिस हाथ में मेहन्दी सजनी थी, मृत्यु छाया लूट गई। जिसने
Read Moreशिक्षा बोली — मैं चरित्र हूँ, विवेक हूँ, प्रकाश हूँ,परीक्षा बोली — मैं अंक हूँ, रैंक हूँ, विशेष अधिकार हूँ।
Read More