कविता

बत्तीस दांतों के बीच

भारत भीतर ही है बहुत सारे ऐसे, पर्वतराज, हिमालय, पहाड़, श्रृंखला । नैतिकता ही है भारतीयों का, अनेकता में एकता विशेषता । हमेशा सफल रहते हैं भारतीय, जीवन की हरियाली और रास्ता । कभी खत्म ना होने वाली, खुशहाली और मंगल यात्रा । सिर कभी झुका नहीं सकते, बेशक हम कटा सकते हैं । वीरगति […]

कविता

होली में मिलते हैं

होली  के  दिन  इस  सब लोग , यहां  रंगों  से रंगीन  मिलते  हैं । वरना  दूसरे  दिन  जिंदगी  की , वजह से सब गमगीन मिलते हैं ।। बे परवाही  दिखती  है हर  शख्स , हर चेहरा की रंगों में डूबे खुशी से । किसी  दूसरे दिन  हर इंसान कुछ , अलग ख़्यालात जहीन मिलते हैं […]

कविता

जीवन उपवन सा खिले

जंगल करते हैं सदा, मानव पर उपकार। औषधियां-फल भेंटकर, दें जीवन संसार।। तरुवर माता-पिता सम, तरुवर मानव मीत। पोषण-सुख देते सदा, जीवन मधुरिम जीत।। पेड़ों को मत काटिए, देते सुखकर छांव। पेड़ बिना जीवन कहां, बंजर धरती गांव।। पौधों से जो जन करें, संतति सा व्यवहार। सुख, शांति संतुष्टि मिले, जीवन सदाबहार।। विटप धरा के […]

कविता

पतझड़

कल तक तेरा साथ था मेरा कुदरत ने क्या खेल खेलाया जुदा हो चले हम तुमसे डाली पतझड़ ने रिश्ता    तुड़वाया कल तक हम तेरे साथ चले थे पर जब मेरी उम्र हुई       पुरी पीला पड़ गया चेहरा था मेरा ख्वाब अब तक रह गई अधूरी मौसम की हाथ कैसा निर्दयी है […]

कविता

नववर्ष आ गया

नववर्ष आ गया ●●●●●●●●●● आखिर देखते देखते लो तेईस भी आ गया स्वप्न नये दिखला गया, था जिसका इंतज़ार मन था बेकरार वो समय भी आ गया। बाइस की भी ऐसी ही बेकरारी थी हम मानें न मानें मगर बीस इक्कीस की तरह बाइस भी सबक बहुत सिखला गया। हम चाहकर भी सबक सीखना नहीं […]

कविता

नववर्ष की चुनौतियां और तैयारियां

  नववर्ष के साथ नयी नयी चुनौतियां भी कम नहीं है, कोरोना का नया वैरिएंट अभी से धमका रहा है। राजनीति का पराभव किसी खतरे से कम नहीं है, नेताओं के बिगड़ते बोल देश की मानसिकता दूषित कर रहे हैं, स्वार्थ में अंधे नेता देश के लिए जोंक से कम नहीं हैं। जेल में नेता […]

कविता

चांद, तुम योगी हो

चांद, चाहे तुम्हें कोई पांडुरोग से कहे पीड़ित कोरोना के तनाव से ताड़ित दाग के दंश से दंशित तुम नहीं समझते अपमानित किंचित भी नहीं होते क्रोधित चंदनिया के मृदुल मधु-रस से समरस रहकर करते हो आप्लावित गीता पढ़ी या नहीं पढ़ी रहते हो हर पल निर्लिप्त. सूर्य से उजियारा लेकर करते नहीं संचित सतत […]

कविता

चांद ज़रा सा घटता रहा

चक्र समय का चलता रहा, चांद जरा सा घटता रहा, तारों से अठखेलियां करके, छुपमछुपाई खेलकर रमता रहा. सूर्य से रोशनी लेकर वह, जग को रोशन करता रहा, पूर्ण रहने की कोशिश में, बढ़ता रहा घटता रहा. शुक्लपक्ष में इतराकर , बच्चों की तरह मचलता रहा, बच्चों का चंदामामा बनकर, टॉफी-चॉकलेट-पूए बांटता रहा. मधुरस से […]

कविता

आओ लौट चले अपने गाँव की ओर

आ अब लौट चलें अपने गांव की ओर जहाँ है अभी मासूमियत नहीं है ठगा ठौरी धोखेबाजी अपनी मिट्टी अपने लोग है उनमें परस्पर अपनापन गाँव के बीच बहती नदी नदी में मदमस्त हो कूदना प्रकृति का भरपूर प्यार माँ का मिलता दुलार स्कूल जाते राह में रूकना मास्टर जी की लम्बी छड़ी मुर्गा बनने […]

कविता

मुक्ति है कितनी सुखदाई!

संघर्ष से मिलती है मुक्ति, मुक्ति के लिए संघर्ष करना, संघर्ष  ही मुक्ति बन जाता, बड़े-बड़ों का है यह कहना.   मुक्ति की राह कठिन है, सरल भी बहुत है मगर, निकलता है अनमोल हीरा, संघर्ष की भट्टी में तपकर.   रुकावट आती है सफलता की राहों में, यह कौन नहीं जानता है? फिर भी […]