सामाजिक

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सामाजिक नैतिकता को दीमक सरीखा चाट रहा एकल परिवारों का चलन

 बढ़ते एकल परिवारों ने हमारे समाज का स्वरूप ही बदल दिया। आजकल के बच्चों को वो संस्कार और अनुशासन नहीं

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उन्मुक्त बाजारवाद, उपयोगितावाद और पूंजीवाद के मध्य पिसता हुआ जनमानस

 जो व्यक्ति बदलना नहीं चाहते हैं, उन पर मेहनत करना बेकार है! ऐसे व्यक्तियों पर मेहनत करना अपनी स्वयं की

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काम एक पैसे का नहीं, फुर्सत एक मिनट की नहीं

भारतीय सामाजिक संरचना हजारों वर्ष पुरानी है। विभिन्नता में एकता को प्रदर्शित करना और हमारे पूर्वजों बड़े बुजुर्गों द्वारा शाब्दिक

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गल्ती हो जाने पर क्षमा मांगना हर समस्या का तर्कसंगत समाधान है

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारतीय सभ्यता, संस्कृति, मूल्यों मर्यादा और आध्यात्मिकता की सजगता दुनियाँ में कहीं नहीं है हमारी सभ्यता

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