गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

जब पवित्र जल में हलाहल विष घुल जाता है

तब तब पवित्र जल भी पूर्ण जहर बन जाता है

दुर्जनों का कुसंग जीवन में जब जब है आया
सुसंस्कारित सज्जन भी तब दुर्जन बन जाता है

शंका संदेह का शूल चुभता है जब मनुज मन
ह्रदय में कुभावो का आवेश घर कर जाता है

उलझा हुआ अशांत मन सुनता है कब किसकी
पूण्य फलो पर तब तिमिर कर्म रुक जाता है

भावो की धूसर आँधी में होती सदा शांति चंचल
सुचिता की शांति को मन तब त्याग जाता है

शान्ति पुरोहित

शान्ति पुरोहित

निज आनंद के लिए लिखती हूँ जो भी शब्द गढ़ लेती हूँ कागज पर उतार कर आपके समक्ष रख देती हूँ

2 thoughts on “गीतिका

  • राजीव उपाध्याय

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छी गीतिका, बहिन जी.

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