सामाजिक

सफाई ही नहीं, ज़रूरी है सफाईकर्मियों की स्थिति में भी सुधार

महात्मा गांधी सफाई को बहुत महत्त्व देते थे। बेशक वो अत्यंत सादगी से रहते थे लेकिन उनकी आंतरिक और बाह्य स्वच्छता आज भी अनुकरणीय है। वो न केवल अपनी साफ-सफाई स्वयं करते थे अपितु दूसरों को भी साफ-सफाई और स्वयं अपनी सफाई करने के लिए प्रेरित करते थे। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर साफ-सफाई और शौचालयों को हर घर तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया है। उनके आह्वान पर पूरे देश में ‘‘स्वच्छ भारत’’ अभियान प्रारंभ किया गया है। बहुत सराहनीय क़दम है ये।

आज गली-मोहल्ले के स्तर के नेताओं से लेकर राष्ट्रीय स्तर के नेताओं तक में झाड़ू हाथ में लेकर फोटो खिंचवाने की होड सी लगी है और पूरा इलैक्ट्राॅनिक मीडिया भी इसी को कवर करने में जी जान से जुटा हुआ है। यद्यपि उनका सफाई करना प्रतीकात्मक है लेकिन उनकी प्रतीकात्मकता भी बड़ी ही हास्यास्पद सी प्रतीत होती है। हर कार्य में उचित प्रशिक्षण अपेक्षित है। हमारे यहाँ नेताओं और बड़े लोगों की तो खैर छोड़िए सफाई कर्मियों को भी उचित प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। यह महत्त्वपूर्ण कार्य कैसे सही तरीक़े से किया जाए इस पर कम ही विचार किया जाता है।

देश में सार्वजनिक स्थानों तथा विभिन्न सार्वजनिक व निजी संस्थानों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में साफ-सफाई और स्वच्छता के लिए लाखों सफाईकर्मी लगे रहते हैं लेकिन इसके बावजूद क्या साफ-सफाई और स्वच्छता का कार्य ठीक-ठाक चल रहा है? क्या साफ-सफाई और स्वच्छता के कार्य में सहयोग करने वाले कर्मचारी स्वयं स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहते हैं? शायद नहीं। साफ-सफाई और स्वच्छता का काम सबसे महत्त्वपूर्ण होता है लेकिन यह महत्त्वपूर्ण कार्य कैसे सही तरीक़े से किया जाए इस पर कम ही विचार किया जाता है। इस कार्य में जो सबसे बड़ी कमी है वो है सफाईकर्मियों के उचित प्रशिक्षण की उपेक्षा व अपेक्षित साज़ो-सामान का अभाव।

सफाईकर्मियों को कोई औपचारिक या अनौपचारिक प्रशिक्षण प्रायः दिया ही नहीं जाता। इसके अभाव में न तो वे सही ढंग से सफाई ही कर पाते हैं और न अपने तथा अन्य लोगों के स्वास्थ्य के प्रति सचेत ही होते हैं। सही ट्रेनिंग के अभाव में कर्मचारियों द्वारा अधिक श्रम करने के बावजूद न तो कार्य समय पर हो पाता है और न कार्य में गुणवत्ता ही आ पाती है। यानी एक तरफ तो सफाई हो रही है और दूसरी तरफ लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ हो रहा है। लोगों से तात्पर्य है जो लोग सफाई कर रहे हैं तथा जिन के लिए सफाई हो रही है सभी शामिल हैं। इस बाह्य सफाई के साथ-साथ सबके स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

सफाई में गली-मोहल्लों और सड़कों की सफाई का विशेष महत्त्व व स्थान है। गली-मोहल्लों और सड़कों की सफाई के दौरान गंदगी हटने के साथ-साथ धूल-मिट्टी अथवा रेत भी ख़ूब उड़ता है जो सबके स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। सफाई गली या सड़क पर हो रही है धूल घरों के अंदर तक आ रही है। सुबह-सुबह लोग जब गली-मोहल्लों और सड़कों से गुज़रते हैं तो ये धूल-मिट्टी अथवा रेत और उसमें मिली गंदगी और गंदगी के कीटाणु लोगों के नाक और मुँह के ज़रिये उनके शरीर में प्रविष्ट होकर लोगों तथा सफाईकर्मियों दोनों को बीमार बनाने के लिए काफी हैं।

इस वर्तमान सफाई के दुष्प्रभाव के सबसे ज़्यादा शिकार होते हैं सुबह जल्दी काम पर जाने वाले लोग और स्कूल-काॅलेज जाने वाले विद्यार्थी। छोटे-छोटे बच्चे स्कूल जाते समय रास्ते में अथवा घर के आसपास स्कूल ले जाने वाले वाहन का इंतज़ार करते समय विशेष रूप से इस सफाई अभियान का शिकार बनते हैं। कई लोग जिन्हें श्वसन संबंधी बीमारियाँ होती हैं इस उड़ती धूल-मिट्टी से बड़े परेशान हो जाते हैं। धूल-मिट्टी और इसमें छुपे हानिकारक कीटाणुओं की वजह से स्वस्थ बच्चे भी अनेक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। इसके लिए सफाईकर्मियों के उचित प्रशिक्षण और सुरक्षित सफाई नीति बनाने की ज़रूरत है।

किसी भी कार्य को सुचारू रूप से करने के लिए कुछ साज़ो-सामान भी ज़रूरी होता है चाहे सफाई जैसा कार्य ही क्यों न हो। सफाईकर्मियों के उचित प्रशिक्षण की ही नहीं सफाई के लिए पर्याप्त साज़ोसामान की भी आवश्यक होती है। सफाईकर्मियों के पास सफाई के लिए एक झाड़ू के अतिरिक्त कोई अन्य उपयोगी सामान या यंत्र प्रायः नहीं होते। सफाई के बाद एकत्र कूड़े को वे अपने हाथों से ही उठाकर कूड़ेदान या रेहड़ी में डालते हैं। उनके हाथ बेहद गंदे व असुरक्षित रहते हैं। ऐसे में सफाईकर्मी जिस वस्तु को भी हाथ लगाते हैं वह भी गंदी और असुरक्षित हो जाती है।

एक ओर सफाई हो रही है तो दूसरी ओर अस्वास्थ्यकर स्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं। स्वयं सफाईकर्मियों के कपड़े, बाल, शरीर और हाथ बेहद गंदे और प्रदूषित हो जाते हैं। सफाईकर्मी कार्य के दौरान या बाद में ऐसे ही गंदे और असुरक्षित हाथों से खा-पी लेते हैं जो उनके स्वास्थ्य के लिए घातक है। सफाईकर्मियों को न केवल अच्छी क़िस्म के झाड़ू मिलने चाहिएँ अपितु भारी कूड़े-कचरे को सरकाने, नालियाँ साफ करने और कूड़े को रेहड़ी में डालने के लिए अपेक्षित सुविधाजनक यंत्र भी मिलने चाहिएँ। कार्य के दौरान हाथ, मुँह, नाक, बालों और शरीर के अन्य ज़रूरी हिस्सों को ढकने और धूल, गंदगी व प्रदूषण से बचाने के लिए दस्ताने, मास्क व दूसरे ज़रूरी सामान भी उपलब्ध कराने अनिवार्य प्रतीत होते हैं। सफाईकर्मियों को न केवल कार्य के लिए प्रशिक्षित करना अनिवार्य है अपितु उन्हें अपने स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

बड़े शहरों में कूड़े की ढुलाई भी एक बहुत महत्त्वपूर्ण काम है। कूड़ा पहले स्थानीय स्तर पर काॅलोनियों में अथवा उनके आसपास ही एकत्र किया जाता है और फिर ट्रकों द्वारा उसे दूरस्थ अपेक्षित निर्धारित स्थानों पर पहुँचाया जाता है। इसके लिए चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था अनिवार्य है। आज इस कार्य में अनेक कमियाँ देखने में आती है। ट्रकों में कूड़ा भरने के दौरान न केवल आसपास के इलाक़े में भयंकर दुर्गंध फैल जाती है अपितु काफी मात्रा में कूड़ा भी आसपास बिखर जाता है। यह बिखरा हुआ कूड़ा न केवल बदबू मारता रहता है अपितु धीरे-धीरे दूर तक फैलकर सारे परिवेश को गंदा, बदबूदार और अस्वास्थ्यकर बना देता है।

कूड़ा भरने के स्थान से लेकर उसे डालने के स्थान तक की कूड़े की यात्रा बहुत ख़तरनाक होती है। न केवल कूड़ा गंदा और बदबूदार होता है डंपर भी बेहद गंदे व असुरक्षित होते हैं। जहाँ से भी ये कूड़े के ट्रक गुज़रते हैं अन्य वाहनों और उनमें चलने वालों का बुरा हाल हो जाता है। कई ट्रक न केवल कूड़ा उड़ाते और बिखेरते चलते हैं बल्कि कई ट्रकों से गंदा पानी भी रिसता रहता है जिससे तेज़ दुर्गंध तो आती ही है साथ ही सड़क भी गंदी हो जाती है। जिन इलाक़ों से ये ट्रक गुज़रते हैं उन सड़कों पर तो गंदगी की मोटी तह जम जाती है। इस दौरान प्रायः कूड़े को ढकने की कोई व्यवस्था नहीं रहती और रहती भी है तो अपर्याप्त।

कई बार देखने में आता है कि ट्रक में लदे कूड़े को ढकने का तिरपाल वग़ैरा उड़कर सड़क पर चलने वाले दूसरे वाहनों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है। तिरपाल इतना फटा-पुराना और गंदा होता है कि कूड़े और बदबू को अधिकाधिक फैलाने में ही मददगार साबित होता है। इससे न केवल पर्यावरण को नुक़सान पहुँचता है अपितु काम करनेवाले इन स्वास्थ्य कर्मियों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। सफाईकर्मियों को न केवल कार्य के लिए प्रशिक्षित करना अनिवार्य है अपितु उन्हें अपने स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

न केवल सफाईकर्मियों को अपितु कूड़ा उठाने और ले जाने वाले वाहनों के चालकों और उनके सहायकों को भी प्रशिक्षित करना अनिवार्य है। इस सब के अभाव में यह प्रक्रिया एक बुरा अनुभव बन कर रह गई है। सफाई के साथ-साथ एक बात और बहुत महत्त्वपूर्ण है और वो ये कि हम सफाई पर ध्यान देने के साथ-साथ कूड़ा न फैलाने पर भी ध्यान दें। हमरी जीवनशैली इस प्रकार की हो जिससे कम से कम कूड़ा निकले। इसके अभाव में स्वस्थ नागरिक जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वर्तमान व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन अपेक्षित है इसमें संदेह नहीं।

सीताराम गुप्ता

परिचय - सीता राम गुप्ता

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