सामाजिक

आईना बोलता है : अब ट्रेन में टिकट

दिनांक 7 अप्रैल के एक समाचार के अनुसार अब ट्रेन में भी बसों की तरह टिकट मिल सकेंगे। इस सुविधा को कारगर बनाने के लिये सरकार टीटीआई को हाथों से संचालित वैसी ही मशीनें मुहैया कराएगी जैसी बस परिचालकों के पास होती हैं।

       देखा जाय तो यह एक अच्छी पहल है। टिकट खिड़की पर कई बार लंबी कतार के चलते जो गाड़ी छूटने का भय रहता है वह समाप्त हो जाएगा। इस सुविधा से यात्रा के दौरान गन्तव्य बदलने की मजबूरी, या उसी ट्रेन में यात्रा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता का समाधान भी संभव हो सकेगा ।

       जहाँ यह सुविधा मन लुभावन है और एक नायाब शुरुआत लगती है वहीं इस प्रकार की व्यवस्था में पेंच भी बहुत हैं। प्रथम तो ये कि ऐसी सुविधा मिलने के बाद, और हमारे देशवासियों की आदतों के मद्देनजर, ज्यादातर लोग टिकट खिड़की की तरफ मुँह भी नही करेंगे । टीटीआई की कमी के चलते ऐसी व्यवस्था बिना टिकट यात्रा को भी बढ़ावा दे सकती है। दूसरे ये कि यात्री वास्तव में कहाँ से चढ़ा है यह तय करना  मुश्किल हो सकता है । दिल्ली से चढ़े एक यात्री का सामना टीटीआई से मथुरा में होता है तो वो कह सकता है कि कोसीकलाँ से चढ़ा था। और अगर कोई टीटी मिलता ही नहीं तो फिर क्या कहना, क्योंकि इसकी संभावना, रेलवे के मौजूदा कार्मिक प्रबंधन को देखते हुए, बलवती है।

      कोई भी योजना तब तक सफल नहीं होती जब तक उस योजना के प्रायोज्य के गुण-धर्म को योजना की कार्य प्रणाली में समाहित नहीं किया जाता । ऐसी योजनाएँ कागज़ पर तो बहुत अच्छी लग सकती हैं पर व्यावहारिक नहीं होतीं । इसीलिए, सरकार की कई अत्यंत लाभकारी योजनाएँ सत्यनिष्ठ होने के बावजूद स्वेच्छित फल नहीं दे पातीं हैं। ऐसा नहीं है कि उक्त योजना सफल नहीं हो सकती । इसके लिये पहले रेलवे को वाछिंत चेकिंग स्टाफ की आवश्यकता होगी, जिसके बिना बेटिकट यात्रियों की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। प्लेटफार्मों पर प्लेटफार्म टिकट, वेडिंग मशीनों द्वारा वितरित किया जा सकता है जो उस यात्री के उद्गम का सुबूत होगा । इस टिकट को थोड़ा महंगा करने से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि यात्री इसे मजबूरी में ही निकालेगा। जिनके पास यह टिकट नहीं होगा उन्हें मौजूदा नियमों के तहत दण्डित किया जा सकता है।

     कम से कम हर दो डिब्बों पर एक टीटीआई होने से टिकट की चेकिंग प्रभावी रूप से हो सकेगी। इसके  लिये नये कर्मियों की भर्ती जरूरी होगी। जहाँ इन भर्तियों से रोजगार के नये अवसर बढ़ेंगे वहीं रेलवे का खर्च भी बढ़ेगा, पर यह बढ़ा हुआ खर्च बिना टिकट यात्रा से होने वाले नुकसान के न्यूनतम होने से मिटाया जा सकता है। उपरोक्त नयी सुविधा से भी रेलवे की लाभप्रदता प्रोत्साहित होगी। इसके साथ साथ यात्रियों में आमतौर से व्याप्त चोरी करने की आदत पर भी रोक लगेगी और उसे मजबूरन इस दिशा में शिक्षित होना पड़ेगा ।

      मेरी समझ से बुलेट ट्रेन से ज्यादा गुणात्मक और लाभकारी व्यवस्था ट्रेन में टिकट मुहैया कराना हो सकती है। आगे ‘प्रभु’ की इच्छा ।

 ‘होश’

मनोज पाण्डेय 'होश'

फैजाबाद में जन्मे । पढ़ाई आदि के लिये कानपुर तक दौड़ लगायी। एक 'ऐं वैं' की डिग्री अर्थ शास्त्र में और एक बचकानी डिग्री विधि में बमुश्किल हासिल की। पहले रक्षा मंत्रालय और फिर पंजाब नैशनल बैंक में अपने उच्चाधिकारियों को दुःखी करने के बाद 'साठा तो पाठा' की कहावत चरितार्थ करते हुए जब जरा चाकरी का सलीका आया तो निकाल बाहर कर दिये गये, अर्थात सेवा से बइज़्ज़त बरी कर दिये गये। अभिव्यक्ति के नित नये प्रयोग करना अपना शौक है जिसके चलते 'अंट-शंट' लेखन में महारत प्राप्त कर सका हूँ।

2 thoughts on “आईना बोलता है : अब ट्रेन में टिकट

  • विजय कुमार सिंघल

    गाड़ी में टिकट देने का विचार अच्छा हो सकता है, लेकिन मुझे इसकी सफलता में संदेह है. बसों में हमेशा से टिकट कंडक्टर द्वारा दिया जाता रहा है, लेकिन बसों की आय बिलकुल नहीं बढ़ी. इसका कारण यह है कि कई बार कंडक्टर टिकट के पैसे ले लेते हैं परन्तु टिकट नहीं देते, यानी उस पैसे को अपनी जेब में डाल लेते हैं. क्या गारंटी है कि ट्रेनों में ऐसा नहीं होगा?
    सबसे अच्छा यह हो कि हम रिजर्वेशन की तरह सामान्य टिकट भी इन्टरनेट से या मशीनों से उपलब्ध कराएँ. इससे जो लोग समय की कमी से टिकट नहीं ले पाते वे सुविधा के अनुसार टिकट ले सकेंगे. बिना टिकट पाए जाने वाले यात्रियों पर तगड़ा जुर्माना लगाना आवश्यक है.

  • जय प्रकाश भाटिया

    यात्री वास्तव में कहाँ से चढ़ा है ???? ,जहाँ तक हो सके गाड़ी में चढ़ ने से पहले ही टिकट ले लेना चाहिए, अधिक भीड़ या समय अभाव में प्लेटफार्म टिकट लेकर चढ़ना अनिवार्य कर दे, गेट पर टिकट चेकर द्वारा यात्री के हाथ में मोहर भी लगाई जा सकती है, जिसे दिखा कर ही टिकट टी टी द्वारा टिकट बनेगा. प्लेटफार्म टिकट के लिए स्वचालित मशीन भी लगाई जा सकती है ,

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