कविता

माँ तेरा दर्शन

खुली आँख से जग को देखा, जब बंद हुई तो आई माँ |
सूरज  की पहली किरणों में, देखी  तेरी परछाई माँ ||

रिश्ते-नाते सब बदल रहे, अब घर भी बदला लगता है |
हर मूरत बदली बिन तेरे, मंदिर भी बदला  लगता है ||

बाबु जो  नाम दिया तुमने, तेरे बिन कोई नहीं बुलाता है |
सह पाना इसको दुष्कर है, यही सबसे अधिक रुलाता है ||

हर जगह गूंजती रहती माँ, सच की ममता तेरी बोली में |
जो प्यार मिला तेरे गुस्से में, अब मिलता नहीं ठिठोली में ||

तेरे  रहते  ही  घर  छूटा माँ, तूँ  छूट  गयी  तो आया  हूँ  |
जीने का  कड़वा  सच है  माँ, रोकर मै  तुझे  रुलाया  हूँ   ||

तेरी अर्थी को छूं न सका, कंधे की किस मुंह बात करूँ |
पहला फल तेरी बगियाँ का, कैसे  इस पर  विश्वास  करूँ ||

मन को समझाऊ  कैसे  माँ, किस तरह तुझें  साकार  करूँ  |
हर दिल में बिरह बेदना है, किस तरह सभी को प्यार करूँ ||

माँ तेरे जैसा कोई भी अब,  क्यूँ दिखता नहीं इस दुनिया में |
हर सूरत में ढूढा तुझको,  तेरी झलक ना मिली  चंदनियाँ में ||

आँचल, माँ तेरे ख़ुश्बू   का,   हर वक्त महकता रहता है |
तेरी यांदों  के  सहारे  माँ,   तेरा परिवार  चमकता  रहता है ।।

महातम मिश्र, अहमदाबाद

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ

2 thoughts on “माँ तेरा दर्शन

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छी कविता !

    • महातम मिश्र

      सादर धन्यवाद श्री विजय कुमार सिंघल जी, आप ने कविता को सराहा, धन्य हुयी मेरी लेखनी, आभार मान्यवर……

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