लघुकथा

लक्ष्मी की सवारी

एक समय की बात है, गंगा के मनोरम तट पर एक छोटा सा गाँव बसता था। लोग समृद्ध न होते हुए भी बहुत खुश थे। ग्रामेतर कार्यों को करते हुए वे अपने सुख-दुख को साझा करते और प्रसन्न रहते थे। गाँव के तालाब में सदैव उजले उजले हंस तैरा करते थे।

फिर एक दिन उस गाँव में तरक्की पहुँच गयी। सभ्य दुनिया का नायाब  अविष्कार टीवी आ गया। सीधे-सादे लोगों की कूपमंडूकता भंग हुई और बाहरी दुनिया के बारे में ज्ञान बढ़ा । गाँव से कुछ नौजवान नौकरी करने के लिये बाहर चले गये। वे वहाँ से अपने घर पैसा भेजने लगे जिससे उनके घर दूसरे घरों से ज्यादा संपन्न हो गये। आर्थिक बिषमता से अहं पनपा और रिश्तों में दूरी आने लगी। फिर कुछ और नौजवान धन की लालच में नौकरी करने बाहर जा बसे।

कालांतर मैं सभी सक्षम लोग गाँव छोड़ गये और पीछे रह गये उनके बूढ़े परिवारीजन, अपने पुश्तैनी मकानों की देख भाल करने के लिये। पैसा अपने साथ हर तरह की संपन्नता तो लाया परन्तु, जिन चौपालों पर कभी किस्से-कहानियों का मेला होता था, वहाँ अब अपने अपने बेटे- बेटियों की समृद्ध का प्रपंच रह गया था। नीम के चबूतरों पर अब बच्चों की किलकारियाँ नहीं सुनाई पड़ती थी। गाँव का तालाब भी पक्का हो गया था पर अब उसमें हंस नहीं नज़र आते थे। अलबत्ता, रात में लक्ष्मी की सवारी उल्लुओं का शोर अवश्य सुनने को मिलता था।

 

मनोज पाण्डेय 'होश'

फैजाबाद में जन्मे । पढ़ाई आदि के लिये कानपुर तक दौड़ लगायी। एक 'ऐं वैं' की डिग्री अर्थ शास्त्र में और एक बचकानी डिग्री विधि में बमुश्किल हासिल की। पहले रक्षा मंत्रालय और फिर पंजाब नैशनल बैंक में अपने उच्चाधिकारियों को दुःखी करने के बाद 'साठा तो पाठा' की कहावत चरितार्थ करते हुए जब जरा चाकरी का सलीका आया तो निकाल बाहर कर दिये गये, अर्थात सेवा से बइज़्ज़त बरी कर दिये गये। अभिव्यक्ति के नित नये प्रयोग करना अपना शौक है जिसके चलते 'अंट-शंट' लेखन में महारत प्राप्त कर सका हूँ।

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